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दंश

अच्छा ही हुआ
तुम वहीं ठिठक कर
छूट गये मुझसे
अच्छा हुआ
छूट गये हमारे हाथ
प्रेम की ऊंचाईयों पर ही
हम हतप्र्रभ थे और उदास
मगर
आज तुम उसी प्रेम को
खाई में पड़ा कराहता न देख पाते

अच्छा ही हुआ
जो
नहीं नापे वो सात कदम
साथ साथ हमने
अन्यथा
सप्तपदी की पवित्रता को
विस्मृत करते एक दूसरे का स्व
कुचल रहे होते हम

जो नाम एक दूसरे के हाथों पर
लिखते थे हम
अच्छा हुआ नियति ने
लकीरों में नहीं उतारे
वरना आज हम उन्हें
कोरी भावुकता कह कर मिटाते होते

जिस देह की अधूरी सी
स्वप्निल कामना थी तुम्हें
अच्छा हुआ छू न सके तुम
अन्यथा अब तक
पोरों से दंश निकाल रहे होते तुम

मनीषा कुलश्रेष्ठ


 

रोक लो प्रेम को तिकोना होने से

जब भी
हम साथ हुए
उड़ गई सर की छत
अकसर हम मिले
पथरीले फुटपाथों पर
बस स्टॉप के निर्जन कोने में

जब भी हम साथ हुए
ढूंढते रहे एकान्त
एक छत एक कमरा
या यूं ही घूमते रहे आवारा
घण्टों मोटरसाईकल पर

आज भी सालों बाद
हम आमने सामने हैं
पर
बदली नहीं परिस्थितियां
न छत है न उपयुक्त शालीन जगह
बैठ कर बात कर लेने भर को
यूं कहने को अपने अपने आरामदेह घर हैं
पर उन परिधियों में परस्पर मेरा तुम्हारा
प्रवेश निषिद्ध है

आज भी हम खड़े हैं
बस स्टॉप के इसी कोने में
प्रश्न वही है ज्यों का त्यों
' कहाँ चलें? '

देखो
मेरी मानो तो
मत बोओ बीज
आने वाले दिनों के
मत लो किसी से उधार ये शामें
रोक दो यहीं
प्रेम की बिगड़ती आकृति को
और बिगड़ने से
अन्यथा प्रेम तिकोना हो जाएगा।

मनीषा कुलश्रेष्ठ


 


   
 

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