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मवाद
फिर से फूट चला आज एक
बावज़ूद कफ़्र्यू के
फुस्सससस

फूटा भी नहीं बल्कि फोड़ा गया था
कोई अपने घाव तो खोंटता नहीं
उठती है टीस भयंकर
इसलिये
नोच डालो
किसी और का हीं
किसी का भी

फिर रात होगी
एक और गोली और फिर
फुस्सससस
अब रात भी क्या
राह चलते
कहीं भी कभी भी
धॉंय और फिर
फ्ुस्सससस

किसने फोड़ा फिर से पता नहीं
परंतु फैल गया सर्वत्र लाल लाल
तड़प रहे हैं माटी में लोथड़े मॉंस के
बह चला है मवाद आतंक का

रोज़ ही फूटता है
यह फ़ोड़ा नफ़रत का
कहीं भी कभी भी
सूखता हीं नहीं जाने क्यों
जाने कितना मवाद है इसमें

विजय ठाकुर

 

समानता
समानता है. यकीनन है. मुझमें और तुझमें
लेकिन नारी होने का नहीं बल्कि
तुम लुटती हो घर में चुपचाप और
मैं नोची जाती हॅ दफ़्तरों में खामोशी से ।

जनता का प्यार

चुनाव क्षेत्र में मंत्री जी हैं पधारे. हाथ जोड़े खीसें निपोरे
हो गए हैं खड़े. बिल्कुल 'कहो ना प्यार है' की मुदा में
कहते हैं. देखिये कैसे खींच लाई है मुझे सिद्रदत से
इस क्षेत्र का प्यार. जनता जर्नादन का दुलार
वर्ना. पॉच साल बाद भी कोई किसी को याद करता है?

चकमा

महानगरों की भीड़ में
कुलबुलाते हुए
सबको धकियाते हुए
अपना सर्वस्व पीछे छोड़
आगे रहने की होड़
बना देती है खुद को
भीड़ का एक अनज़ाना चेहरा
भीड़ जो बढ़ती ही जाए
सुरसा के मुख की तरह
भीड़ से अलग यदि दिखना है
तो दीजिये चकमा सुरसा को
वर्ना सुरसा ख़ुद आपको निगल जाएगी

विजय ठाकुर
 


   
 

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