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ज़रूरी नहीं है
जरूरी नही है
हथेली की रेखाएं
आपस में टकराएं ही

जरूरी नहीं कि
होंठों पर खुदा तिल
मसला जाये ही

जरूरी नहीं कि
देहों की कसीदाकारी में
फूल खिलाए जायें ही

बातों की गुनगुनाहट सेंकना भी
कुछ कम नहीं होता।

रति सक्सेना

 


   
 

खेमे

हमने
अपने को खेमों में बाँट लिया है
उनके खेमे में हम नहीं
हमारे खेमे में वे नहीं

लेकिन कुछ चीजें हैं जो
हमारे खेमे से
उनके खेमे में
उनके खेमे से
हमारे खेमे में
बेरोकटोक चलीं आतीं हैं
मसलन
नवजात का मधुर रुदन
घुटने छीलता बचपन
मैंहंदी का गहरापन
अपने में लिपटा अपनापन
हथेलियों की कड़ी खाल
उंगलियों का टेढ़ापन
जीभ की नोक पर टिकती खटास
तलवों से उठती प्यास
बादलों के भभाके
पंखों की उड़ान
और भी न जाने क्या क्या

फिर भी हम हैं कि
अपने खेमे बसाते हैं
उनके उखाड़ने के लिये।

रति सक्सेना
 


 

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