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कैसे खेलें ये सखि कैसा ये फाग है!

बिन धन रंग फीका लगे
जले ईष्र्या की आग है
भाई का भाई से
रहा नहीं अनुराग है
कैसे खेलें ये सखि
कैसा ये फाग है!
चाहे न प्रेम अब
मांगे बस विलास है
कहलाती अर्धागिंनी है जो
गाये लालच का राग है
कैसे खेलें ये सखि
कैसा ये फाग है!
स्नेह का लगा के रंग
खेले जो होली संग
थी बुढ़ापे की लाठी जो
तोड़े हर उम्मीद वो
तन के पालनहार से
देखो मांगे अपना भाग है
कैसे खेलें ये सखि
कैसा ये फाग है!
सुख दुख में साथ थे
बन पड़ौसी थामे हाथ थे
कान बन दीवार के
कटु मन में कुछ विचार के
दिल में पाले चुपके चुपके
द्वेष के ये नाग हैं
कैसे खेलें ये सखि
कैसा ये फाग है!
मित्र अब मित्र नहीं
यार में न प्यार है
पीठ पीछे भोंक कटार
देते झूठा दुलार हैं
सुदामा के दामन में लगा
द्रोह का क्यों दाग है
कैसे खेलें ये सखि
कैसा ये फाग है!
परनारी को देखकर
मन जाता क्यों झूम है
घर की लक्ष्मी से
मन जाता क्यों ऊब है
अब रसिक बने पति परमेश्वर
पर पत्नी से बैराग है
कैसे खेलें ये सखि
कैसा ये फाग है!
रखवारी हुई संदिग्ध है
रक्षक बने भक्षक हैं
प्रजापालक बनाया था जिन्हें
डसें वहीं बन तक्षक हैं
प्रतिनिधि समता बंधुत्व के
फैलाएं दंगों की आग हैं
कैसे खेलें ये सखि
कैसा ये फाग है!
सेंध लगाये साधु अब
धन की बस साध है
मोहत्याग करने वाले
करें नित माया की बात हैं
कलुषित किया गंगा को
क्या कुंभ क्या प्रयाग है
कैसे खेलें ये सखि
कैसा ये फाग है!
कितने ही दानव हैं
कितनी ही पतिता हैं
मदिरा की घर घर में
बहती अब सरिता है
कलिहारी कलियुग
लगता गया जाग है
कैसे खेलें ये सखि
कैसा ये फाग है!
मलाल के ही रंग का
मिलता गुलाल है
पिचकारी में रंग नहीं
लहू की फुहार है
अमरत्व की चादर ओढ़
प्रहलाद को कहीं जलता छोड़
संहार का संदेश लिये भेजे फिर
होलिका ने अपशकुनी काग हैं
कैसे खेलें ये सखि
कैसा ये फाग है!

-अपर्णा पण्डा

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