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अन्तिम -
पत्र
उसने लिखा
कुशल से हूं
तुम्हारी कुशलता के लिये
ईश्वर से प्रार्थना करता हूं
उसे तब पता नहीं था
कि जब तक यह पत्र मुझे मिलेगा
उसके मरने की खबर आये
तीन दिन हो चुके होंगे
अब मैं जानता हूं
यह एक ऐसी चिट्ठी है
मौत जिसे पढ़ रही होगी
उसके कंधे के पीछे खड़ी होकर
एक सर्द निश्वास कहीं से आया होगा
जब उसके थके हुए हाथों ने
अपने आखिरी दस्तख़त किये होंगे
कितना बदल गया है
इन पंक्तियों का अर्थ
सिर्फ यह जानने भर से
कि यह एक मृतक का पत्र है
जो अब कुशल से है
और एक मरते हुए आदमी की
कुशलता के लिये
अगर कहीं ईश्वर है तो,
उससे प्रार्थना कर रहा है।

 
 
        

उठूं
उठूं
खींच दूं ट्रेन की ज़ंजीर
चिल्लाऊं ज़ोर से
रोको - रोको
ज़रा देख लेने दो नज़र भर
ये बहती हुई नदी कल - कल
तनिक ठहर जाओ पुल पर
उठूं
डपट दूं भरी मीटिंग में
कड़क कर आला हाकिम को
कि अब चुप हो जायें आप श्रीमान
बस, बहुत सुन ली आपकी आत्ममुग्ध बकवास
उठूं
अर्ज करुं शिखरवार्ता करते राष्ट्रनायकों से
अब ये तमाशा बन्द भी करो
और लो, दस्तख़त करो इस सयुंक्त घोषणापत्र पर
कि अपने अपने वतन के लोगों को
हम बरगलाना बन्द करेंगे
फौरन से पेश्तर
उठूं
यह बिन मांगी सलाह दूं इन उदास पत्तियों को
कि अपनी ख्वाहिशों को इस कदर दबाना भी
ठीक नहीं
उड़ो तुम इस पेड़ से सब एक साथ
अपने किसी प्रिय पेड़ की पत्तियों को चूम
चाहो तो फिर लौट आओ एक बार
उठूं
निवेदन करुं हिन्दी के कवियों - आलोचकों से
दिमाग़ पर इतना बोझा क्यों लेते हैं आप
ज़रा अपनी मनहूसियत कम कर लें
कोशिश तो करिये!
उठूं
कहूं कविता से ढूंढ कर लाने के लिये एक शब्द
जिसमें आम के अचार की गन्ध हो
जिसके उच्चार भर से
खुल जायें
बरसों बन्द पड़े द्वार
घोर वन में या नदी में
जिसका हाथ थामे
हम हो जायें पार!

-आशुतोष दूबे

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