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मानसून   

क्या लाया है
साथ अपने
इस बार मानसून

क्षितिज के त्रिआयमी फलक पर
बिखरे हुए वही गाढ़े गाढ़े तरल रंग
दिग दिगन्त तक डोलती
आवारा तूलिका
सलेटी हाथियों से हुंकारते
आकाश से बदन रगड़ते
मतवाले बादलों पर सवार
अपने कटाक्षों से मोहती दामिनी
बूंदों के मोतियों से सजी हवा
या कुछ और भी
लौटा लाया है
सौंधी मिट्टी की प्यासी दहक
गीली कुचली घास की तुर्श महक
घास पर बिछे नन्हे नीले फूल
टिटहरियों का प्रजनन काल
मोरों की आतुर पुकार
चींटिंयों की जगह बदलती लम्बी कतार
बगुलों की लम्बी उड़ान
सीढ़ियों की काई लगी फिसलन भरी ढलान
या कुछ और भी
लेकर आया है
कुछ नये खुलते रास्ते
कुछ नयी उपलब्धियां
अवचेतन पर तैरती पिछले बरसों की
सीली सीली स्मृतियां
एक अनजानी कस्तूरी सी महकती
अपने भीतर की कोई व्यथा
या कुछ और भी
शायद कहीं छूट गया है इससे
एक बण्डल
उस अनहोनी का
जिसमें कस के बांधे होंगे
नियति ने लपेट कर नये दिन
कुछ प्रतीक्षा के कुछ मिलन के
एक नया तारा नये भाग्य का
कहीं सहेज कर रखा होगा
उम्मीद जगाता एक पत्र किसी का
क्या लाया है
साथ अपने
इस बार मानसून
क्या कुछ और भी?




   
 



 

 

कल फिर गांव से गुज़रेगी रेल

आज फिर गांव से
गुज़री रेल
रेल की छुक छुक से
मटर के खेत में लोट पोट होती
चिड़ियों का झुण्ड फुर्र से उड़ा
चौंक कर खड़े हो गये
झरबेरी के बेर तोड़ते ग्रामीण बच्चे

आंखों पर हाथ रख मिचमिचा कर आंखें
वृद्ध किसान देखने लगा
पटरियों पर सरपट दौड़ती
उम्र की लम्बी रेल को
खेत की अनजुती बांझ मिट्टी में घुलता रहा
उर्वर लवणों में बदलता मरी गाय का पिंजर
देता हुआ सार्थकता मौत को
कहीं घनेरी अमराई में
ठिठकी एक पीली चुनरी में दुबकी हंसी
बिछे हुए पुआल पर मुखर हुआ
दो भुजाओं का स्नेहिल मगर ढीठ आग्रह
तभी शुरु हो गयी बूंदा बांदी
पकी अरहर के खेतों में
मर्दाना जनाना कर्मठ हाथों में
एकसाथ अविराम चलती हंसियां
एक पल को थमीं फिर चल पड़ीं
वहीं करीब खड़ा रहा मुंह बनाये
तोतों के झुण्ड को भगाने से असफल सा
फटे कपड़ो व मटके के सर वाला
बुद्धू सा बिजूका
साल भर गोबर इकट्ठा कर थापे गये
अपने उपलों के ढेर को सहेजती
चमकीं बुढ़िया की आंखें
इस साल ईंधन की कमी नहीं
चाहे धान कम हुआ हो
छोटी सी फुलचुकी फुदकती रही
करील की झाड़ियों के
नारंगी फूलों का रस सोखती
बेखबर बगुले सहेजते रहे तिनके
बबूल के पेड़ों पर
नदी का दरपण धुंधला लगा
काई तो इस बरसात के बाद
बह जायेगी
पॉलीथीन की नीली गुलाबी परत
इस नदी को खा जायेगी
कल फिर गांव से गुज़रेगी रेल

-मनीषा कुलश्रेष्ठ

 

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