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कोंपलें
कितने ढलानें
चढ़ती उतरती है वह
पैदा होने के बाद ही से
फिसलती है वक्त की
तेज़ धार पर
बचती बचाती अपना कौमार्य
छू लिया किसी ने समझ कर जंगली फूल
तो अपराध उसी का होगा
चख लिया किसी ने उसका सौंधा स्वाद
तो बेज़ायका हो जायेगी
ज़िन्दगी उसी की

खुद तो डरती ही है
अपनी आकार लेती देह से
कुछ मां डरा देती है
खुद तो उलझती है
अपने बदलते मनोभावों से
कुछ मां उलझा देती है
कब तक
रखना और देना होगा हिसाब
महीने की तारीखों का
मां को

इससे तो अच्छा होता
वह लड़का होती
या होती एक पेड़
या कोई मौसम
गर्वित होती
अपने बदलावों पर
छिपाने न पड़ते
अन्दर करवटें लेते परिवर्तन
न झुलसतीं ग़लीज़ निगाहों से
नई नई कोंपलें
मुट्ठी में भींचने नहीं पड़ते
एक एक कर गिरते बचपन के पत्ते

-मनीषा कुलश्रेष्ठ

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