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खोज

तुम्हें जानने की धुन ही मुझे वहां ले गई थी‚
जिसके पार मैं ने सोचा‚ तुम हो सकते थे।
मैं ने तुम्हें उन सारी संभावित जगहों पर खोजा जहां
तुम्हारे होने या न होने की ज़रा भी संभावना थी।
उन परछाइयों में खोजा जोप घर और बाहर का
अनिश्चित सफर तय करती हैं। उन सम्बन्धों में
खोजा जहां तुम हो सकते थे या उन्हें छुए बगैर…
पर वहां सिर्फ तुम्हारे कपड़ों की गंध थी।
मैं ने तुम्हें उन सारी वर्जनाओं में ढूंढा‚ जहां से
कभी – कभी तुम वापस आने के रास्ते ढूंढा करते थे।
कहीं कोई नहीं है‚ सब अपना – अपना पता
दूसरे से पूछ रहे हैं। सबके हाथ में अपने नाम की
पर्चियां हैं‚ जिन पर गलत पते लिखे हुए हैं।
क्या हर पते पर जाये बगैर
तुम्हें नहीं खोजा जा सकता?

-जया जादवानी
 

सदी का सबसे भयावह सच
मैं बहुत वक्त तक सोयी रहती
अगर नहीं जगाता मुझे मेरा बच्चा
बहुत देर तक गूंजती रही मेरे कानों में
उन औरतों की चीखें
जिन्हें आधी रात घरों के बाहर खींच
उतार दिये गये कपड़े
तलवार की नोंकों पर
चढ़ा दिये गये उनके बच्चे
फिर बहुत देर तक गूंजती रही
पुलिस की जीपों के सयरनों की आवाज़ें
अब सब ठीक हो गया
मैं करवट बदल कर सो गयी
जानते हुए भी कि
वे भेज दी गयी हैं
एक यातनागृह से दूसरे में
उनकी तकलीफें‚ शर्म‚ आंसू
और नफरत
जिन्हें बाद में सिर्फ
लिखा जा सकता है
सड़कों पर पड़े थे
उनके कपड़ों की तरह
खून से सने
और वे हराम के माल की तरह
बंटती रहीं दाना – दाना
और जब आयी मेरी बारी
जो कि आनी थी
मेरा बच्चा कुचला गया
उनके बूटों के नीचे
और मेरी चीखें
घुट गयीं अपने अंधेरो में
हमारी सदी का
सबसे भयावह सच है
चुप रहना।

-जया जादवानी
 

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