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लड़कियों से
मत रहो घर के अन्दर
सिर्फ़ इसलिए
कि सड़क पर खतरे बहुत हैं।

चारदीवारियाँ निश्चित करने लगें जब
तुम्हारे व्यक्तित्व की परिभाषाएँ
तो डरो।
खो जायेगी तुम्हारी पहचान
अँधेरे में,
तुम्हारी क्षमताओं का विस्तार बाधित होगा।
डरो।
सड़क पर आने से मत डरो ,
मत डरो कि वहाँ
कोई छत नहीं है सिर पर।
तुमने क्या महसूसा नहीं अब तक
कि अपराध और अंधेरे का गणित
एक होता है?
और अंधेरा घर के अन्दर भी
कुछ कम नहीं है।
डरना ही है तो अंधेरे से डरो।
घर के अंदर रहकर ,
घर का अंधेरा ,
बनने से डरो।

दरार
सच की ज़मीन पर खड़ी
विश्वास की इमारत तो
कब की ढह चुकी ।
अब तो नज़र आने लगी है
बीच में उग आई
औपचारिकता की दरार …


 

दु:ख
वे दु:ख थे
जिन्होंने सब ओर से घेर कर
ढक लिया था उसे
और तुम्हें उसका चेहरा
नज़र नहीं आता था।

वे दु:ख थे
जो उसे रोकते थे
कुछ भी कहने से
और तुम्हें लगता था
उसे बोलना नहीं आता ।
वे दु:ख थे
तुम्हारे ही दिये हुए
जो बदल रहे थे
अपनी काली , सर्द छाँह में
उसे एक व्यक्ति से
एक बिन्दु में
और तुमने मान लिया था
उसका कोई वज़ूद नहीं
किनारे कर दिया था उसे
और निश्चिन्त हो गये थे।
क्योंकि तुममें से किसी को भी
यह मालूम नहीं था
कि मालूम है उसे भी
कि ये दु:ख हैं
जो बदल रहे हैं उसे
व्यक्ति से बिन्दु में
और जिस दिन यह बदलना
पूरा हो जायेगा ,
वह ढूँढ़ ळेगा
अपने लिये वह कोना
जहाँ सम्भव होगा उसके लिये
एक नए वृ...त्त का केन्द्र होना ।
फिर परिधि के बिन्दुओं की ऊष्मा से
दु:ख पिघल जायेगा
और तुम्हें उसका चेहरा
बार बार नज़र आयेगा।
तब क्या करोगे तुम?

— इला नरेन 

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