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दोहे : मां के नाम
बचपन में अच्छी लगे‚ यौवन में नादान।
आती याद उम्र ढ़ले‚ क्या थी मां कल्यान।
करना मां को खुश अगर‚ कहते लोग तमाम।
रौशन अपने काम से‚ करो पिता का नाम।
विद्या पाई आपन‚. बने महा विद्वान ।
माता पहली गुरू है‚. सबकी ही कल्यान।
कैसे बचपन कट गया‚ बिन चिंता कल्यान।
पर्दे पीछे मां रही‚ बन मेरा भगवान।
माता देती सपन है‚ बच्चों को कल्यान।
उनको करता पूर्ण जो‚ बनता वही महान।
कर सेवा दिन रात तू .‚ कर ले कर्म हजार।
कर्जा मां के दूध का सकता नहीं उतार।
बच्चे से पूछो जरा‚. सबसे अच्छा कौन।
उंगली उठे उधर जिधर ‚. मां बैठी हो मौन।
जीजाबाई शिवाजी‚ इन में कौन महान।
मां का रूतबा जानते . बोलें क्या कल्यान।
जब जब आता मदर डे‚ दिखती मां साकार।
आता याद अतीत है ‚बचपन वाला प्यार।
सुनते थे है रचियता‚ है वह दया निधान।
देखी मां की मामता‚ भूल गये भगवान।
भारत मां पर कर दिया‚ मांओं ने कुर्बान।
दिल के टुकड़े पुत्र जो‚ पाले किये जवान।
मां कर देती माफ है‚ कितने करो गुनाह।
अपने बच्चों के लिए .उसका प्रेम अथाह।
पत्नी के सहयोग से‚ बनते आप महान।
दूजा रूख तस्वीर का‚ माता है कल्यान।
बच्चों खातिर दे सके‚ मां ही अपनी जान।
उसको बच्चे भूलते ‚ कैसे क्यों कल्यान।
कहते मां जिस देश को‚ सके तोड़ें अंग।
होते भारत देश में‚ कितने अद्रभुत व्यंग।
मां के मुख पर सीख थी ‚ पत्नी के मुस्कान।
पानी बहता उधर है ‚ होती जिधर ढ़लान।
मदर्स डे के पर्व पर‚. कहता कवि कल्यान।
भारत मां को मां कहो‚ मां के नहीं समान।

-सरदार कल्यान सिंह

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