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चाहत का रंग

कहीं से भी करूं
दिन की शुरूआत,
हर लम्हे का केन्द्र ,
तुम क्यूं बन जाते हो
अपनेआप।
सुबह की पहली किरन
जब छूती है मुझे,
तो अंगड़ाई के साथ– साथ
क्यूं अंकित हो जाता है
तुम्हारा चेहरा
मेरे मन में।
चुनने लगूं परिधान
तो पूछने लगते है
एक ही प्रश्न,
क्या पहनें,
कौनसा रंग तुमको भाता है ।

कंघी से संवारू बाल
सीधी या तिरछी निकालूं मांग,
केशों को बांधू या
छोड़ दूं खुला
कौनसा अन्दाज तुमको लुभाता है ।

पता नहीं किस तरह
अपने आप से किया
हर सवाल,
तुम्हारी तरफ मुड़ जाता है।

लगा लूं छोटी सी बिन्दी
या रहने दूं चेहरा सपाट,
शायद बिन्दी की चमक पर
तुम्हारा ध्यान अटक जाता है ।

कर लूं थोड़ा सा मेकअप
रच लूं होठों पर लाली,
या प्रकृति का नैर्सगिक रूप ही
तुमको पसंद आता है ।
किसी भी तरह देखूं
आंखे बन्द कर लूं ,
या रखूं खुली,
मेरे संग – संग शीशे में
तुम्हारा अक्स क्यूं उभर आता है ।

न जाने मुझको
ये क्या हो जाता है ,
कि हर ख्याल घूम फिर कर
तुम तक पहुंच जाता है।

कहीं भी रहूं कुछ भी करूं
पता नहीं किस तरह हर क्षण ,
तुम्हारी चाहत का रंग
मेरे जीवन में उभर आता है ।

-डॉ.• रीता हजेला "आराधना”

महान विस्फोट
पता नहीं कितने कल्पों तक
किसी को पता नहीं
मेरा हृदय मुट्ठी में बन्द था

न मुझे पता था
कि सुबह सूरज
किसी पहाड़ के पीछे से
झांकता है
कि रात सूरज
किसी झील की गोद में
सो जाता है

मेरा क्रन्दन भी
मुठ्ठी के भीतर ही
घुटता था

मेरा दिक्काल
जो सीमित था मुठ्ठी के भीतर ही
फिर पता नहीं क्या हुआ
आप कहें संभवतया आया बसन्त

इतनी ज़ोर से धड़का मेरा हृदय
कि गूंज रहा
वह नाद
अंतरिक्ष में आज तक
और मुठ्ठी खुल गई मेरी!

आकाशगंगा में
डुबकी लगाने लगे
करोड़ों तारे
सजने लगीं निहारिकाएं


बड़े आवेग से चल पड़ी मंदाकिनियां
करने अभिसार
सहसा खुल गया अंतरिक्ष
आकाश हो गया नीला

अब जब रोती हो तुम
तब टूटने लगते हैं असंख्य तारे
जब मुस्कुराती हो तुम
छा जाती है अरुणोदय की लालिमा
जब हंसती हो तुम
धरा पर उतर आती है गंगा।

– विश्वमोहन तिवारी‚ पूर्व एयर वाईस मार्शल
जून 1‚ 2004

 

 

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