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दिखावा
आधुनिकता की ओट में
कुछ आदमकालीन नग्न विचार
आज तांडव कर रहे,
ऊँचे सिंहासन पर बैठे
बड़प्पन का भाव लिये
लिपे – पुते मुखौटे के पीछे
झूठे शान के खुले मैदान में
दौड़ते भागते ये जीव
एक दूसरे से टकराते
शालीनता के पर्दे में
आज नोचते नकोड़ते
चढ़ाई चढ़ रहे।
अनजान वीभत्स इस सच से
‘मैं’ को छाती से चिपकाये
मखमली जामा पहने
दौड़ की अंतिम लकीर
को छू लेने की होड़ में
दिखावे के चमकते लिबास पहने
गंदे कीचड़ के दलदल में
ये आज समा रहे
समाते जा रहे…


 

कमज़ोरी
हर ताक़त के पीछे से
झांकती है कोई कमज़ोरी
और जब ताक़त सरसरा कर
ज़मीन पर लोटने को बेताब हो
तो वही कमज़ोरी उठाती है
याद दिलाती है कि उसकी डोर को
कमज़ोरी ने ही बाँधा है
मुस्कराहट भी आज है तो
उन ढुलकते मोतियों की बदौलत
क़ाग़ज़ी फूल जो महक रहे हैं
किसी काँटेदार शाख़ की दुआ से
कि हर बवंडर की गहराई में
छुपा होता है एक शांत स्थिर आकाश।

-मानोशी चटर्जी
 

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