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स्वागत सरदी का
गुनगुनी धूप में
धुआँ – धुआँ सी घूम रही है
मुखरित सी पुरवाई
नववर्ष के द्वारे देखो
मनभावन सी सरदी आई
अलाव की लहरों पर
पिघलती कोहरे की परछाई
तितली तितली मौसम पर गीत सुनाती
शरद ऋतु की शहनाई
नववर्ष के द्वारे देखो
मनभावन सी सरदी आई
आसमान है जमा – जमा सा
पुष्पित वृक्षों पर सोया सा
सुबह का कोहरा घना – घना सा
उनीदें सूर्य से गिरती
ओस की
बूंदो से लिपटा
सुरमई सा
थमा – थमा सा उजाला
जाग उठा
मुक्त भाव से
जब मौसम ने कसमसा कर
अमराई में ली अंगडाई
नववर्ष के द्वारे देखो
मनभावन सी सरदी आई

— डॉ। सरस्वती माथुर

 

सुनामी :
भगवान से सवाल

 

 

 

 

ऐसा क्या कर डाला था
इतने सब नादानों ने
फिर तुमने क्यों बदल दिया है
शहरों को शमशानों मे

माना भूल किया करता है
तभी तो है इंसानों मे
वरना वो भी बसता होता
तुम संग ही भगवानों मे

वैसे ही क्या कम दुख हैं
आज के इन जमानों मे
कुछ तो भेद किया होता
बूढ़े और जवानों मे

– समीर लाल
 

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