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याद
तुम या तुम्हारा खयाल
अब मुझे परेशान नहीं करते
तुम्हारी यादें
अतीत के पन्नों में
सूखे पत्तों सी
नहीं करकरातीं।
वे नष्ट हो चुकी हैं
अब कोई आवाज़ नहीं आती।
शायद तुम हो
और तुम्हारा खयाल भी
क्योंकि अब भी
वक्त की हलकी सी फूंक से
अतीत के पन्ने खुल जाते हैं
और “एक तुम थे”
यह अहसास
सूखे पत्तों की गर्द सा उड़कर
मुझसे चिपक जाता है।
 

पत्थर
तुम तो पहले से ही पत्थर थीं
मैं था
कि अपने मन की आँच से
पिघलाता रहा तुम्हें।
मुझे तुम्हारा पत्थर होना
रास नहीं आता था

बड़ी मुश्किल से जुटा पाया था
अपने लिए एक कोना
तुम्हारे मन का
कि बह गई
ये बर्फीली हवाएं
अब फिर तुम
पत्थर की तरह सख्त हो
और मैं
अपने अन्दर की आँच लिए
अकेला भटकता हूँ
जानते हुए
कि अब कोई भी आग
बुझा नहीं पायेगी
तुम्हारे अन्दर जल रही उस ठंडी आग को
जो ये हवाएं लगा गई हैं।
अपने अन्दर की आग से
राख होगा मेरा ही अन्तरतम
जब तक
बुझती आकांक्षाओं की आग को
एक चिनगारी की जरूरत
पूरी नहीं होगी।

-इला प्रसाद

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