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अरुण प्रसाद की दो कविताएं
एक तस्वीर
चेहरे का मुख है चेहरे से गायब।
ओठ सिगरेटों से जल गये शायद।
धंस गयी ढ़ोंढ़र में नैनों की जोत।
नीली लकीरों पे रेंग रही मौत।
पीड़ित है पीड़ा का चीखा हुआ शोर।
दफन रहा होने के पहले किशोर।
ढ़ाँप रहा माटी से घुटा हुआ कंठ।
डूब रहे आँसू में जीवन के मंत्र।
सिन्दूरी रेखा पर होली का रंग।
पटक रहा माथ हाथ भरकर उमंग।
सूख गए पैरों पर लोटे दिवाली।
ठुकरा सका न दीप उसने बुझा ली।
विहँसे से ओठ पर क्रन्दन आभासित।
दीख रहा साँस हर शापों से शापित।
दारू में डूबे हुए वक्त संग सो रहा।
दफन देने पीड़ा पर‚ दर्द जन्मा रहा।
चेहरे पर रो रही दर्दीली शाम।
चिपका है हाड़ से रक्त शून्य चाम।

माथे पर जीवन की गठरी का बोझ।
काँधे पर हाथ रखे वक्त रहा सोच।
धीरज धर धन‚धर्म‚घर सारा मिलेगा।
पच्चीस गुजरा कुछ निश्चय खिलेगा।
मचल रही गोद में दो जवान बेटी।
धँसा हुआ पेट–पीठ नँगी सी लेटी।
सोच रहा बाप कोई मोल तो करे।
पैसे क्या धेले में तौल तो करे।
सबने सराहा कह मार्मिक तस्वीर।
किसकी कला? कौन है यह फकीर?
अपनी तस्वीर‚अपना पूरा वतन।
मत नकार कह के पराई तपन।
नंगी सी लड़की को साड़ी पिन्हाने।
कूँची ले मत यूँ दे अस्मत बिकाने।
या तो भर रंग या पोत तस्वीर।
चाहता मैं स्वस्थ मुख दोहरा शरीर।
रूकी हुई भीड़ आगे तब बढ़ गई।
कुछ की नजर उस लड़की पर गड़ गई।
रीत गयी कूची तब गए रीत मन।
मरे कवि को व्याल मार ही दे फण।

आरोप ब्रह्मत्व का
तराशे बेढँगे पत्थर।
मुक्ता‚ मणि और मोती के
हिंडोले पर।
संगमरमरी‚ खुशबूदार
देव मन्दिरों में।
रात की ठिठुर गयी ठंड
काँपती‚सिसकती बयार।

और मन्दिर के
भिड़े किवाड़ों से सटा
एक बेजान जवान बूढ़ा
उकङूँ बैठा
पैर पेट में धँसाये
बर्फ की तरह ठंडे बदन पर
एक कटा–फटा चिथड़ा
चादर के नाम पर फैलाता है।
फैलकर फट जाती है चादर‚
बहकर सूख जाते हैं आँसू।
देवता और मानव का फलसफा–
झूठ की सच पर गहरी छाया।
ब्रह्मत्व का आरोप बजाय जड़ के
जीव में होता‚ जीवन में होता!
पत्थर में नहीं मानव में होता!

-अरुण प्रसाद

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