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श्रमिक

मैं एक श्रमिक हूं‚ मैं एक श्रमिक हूं।
स्टेशन का कुली हूं‚ रिक्शे का इंजन हूं‚
यहां लाल कपडें में‚ ते वहां फटे बदन हूं;
ठेकेदार की लेबर हूं‚ घर घर की महरी हूं‚
गंदा नाला मेरा पता‚ झुग्गी वाला शहरी हूं;
ईंटें का कारीगर हूं‚ भट्ठे पर रहता हूं‚
महलें का निर्माता‚ पर लू–शीत सहता हूं।
कारखाने का मज़दूर‚ खेतविहीन कृषक हूं‚
काम हेतु मशीन हूं‚ भुगतान में कसक हूं।

मैं एक श्रमिक हूं‚ मैं एक श्रमिक हूं।

अट्ठावन वर्ष से शासन मेरे लिये चिंतित है‚
सर्वांगीण विकास का नारा हर जगह चर्चित है;
मेरी दशा पर तरस खाकर विधायक दुखित हैं‚
अतः बार बार कर देते श्रम कानून पारित हैं;
फिर मालिकें से नेटें की गड्डियां खा लेते हैं‚
सेठें से अपने घर–द्वार वातानुकूलित करा लेते है;
न मैं को
बाहुबली‚ र न को धनिक हूं‚
न्याय मुझे क्येंकर मिले‚ मैं बस एक श्रमिक हूं?

मैं एक श्रमिक हूं‚ मैं एक श्रमिक हूं।

धनिकें द्वारा धनिकें हेतु बनाई व्यवस्था इतनी क्रूर है‚
कि मेरा समस्त परिवार ठेकेदार का बंधुआ मजदूर है;
मेरी दैनिक मजदूरी का वह एक तिहाई खा जाता है‚
र अधिक मांगने पर भगा देने की धैंस जमाता है;
मेरी बीबी उसकी अपनी‚ मेरी बेटी से उसका नाता है‚
टेकने पर पीटता स्वयं‚ या पुलिसवाले से पिटवाता है।
कभी भूख से व्यथित हूं‚ ते कभी रोग से ग्रसित हूं‚
मैं उस जीवन के ढेता हूं‚ जिस जीवन से थकित हूं।

मैं एक श्रमिक हूं‚ मैं एक श्रमिक हूं।


तुम्हारे लिये मैं निशिदिन काम करने वाली चीज़ हूं‚
पर मुझे भी लगती है थकन‚ मैं भी हेता मरीज़ हूं;
मुझे भी लगती भूख र प्यास है‚ प्यार की चाह है‚
मेरे भी मन की लालसा‚ गगन में उड़ती अथाह है;
तुम नहीं जानते मैं कहां का हूं‚ क्या हूं‚ कैन हूं?
पर यह ते न भूले कि मैं तुम्हारी तरह इंसान हूं;
आज मैं मैन हूं क्येंकि असंगठित‚ असहाय‚ अशक्त हूं‚
पर शीघ्र ही दिखा दूंगा कि युगपरिवर्तन को सशक्त हूं।

मैं एक कृषक हूं‚ मैं एक श्रमिक हूं।
मैं एक श्रमिक हूं‚ मैं एक श्रमिक हूं।

–महेश चंद्र द्विवेदी

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