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पौध
जब मैं पौधा था
तो अच्छा था…
सुबह – सुबह
मेरी डालियों पर
लिखते थे
नए – नए स्वप्न…
आज मुझे अहसास हुआ
देख कर तुम्हारे हाथों में पत्थर
कि उग आए हैं फल…

मेरी शाखों पर
मैं पौधे से
वृक्ष हो गया हूँ
स्वप्न से एक सच हो गया हूँ
मैं जानता हूँ
अब काटी जाएंगी
मेरी बाँहें…
बनेंगे उससे मकान
खुलेंगी नई दुकानें

परन्तु
कद मेरी जड़ों की
गहराइयों का
तुम्हारी ख्.वाहिशों की
ऊंचाइयों से बड़ा है
बड़ा ही रहेगा
तभी तो …
त्याग और विचार की
नींव पर सदियों से
यह वृक्ष
सचॐ
खड़ा है
खड़ा ही रहेगा
व्यर्थ नहीं जाएंगे मेरे घाव
कुछ बीज हैं इन फलों में
जो जन्म देंगे
नए पौधे को
नए स्वप्न को
नए सच को
नए वृक्ष को

— पद्मेश गुप्ता
 

ऐनक‚ छड़ी और घड़ी
दे कर
मां की आंखों में
प्रतीक्षा की झपकियां
आया था परदेस मैं
लेकर
पीठ पर पिता की
दुआओं की थपकियां
कुछ ही वर्षों में
हो गया वह सब कुछ हासिल
जो पर्याप्त था
चार पहियों के वाहन के लिये
मार्बल के आंगन के लिये
मैं ने भेजा मां को
एक नया ऐनक
पिता के लिये छड़ी
एक नई घड़ी।
शायद उसी ऐनक को पहन कर
मां ने लिखा था
देख सकती हूँ मैं
तुम्हारी तस्वीर
बिना इस ऐनक के भी
हमारे यहां
पिता की छड़ी
लकड़ी की नहीं
लड़के की होती है
तुमने भेजी एक घड़ी‚
बढ़िया!
किन्तु यहां तो
लम्हे – लम्हे आती हैं
प्रतीक्षा की
कितनी ही घड़ियां
इससे पहले कि
रोम – रोम मेरे हृदय का
बांध पाता
निर्णय की कोई डोर
करने लगा इशारा मस्तिष्क
मेरे पुत्र के
नन्हे‚ साफ – सुथरे पैरों की ओर
छोड़ आया हूँ
एक नगर से
दूसरे नगर में
संघर्ष के जो छाले
वही फिर उगेंगे
इन पैरों पर
मेरे लौटने पर
मैं ने रख दिया
किसी कोने में
स्वदेश लौटने का इरादा
मां को दिया हुआ
वह ख़ामोश वायदा
मुजे याद है
एक बार फिर लिखा था
मां ने — अब तो
कहने लगी है
पड़ोसन भी अपने बेटे से…
इतने भी ना लाना अंक
परीक्षा में कि
करनी पड़े
मेरी चिता को
तुम्हारी प्रतीक्षा
एक बार फिर
मुड़ कर देखा था मैं ने
पूरब का गांव
लेकिन
पहने हुए पश्चिम के जूते
मेरे पांव
मैं बढ़ने लगा
चढ़ने लगा
पकड़ कर अंगुलियां
नई पीढ़ी की
नई सीढ़ी पर
आज मेरा पुत्र
किसी और देश के
किसी और शहर में
बना रहा है नए रास्ते
अपने पुत्र के लिये
और मैं
देख तहा हूँ
सामने खूंटी पर
टंगी हुई
एक नई छड़ी‚
मेज़ पर रखी हुई
एक नई घड़ी
पीढ़ी दर पीढ़ी
सीढ़ी दर सीढ़ी
वही छड़ी वही घड़ी वही ऐनक
समय ही नहीं
कुछ और भी
जो देता है
चेहरे को झुर्रियां
यह छड़ी
यह घड़ी
यह ऐनक।

— पद्मेश गुप्ता

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