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एक दिवस की बात

सुन री सखी एक दिवस की बात
दिनकर ने कहा शुभ प्रभात।
अरूण बदन मुदित मन प्रफुल्ल गात
सुन री सखी एक दिवस की बात।।

दिनकर का मन अकुलित था
पृथ्वी से प्रेम दान पाने को।
सब कुछ अपना उसे समर्पित कर
उस ही मे मिल जाने को।
षह इच्छा लेकर मन मे
आया था वह उस प्रभात।। सुन री
...।।

धरा न दे पाई उत्तर तत्काल
ळाज्जा से हो गई लाल लाल।
सकुचा रही थी वह लजीली बाल
संकोच से था हृदय बेहाल।
कह न पाई वह अपनी कुछ बात।। सुन री
... ।।

पृथ्वी का यह मौन भाव
दिनेश को लगा अपमान।
करने लगा धरा पर बार बार
क्रोध से भभक कर वह नादान।
अपने कठोर से कठोर आघात।। सुन री
.. ।।

धरा बेचारी फिर भी रही मौन
सहती हुई प्रहार पर प्रहार।
कष्ट से अकुलाती तन झुलसाती
पीड़ित नयनो से रही निहार।
न किया उसने कोई भी प्रतिघात।। सुन री
.. ।।
कब तक चलता यह उ ंड कार्य क्रूर
थक कर हुआ सूर्य अब चूर चूर।
लगा चुका था शक्ति वह भर पूर
पर फिर भी न पाया उसने पृथ्वी को दूर।
तब हुई उसे अपनी भूल ज्ञात।। सुन री
..।।

आया उतर उच्च आसन से पृथ्वी के पास
लज्जित मुख कम्पित बदन मन उदास।
छिपा लिया पृथ्वी ने निज आंचल मे
दूर हुई थकान क्षण भर मे।
मुंदे नयन हुआ शीत गात।। सुन री
.. ।।

सूर्य धरा का मधुर मिलन
देख सन्ध्या भी मुस्काई।
छिटकाये तारे फैलाई चांदनी
और मधुर समीर बहाई।
अहा कैसी सुन्दर यह रात।। सुन री
... ।।

 -आर्य भूषण

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