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आया है फागुन
आया है फागुन
मेहन्दी के रंग लिये
आया है फागुन
शहरो गॉंवौ में
छाया है फागुन
जीवन में रस
टटोल रहा फागुन
पनघट चौपालों में
डोल रहा फागुन
रंगों में डूबे हैं
संगी साथी
भांग सांसों मे
घोल रहा फागुन
तितली के रंग लिये
आया है फागुन
रक्तिम टेसू रंगों से
पलाशी बारिश
बरसा रहा फागुन
होली के रंग संग
गुलालों के सतरंग ले
बस फागुन ही फागुन


दीप का संदेश सुनो तुम
आओ हम करें मंगल कामना
द्वेष तम मिटाने की मधुगीत सी
नई किरण आशा की जगाने की
रोशन हो जाये मन का कोना
दिये के नेह से धरा पर
बॉंटे हम ऐसा उजियारा जग में
बोध सभी को हो जाये स्वर्णिम लौ का
दीपक न करें तम के मुक्त केवल
कण कण से हर लें चादर अज्ञान की
मिट जाये तिमिर मनुज का ह्यदय में
जग आलोकित हो जाये कर दे उदय
दिशा दिशा उत्सव का सूरज

-डॉ. सरस्वती माथुर

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गुलाबी अल्हड बचपन
.
मैने बचपन के सामान को
अपनी स्मृति के कोटर में डाल दिया है
ताला लगा कर समय का
चाबी को सॅंभाल लिया है
बचपन के घर ऑंगन की
हवाओं में बिखरी किलकारियों
गुलाबी रिश्तों की बिखरी बातों
दीवारों पर टॅगी
बुर्जुगों की
तस्वीरों को
सतरंगी बीते दिनों को
बिखरी यादों के मौसम को
बचपन की धुरी के चारों ओर
चक्कर काटते मॉं बाबूजी
भाई भावज और उपहार से मिले
अल्हड मीठे दिनों को
अमूल्य पुस्तक सा सहेज लिया है
और सॅंचित कर जीवन कोश में
इन्द्रथनुषी सतारंगी चूनड में
बॉंध दिया है
अब यह पोटली मेरी धरोहर है
जिसे  मैं किसी से बॉंट नही सकती
कभी भी बचपन की चीजों को
कबाड की चीजों की तरह
छॉंट नहीं सकती क्योंकि
यह पूंजी है
मैरे विश्वास की
कृति है श्रम की
जहॉ से मैं
आरम्भ कर सकती हूं
यात्रा मन की
गुलाबी बचपन की

-डॉ. सरस्वती माथुर


 

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