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अभिनेत्री के लिये
हे अभिनेत्री
इतनी मशहूर हो तुम
कौन सा पात्र ऐसा है जो तुमने
स्टेज पर अपने अभिनय से जीवंत न बना दिया हो?
कभी भी तुमने ऐसा कोई महिला पात्र नहीं निभाया जिसे
प्रगतिशील न दिखाया गया हो।
बेचारी अबला नारी की छवि वाले पात्र तुमने दरवाजे से ही लौटा दिये।
और अपने वास्तविक जीवन में भी तो तुमने कितने ही पहलुओं को छुआ।
तुमने जाने कितनी बार कहा कि तुम झूठा अभिनय नहीं कर सकतीं
और जो प्रगतिशील विचारों से भरे नाटक मंच पर करती हो
उन विचारों को पहले वास्तविक जीवन में भी उतारती हो।
एक्टिविस्ट तुम बनी।
समाज में फैली कौन सी ऐसी अव्यवस्था है जिसके खिलफ तुमने
आवाज बुलन्द न की हो?
गरीबों, झोपड़पटटियो में रहने वालों के लिये धरने तुमने दिये
उनके अधिकारों के लिये लड़ते हुये भूख हड़तालें तुमने कीं
महिलाओं के अधिकारों के लिये और उन पर होने वाले शोषण के खिलाफ
जब तब तुमने मोर्चे निकाले
यहाँ तक की तुम महिलाओं की आवाज समझी जाने लगीं।
तुम्हे एक जागरूक व अत्याधुनिक महिला समझा जाने लगा
बाकी महिलाओं के लिये एक `` रोल मॉडल `` ।
कितनी बार साक्षात्कारों मे तुमने र्दप से कहा है कि
तुम्हारी तो परवरिश ही जागरूक परिवेश में हुयी है और
अब शादी के बाद का माहौल भी ऐसा ही है।
सही बात है जिसके
माता पिता दोनों एक्टिविस्ट रहे हों।
पिता क्रान्तिकारी कवि हो
समाज को हिलाकर रख देने वाले
नाटकों का दिग्दर्शक हो
पति भी कवि, लेखक, नाटककार और चिन्तक हो
वह ऐसी बातें कहने की पात्रता रखता ही है।
हे अभिनेत्री पर उस दिन क्या हो गया तुम्हारी जागरूकता को?
जब टी०वी० पर बहस के दौरान
तुम्हे सारे देश के दर्शकों के सामने तवायफ कहा गया।
तुम तमतमा गयीं परन्तु चुपचाप प्रोग्राम छोड़ कर आ गयीं।
चलो तुम उस व्यक्ति के निम्न स्तर पर तो गिर नहीं सकती थीं
कि उसके बाल पकड़ कर खींचने लगतीं।
पर बाद में क्या हुआ?
तुम क्यों उस घटना के बाद घर में चुपचाप बैठ गयीं?
तुम तो नारी से सम्बन्धित हर मामले पर सड़क पर आयी हो।
क्या अपने मामले में तुम नारी नहीं थीं या नहीं हो?
क्या तुम्हे भरी सभा में तवायफ कहा जाना नारी का अपमान नहीं था?
तुम अभिनेत्री हो इस कारण तुम्हे गाली दी गयी
क्या ये तुम्हे अपमानजनक नहीं लगा?
याद है दहेज की माँग के कारण दुल्हे को शादी के मण्डप से वापिस भेजने वाली
लड़की के घर तुम घटना के अगले ही दिन पहुँच गयी थीं।
जब कुछ लफंगो ने एक लड़की को तेजाब से जलाना चाहा था
जो अपनी मर्जी से शादी करना चाहती थी।
तब भी बिना समय गवांये तुमने मोर्चा निकाला था।
तब तुमने कहा था
हमला केवल उस पर नहीं वरन
हर स्वतन्त्र नारी पर हमला है।
पाप करना ही नहीं बल्कि पाप सहना भी बुरा है।
एक पत्रकार के अबला नारी शब्द प्रयोग करने पर कैसे
तुमने उसे झिड़का था
कि रोने के पात्र नाटकों एवं फिल्मों में ही भले
और तुम तो वहाँ भी नहीं करती।
यहाँ तो दुर्गा का अभिनय करना है।
तुमने ललकारा था
आज तुम प्रतिनिधि हो नारी की
व्यवहार में इसे जतलाना है।
बुराई पर अच्छाई की जीत का परचम तुम्हे लहराना है।
तुमने उस लड़की से कहा था
मत समझना तुम अकेली हो
तुम एक मुखड़ा भर गा तो दो
लाखों कण्ठ व्याकुल हैं तुम संग कोरस गाने को
तुम एक कदम आगे बढ़ो
माँ, बहनें, बेटियाँ सब मचल रहे तुम संग आगे जाने को।
हे अभिनेत्री
आज तुम खामोश क्यों हो?
आज तो फिर वही वक्त आया है
जब तुम्हे वास्तविक जीवन में
दुर्गा का पात्र निभाना है।
तुम क्यों निर्वासित होकर मौन बैठी हो?
क्या तुम भी ऐसी ही फेमिनिस्ट निकलीं जो
बाहर नारी संस्थाओं में घरेलू हिंसा पर मोर्चे सजाती हैं
निम्नवर्गीय महिलाओंको उनके अधिकार बताती हैं
पर अपने घर में अपने पति से चाँटा खाकर चुपचाप रोकर सो जाती हैं।
कहीं ये सारी जागरूकता की बातें और कुव्यवस्था से विरोध
मंचंीय अभिनय का ही तो विस्तार नहीं थे?
अगर नहीं तो अपने को जगाओ
और अपने साथ हुये गलत का ऐसी ही ऊर्जा से विरोध करो
जैसे तुम औरों के साथ हुये गलत में करती रही हो।
तुम्हारे मौन ने ज्यादा नुकसान किया है।
इस मौन को तोड़ो
देखो वास्तविक जीवन के
रंगमंच का पर्दा उठ गया है और
सब तुम्हारे द्वारा संवाद बोले जाने की प्रतीक्षा में दम साधे बैठे हैं।
अपने लिये निर्धारित पात्र को ढ़ंग से जीओ।
तभी तुम सच्ची अभिनेत्री कहलाओगी

और सच्ची नारी भी।

-राकेश त्यागी

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अभिनेत्री के नाटककार पिता के लिये
तुम्हारे किस रूप की तारीफ की जाये?
ओज भरे कवि की, समाज को दर्पण दिखाते नाटककार की
या मजदूरों व कामगारों के लिये संघर्ष करते एक्टिविस्ट की?
तुमने हमेशा ही गलत के खिलाफ संघर्ष की वाणी बोली है।
कोई मौका ऐसा नहीं गया जब कुछ गलत समाज में घट रहा हो
और तुम्हारी रचनाशीलता मौन रही हो।
तुमने खूब संघर्ष किया शोषितों के लिये
वाणीहीनों को शक्ति भरे शब्द दिये।
तुमने स्वयं द्वारा ओढ़ा हुआ निर्वासन तोड़ दिया
जब मीर बाँकी की खड़ी की हुयी इमारत के खंडहरों को
कुछ लोगों की भीड़ ने गिरा दिया।
तब तुम दिसम्बर की सर्दी में तुम राम को सरजू में नहला बैठे थे
राम का दूसरा बनवास कहा था तुमने
और तुमने कलम में फिर से स्याही भरी थी
तुम्हारे अन्दर बैठे नाटककार और कवि को फिर से सक्रिय हो गया था।
पर तुम्हारी बेटी को तवायफ कहा गया और
तुम्हारी संघर्षशीलता, रचनाशीलता व कर्मशीलता में कंपन नहीं?
ये कलम तुम्हारी मौन क्यों है?
अगर इसकी स्याही सूख गयी है तो
कागज पर न सही धरती पर सही
ये शब्द तो उकेर ही देगी।
नारी पर भरी सभा में फिर आक्रमण हुआ है
और तुम्हारे अन्दर बैठे नाटककार को
इसमें महाभारत की झलक नहीं मिलती?
इतने नाटक तुमने खेले
समाज को चेताने के लिये
और बात अपनी चेतना की परीक्षा की आ पड़ी तो
तुम मौन पड़े हो।

-राकेश त्यागी

 

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