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शरद  

पत्नी के इरादे सी पाषाण
बस, नाराज हो कर  देती कंपकंपी
बेरुखी ऐसी
जैसे निश्चल हवा का  स्पर्श - गुमसुम
तीर की तरह घुसती
शिकायती फुसफुसाहट कानो में
तूफानी चाल से
तुषार की  माला यों  फॆंकी
बिखरा दिये कीमती सफेद मोती
अब सन्नाटा चुभ रहा सुइयों  की तरह 
कब पिघलेगा मौसम का हृदय ?
घेर लिया उच्छवास ने
धुंधलके में
कोड़े सी लगती शीतलहर
और तभी
लाल कपोलों पर रसीले ओंठ
आमंत्रण देते
गरमाहट की बाहों में आलिंगन करने
दहकती सांस मिल गई प्रेम की
क्या समझूं इसे?
कि मैं, शरद और अलाव
याने
पति पत्नी और वो !

  - हरिहर झा
 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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मौसम 

सर्दी आई तो
सिकुड़ गये प्राण
छीन  गई हृदय की उष्मा

जिसमे पंखुड़ियां खिल खिल जाती थी
अबोध चिड़िया मीठे गाती थी
बस, डरा धमका कर
कुरेद गई सिहरन से कम्पित घाव को
खामोश रह कर देखता हूं इस बदलाव
को
और अब महसूस करता हूं बेचैनी से
गर्मी में करवट बदल बदल कर
पसीने में लथपथ  जीजिविषा
तबाही मची है
गतिमान हो कर बह निकली चासनी अंगप्रत्यंग से
चिन्गारियों का यह सिलसिला
जाने कब तक जारी रहेगा
कौन सुलझा पायेगा मौसम की
इन गुत्थियों को
सामने संगमरमर की तराशी हुई मूर्ति
अपने ताज पर
सहनशीलता का भर लिये ऐंठी है
चटख जाने के डर से
अपने वातानुकूलित कक्ष मे बैठी है
बाग में पंखुड़ी
जो सहती है सब कुछ चुपचाप
वितरागी हो कर झुलस जाती है
उसके धर्मग्रन्थ मे यही लिखा है
कि पंखुड़ी झुलसती है
फिजा मे फिर से शामिल होने के लिये
लेकिन जब कर दिया झुलसने से
इन्कार
एकता के हार ने
मूर्ति को गले में चुभना शुरू किया
शोषण के लिये दी गहरी सजा
बदबू देकर लिया सताने का मजा
तो हर हालत में
दांत किटकिटाये
डरावनी सर्द रातों मे
या नफरत के गर्म अंगारों में  ।.
 

    - हरिहर झा

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