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नववर्ष की खिड़की से
नववर्ष की खिड़की से
आने दो
पक्षियों का कलरव
बजने दो
मंदिर की घंटियां
हो जाने दो लीन
अनंत प्रार्थना में।
धूप की रोशनी में
अंगुलियों की
परछाइयों के खरगोश
फुदकने दो
फिर से
बचपन को आने दो
कोई नवगीत
गुनगुनाने दो।
उपले थापती लड़की को
लेने दो सपने
अंतरिक्ष में पहुंचने के
पहाड़ तराशते बच्चे को
अब निकाल लेने दो
अपने लिए स्लेट।
नववर्ष की खिड़की से
मत झांकने देना
आतंक और खौफ के
दरिंदों को
आने दो भीतर
मदमस्त हवा
बादलों
और दूर आकाश में उड़ते
परिंदों को

-विकेश निझावन

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