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खानाबदोश
वक़्त
जब
अपने नुकीले दांत
हौसलों की गर्दन पर रखता है
उम्मीदे कराह उठती है .....
दीवार पे बैठे कुछ
लफ्ज़
आहिस्ता से उतरते है
इससे पहले की ,
वक़्त अपने नेजे को
हौसलों के पहलू मे उतारे ....
ओर
उसके जिस्म को रेजा-रेजा कर दे
ये .......
खानाबदोश लफ्ज़
जख्मी जिस्म को अपनी पीठ पर लिये
लहू लहुहान गलियों से
मीलो खामोश सफर करते है ....
ओर
जिंदगी की बांहों मे
वो शल जिस्म रखते है ......
नए मौसम मे
उगते सूरज के साथ
किसी सरसब्ज तने की माफिक
हौसले फ़िर जी उठते है
जब तक
ये जलावतन, शोरीदा लफ्ज़
किसी सफ्हे की ओट मे ,
दीवार के कोनो पे
अलमारियों के दरवाजो पे
साँस लेते मिलेगे .....
यकीन जानिये
हौसले मरेंगे नही
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