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पीर
भूख से दम तोड़ते बुन्देलखण्ड के किसानों के आर्तनाद को नहीं सुन पार रहे! उनकी धंसी हुई आँखे सूख कर काटा हुऐ शरीर से निकालना चाहते खून लगातार पाँच वर्षो से खुशियाँ लेकर नहीं आ रहा जून डबडबायी आँखों से छोड़ते घर आंगन विवश विधवा और बच्चों के लिए पलायन उनके यहॉ शादी इतिहास के लिए नहीं होती है तलाक, घर का भूगोल नहीं बदलता है आदमी-आदमी को नहीं छलता हैं न रोती ममता, न बचपन सिसकता है जिन्होंने पहली बार अंग्रेजों से बगावत को दिया अंजाम वो जानते हैं, चुप्पी के खतरनाक परिणाम। इसीलिऐ कहते है, जो चुपा गये समय खड़ा है उनकी करने ऐसी-तेसी फिर निकलेगी कूबड़ किसी मंथरा जैसी
सुरेन्द्र अग्निहोत्री |
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