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ढंग

नियंत्रणों को लेकर

सरकार और उनके सिपह-सालारों की जंग

जन के मन पर शिकंजा कसने की

जद्दोजहद का ही है अंग

निरा काल्पनिक भयावह

सपनो से भरते है रंग

सामाजिक जवाबदेही से बेखबर

अपनाते है नया ढंग।


डर

चींटियां पेड़ों से

अंधेरी नम जगहो में जाने लगी

हरिया यह देखकर

मन ही मन घबराने लगी

लगातार सूखा से सूख रहे तन की

आस इस वर्ष भी मुरझाने लगी

पिछले बरस भाई को भी खोकर

हिम्मत नहीं हारी थी हरिया

साहूकार, सरपंच और सिपाही की

नहीं पहुंची थी बखिया

लेकिन अब उसकी हिम्मत

तार-तार हो रही

आने वाले सकंट से

अंधेरे कमरे से रो रही

वह जानती है ललचाती त्रयी

देह के लिए ठहाके लगा रही।
 

सुरेन्द्र अग्निहोत्री
अप्रेल 29,2008

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