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लौट आओ अश्व होकर जिसकी पीठ पर सवार दौड़ाता लाया था जिसे मैं बिन चाबुक, बिन मार, वही अश्व अचानक अड़ गया, बीच राह में बिगड़ गया और गिराकर मुझे गोदते हुए मेरा ज़िस्म अपने पैने खुरों से, दौड़ता जा रहा है सरपट, टपटप-टपटप ! उसकी मन्द होती टापों से मैं लगाता हूं अनुमान, बहुत दूर जा चुका है वह। मैं कराहता हूं, और दबी आवाज़ में पुकारता हूं : लौट आओ अश्व, मेरे यौवन, ओ प्यारे वक्त !
डॉ0
रामनिवास 'मानव |
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