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आसन्न त्रासदी

समाज शास्त्र का छात्र रहा हूं, मैं मानव-विज्ञान का ज्ञाता हूं,
निद्रा
-निमग्न देश को मैं, आसन्न त्रासदि की कथा सुनाता हूं। 

महिला पर आधिपत्य हेतु लड़ना, पुरुष का मूल स्वभाव रहा है,
पद्मिनी
, क्लियोपैट्रा का, विश्व-इतिहास पर गहन प्रभाव रहा है। 

विडम्बना यह कैसी है, जिसके लिये पुरुष जान लडाता है,
उस
नारी के जन्म-पालन से बचने को, हर उपाय अपनाता है। 

पहले कन्या के जन्म के उपरांत, उनकी हत्या की जाती थी,
अपनी
मुद्राओं से आकर्षित कर, उनमें कुछ बच जातीं थीं। 

मानव की ज्ञान-पिपासा ने, उसका तृतीय नेत्र जब से खोला है,
ध्वनि
-यंत्र द्वारा, गर्भस्थ शिशु के स्त्री-पुल्लिंग का भेद टटोला है।

तब से भारत देश की हर कन्या, मॉ के गर्भ में असुरक्षित है,
नारी
को देवी कहते हैं हम,  हमारी सोच स्वार्थ में सीमित है। 

जीवन-रक्षा हेतु वचनबध्द चिकित्सक, अपने को बेचता रहता है,
चंद
टकों के लिये, जीवनदायिनी कन्या का भ्रूण क्षरण करता है। 

आज प्रत्येक जनगणना में, पुरुष से नारी का अनुपात घट रहा है,
स्पष्टत
: करोडों पुरुषों के, चिरकुंआरे मरने का दुर्भाग्य बन रहा है।

मानव प्रवृत्ति है, कि जब किसी वस्तु का टोटा पड़ने लगता है,
उसका
संचय धनी, निर्धन, युवा, वृध्द, पतला, मोटा करने लगता है। 

टोटा पड़ने पर शक्तिशाली पुरुषों में नारी संचय का अभियान चलेगा,
उस
हेतु वह अर्थ और सत्ता की शक्ति का जमकर दुरुपयोग करेगा। 

शेष कुंआरे बचे हुए पुरुष, जाति, धर्म, देश जैसे युध्दों को भूल जायेंगे,
परंतु
एक नारी हथियाने हेतु, आतंकी बन लड़ेंगे, मरेंगे मारे जायेंगे। 

अत: पुरुषो! बंद आंखें खोलो, स्वयं पर आसन्न त्रासदी को पहचानो,
कन्या
के जीने का अधिकार छीनो, चाहे देवी मानो अथवा मानो। 

     -महेश चंद्र द्विवेदी

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