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माया एंजलू से हुई मेरी बात 

माया

तुम इतनी काली क्यों हो ?

काले सपनों में

अकसर तुमने

किसी दहशत को भभूका होते देखा है .

बिना चीख के नींद टूटी है ..

एक साइकी

तुम्हारे मस्तिष्क की संरचना में अटकी है

और तुम नन्हीं उँगलियों से कुरेदकर

अपने काले ओठों को

कहती हो

गाओ ..

कुछ तीखा...

झपटकर

बिजलियों को  गाओ ...

कि डर अपने अंधेरों में

जुगनू पकड़ सकें

या बेलौंस ..

 पिंजरे में बंद चिड़िया

हुक हु हू

हुक हु हू करती

पहाड़ों के सीने भेद

आकाश से कह सके

तेरे सफ़ेद नीलेपन पर

मेरा बादल अटका है

एक टुकड़ा

तेरा भी तो काला है !

जिसमें अकसर कौंध जाती है

लपककर बिजलियाँ .

माया

तुम उजले पक्षियों को

उजले आकाश में उड़ता देखती हो

सूरज के लाल पानी में

डुबकी लगाते

हरी दूब पर

जीवन के केंचुए पकड़ते

तो हताशा की तीलियों से

टकरा जाते हैं पंख

उनके फड़फड़ाने पर

गोल घूमती अनुगूंजें

हरे जंगल  को तोड़ती हैं

तुम्हारे गीतों की छाया

अनायास लम्बी हो जाती हैं

जैसे पकड़ लेंगी अभी

स्वतंत्रता के सूरज को

और पूछ बैठेंगी

इस बार ग्रहण कैसा है ?

तुम जानते हो

क्या घटता है

जब कोई सफ़ेद उजाला

तुम्हारे भीतर के ग्रहण पर

अपना दाह रखता है ...?

तुम और काले हो जाते हो

पूर्ण ग्रहण की तरह  ..

इस काली कैद में 

मुझे तब तक गाना होगा

जब तक टूट न जाए

तीलियों के भ्रम

पिंजर में सिहरकर बैठ जाए आकाश निस्सीम

और जी सकूँ  मैं

स्वतंत्रता के उजालों में

स्वाभिमानी कालापन .

माया

इस बार फक्र से दुनिया को

सुना देना  अपना आत्मकथ्य

उन्हें चुप सुनना होगा

और इस बार बिना दहशत के

काले सपनों को जी पाओगी

चीखकर .

अब चुप न रहना .

-अपर्णा मनोज

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