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अभियोगिनी गंगा


गंगा एक नदी
आस्था और विश्वास की देवी
तारती है, जिलाती है
आत्मा को, जीवन को
आरंभ से अंत तक
देती है शांति शक्ति अमरत्व
किंतु
स्वयं गंगा की नियति?
बंधन और श्रापित

कभी ब्रहमा का कमंडल में
तो कभी शिव की जटाओं में
कभी बनी विष्णु त्याज्या
कभी पुत्रहंता

रखने को मान
करने को श्रापमुक्त
एक था मनु वंशज भागीरथ
किया था मुक्त जिसने गंगा को
शिव की जटाओं से
तारने को अतृप्त
सगर पुत्रों की आत्माओं को

तब से जान्हवी की अजस्त्र धारा
गवाह रही संस्कृतियों के उत्थान
और पतन की।
बझाती रही प्यास
धरती की, इसके पुत्रों की
बिन पक्षपात

फिर
आज क्यों सगर वंशजों ने बांध दिया
हिम सुता को उसके ही घर में
बुझाने को प्यास
आधुनिक हस्तिनापुर वासियों की
कि रोशन हो सकें उनके राजप्रासाद
क्लब - मॉल - पंचसितारा होटल
भरते हुए स्विंमिंग पूल
क्षीण से क्षीणतर हुई धार गंगा की
प्यासे रह गए कस्बे और गाँव
सूख गए ताल, रेत से भर अवरुद्ध हुई नहरें

प्यासी धरती सूखे मटके
सूनी आंखें
अब किसकी खाएंगे कसमें
कौन तारेगा उनकी मृतात्माओं को

अब जीवनदायिनी बांटती है मृत्यु
बहता है ज़हर उसकी तरंगों में
लालच का, स्वार्थ का
गंगा को फिर भोगना है श्राप
अपने ही पुत्रों को मृत्यु बांटने का

सगर के वंशज
हस्तिनापुर में झिलमिलाती रोशनी
रंगीन फव्वारों के बीच
बैठ कर करते रहेंगे चिंता
करोड़ों भारत वंशियों की
उनकी अतृप्त आत्माओं की
गंगा की व्यथा की

कलयुग में फिर अभियोगिनी बनेगी ग ंगा
अपने औरस पुत्रों की हत्या की
भली मगर चंचल गंगा आजन्मा श्रापित है
अपने पुत्र भीष्म की तरह संज्ञा शून्य है
राजाज्ञा पालन को विवश है

गंगा के औरस पुत्र भोगेंगे
वही श्राप जब सतयुग में डुबोए थे
अपने ही जल में उनके नवजात शरीर
अब प्यास में डूबेंगे वे अपनी
वे करोड़ों पुत्र गंगा के
या पिएंगे जहर गंगा के स्तनों में बहता

गंगा ! हे चंचले !
अब कौन तारेगा खुद तुझे?


डॉ. अनिल कुमार दीक्षित
28 नवंबर 2014

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