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अमजद अली का सरोद वादन और चीख

अमजद अली सरोद को गदबदे खरगोश की तरह
अपनी गोद में रखते हैं, और हौले से साज मिलाते है
तार हिचकी के साथ गला साफ कर लेते हैं
उनकी गमक छुरी की धार रेतने सी है

अमजद अली की आँखें राग की चमक में बन्द हो जाती हैं
जादुई डिब्बे से रातरानी जग कर बाहर झाँकने लगती है
झिंझोटी की साढ़े नौ ताले झमक झमक चलने लगती हैं

तभी मेरी नजर एक चीख पर पड़ती है, जो कोहनी पर
ठुड्डी टिकाये सुरों को कतार में झुमते देखती है
उसकी आँखें सुन्न हैं, उसकी झूम तबले के भीतर बन्द हैं
तबले की धमक को झिंझोटी रेशम से बुन लेती है

मैं उस चीख को सुरों के जाल में कीड़े सा फड़फड़ाते देखती हूं
तो वक्त का अन्दाज मेरे हाथ से छूट जाता है
मालूम नहीं कि सभागार में किसी ने उसकी अंधी आँखों में झाँका या नहीं

अमजद अली के तिल्लाने से एकला चलो तक
मैं चीख को नकार देती हूं, वह एक नन्हे बच्चे की तरह
अंगूठा चूसने लगती है, ऊँघ जाती है

अब मैं चैन से अमजद अली को सुन सकती हूँ
न जाने क्यों उस सोती हुई चीख की आवाज
झिंझोटी , तिल्लाने और एकला चलो पर भारी पड़ती है

वह मुझे जोर जोर से पुकारती है, उन चोपालों में
जहाँ झाड़ियों पर वे पताकाएँ चिथड़े बनी लिपटी है
मैं उन उस्तादों के साजों पर टूटे तारों को जोड़ना चाहती हूँ
जो नोटंकियों के साथ नीमबेहोश है, सर्पमकलि के पाश में

उन सब सुरों, धुनों और लहरियों के बीच में
जो नाबालिग चीखे बन, बहरा कर रही है

अमजद अली का सरोद, बहरों की भाषा नही जानता

और मै चीखों की अनचीखों से लगभग बहरी हो चुकी हूँ


 

-रति सक्सेना
7 दिसंबर 2014

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