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विक्षिप्ता-I


तुम यही देख रहे हो न कि मैं तुमसे अलग हूँ

क्या तुमने कभी यह जानने की कोशिश की है की मैं ऐसी क्यों हूँ

हाँ , मुझ पर मेरा जोर नहीं है

पर तुम्हारा तो अपने आप पर है न

फिर क्यों तुम मुझे देख कर दबी हुई हंसी हँसते हो

क्यों तुम फुसफुसाहटों में मेरे बारे में बात करते हो

तुम यह क्यों नहीं जान पाते कि कभी तो मैं भी अपने बस में होती हूँ

चाहे क्षण भर के लिए ही सही

उस वक़्त मुझे सब पता चलता है कि तुम मुझ पर हंस रहे हो

तुम मेरे बारे में ही बात कर रहे हो

तुम क्यों ये समझ नहीं पाते उस समय की मेरे सीने में भी एक दिल है

जो तुम्हारी ही तरह धडकता है

कि मेरे भी वही ख्वाब हैं , वही तमन्नाएं हैं जो तुम में हैं

एक बार तो मेरे भीतर झाँक कर देखो

मेरे अंतर में उतर कर देखो

फिर जान पाओगे कि मैं कैसा महसूस करती हूँ

जब तुम मुझे उपेक्षित करते हो

पर क्योंकि तुम नॉर्मल  कहे जाते हो

अपनी भावनाओं को छुपा जाते हो इसलिए विक्षिप्त नहीं कहलाते हो

और मैं हूँ कि जो दिल में है वही जुबां पर ले आती हूँ

यह नहीं समझ पाती हूँ की ये दुनिया सिर्फ दिखावे पर चलती है

इसीलिए विक्षिप्ता कहलाती हूँ .....

 

दोस्तों मैंने ये कविताएँ उन सभी सत- आत्माओं को ध्यान में रख कर लिखी हैं जिन्हें डॉक्टरों ने 'मेंटली चैलेंज्ड' साबित किया है. आप सबसे बस एक अनुरोध है कि आप जब भी ऎसे किसी व्यक्ति से मिलें तो उस पर/ उन पर न हँसे और न ही दया दिखाएँ. सिर्फ उनके जूते में पैर डाल कर देखें तो आपको स्वयं ही उनकी व्यथा समझ आ जाएगी. उनसे सच्चा स्नेह रखें या कम से कम एक सच्ची हमदर्दी तो रखें .    

सुनीता सनाढ्य पाण्डे

7 दिसम्बर 2014

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