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मुझे मालूम है
मुझे मालूम है
तुमने बहुत सहेज कर
सबसे आँखें बचा कर
दुछत्ती में छुपा कर
रख दी होंगी एक भूरी अटेची में
एक आसमानी साडी, एक लाल अंगरखा
एक चेक का कोट , कुछ स्कार्फ
पानी के रंग की तीन दर्जन चूड़ियाँ
इतर की औनी पौनी बोतलें
कुछ ख़त, और खतो के बंडलों और
कविताओं की पुरानी किताबों के बीच
सूखे हुए पीले गुलाब और रजनीगंधा
मुझे मालूम है तुम कभी नहीं खोलोगी
यादों की सतहों की गठरी
जिसे हमने एक साथ बाँधा था
तुम्हारी चुन्नी के छोर की गाँठ में बंधा
एक बैंगनी नीलम शायद किसी
अंगूठी में कभी जड़ा नहीं जायेगा
हम शायद कभी एक साथ भुट्टे,
बुढ़िया के बाल या चने नहीं खायेंगे
कभी एक साथ पहाड़ों में छुट्टियां नहीं मनाएंगे
कभी आमने सामने आगये तो एक दूसरे से
नज़रें बचा कर निकल जायेंगे
और शाम को घर लौट कर आइने में
झांकेंगे और आँख की कोर में छिपे
आंसूं को रूमाल से पोछ कर
रोज़ मर्रा के कामों में लग जायेंगे
समय के साथ हर सच झूं और हर झूंठ सच हो जाता है
इतिहास की परिभाषा अंतरिम होती है अंतिम नहीं
समय आने पर दुछत्ती में सहेज कर छुपाई हर गठरी खुलती है
और गर्द में लिपटा हर ख़त पढ़ा जाता है
एक व्यक्तिगत यथार्थ सामाजिक नहीं होता
और सच पूछो तो समाज का कोई अर्थ नहीं होता
तुम्हें छूना , तुहारे हाथों को थामना
तुम्हारी आँखों में झांकना
और तुम्हारे ज़र्द ओंठों से लाली की एक एक बूँद को चुरा लेने के अतिरिक्त
मेरा और कोई सच नहीं है
और मैं जानता हूँ कि मेरा सच तुम्हारा झूंठ है
जब शब्द सच न कह पायें तो व्यर्थ हैं
और प्रेम के सारे उपालंभ सारे पर्व अनर्थ हैं
हम जो प्रतिदिन एक नए सम्बन्ध का आविष्कार कर लेते हैं
जब पीछे मुड कर देखते हैं तो एक आत्मग्लानि को छोड़ कर कुछ नहीं पाते हैं
और शायद इसलिए समाज के बनाये संकीर्ण पुलों पर चाहे अनचाहे
मतलब बेमतलब बढ़ते चले जाते हैं
मुस्कुरा कर सच्चे झूठे रिश्ते निभाते हैं
और एक दिन खोखले हो जाते हैं
 

- मधुप मोहता  

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