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।। प्रकृति की कविताएं  ।।

 

1.    सूखना
 

इतना रो लेना

कि तुम्हारे फूटने से

बनाई जा सके एक नदी

एक पहाड़ के

फूट-फूट कर रोने से ही

बनीं होंगीं नदियाँ

आंसुओं के सूख जाने पर

बनें होंगें रेगिस्तान

इतना मत सूखना

कि फूटने पर

एक भी धार न निकले I

 

2.   पेड़पन

हम एक ऐसे पेड़ हैं

जिनके पैरों तले

ज़मीन और जड़ें भी नहीं

सूखी हुई बाहें हैं,

उनमें पत्तियां भी नहीं

हमारे सूखे हुए में भी

इतनी आग नहीं कि

किसी ठंडी देह को दे सकें,

जब हमनें अथाह

भागने की ज़िद पकड़ी थी

तभी हमनें अपना

पेड़पन खो दिया था I

  

3.    दस्ता
 

सूखे पेड़

सूखी पत्तियाँ

हरा कुछ भी नहीं

बचा हुआ हरा भी

सूखे में शामिल है !

हरा इतना सूखा है,

जितना कुल्हाड़ी का दस्ता I

 

  
4.   आह !
 

प्रेम अगर दिखाई देता

तो वो किसी फूल की तरह दिखता

जिसमें होता मधु या बनता जिनसे इत्र

किसी पंछी की तरह दिखता

जिसे सरहदों से कोई मतलब न हो

और वह उड़ता रहता

जहां तहां पंख पसारे

 

प्रेम अगर सुनाई देता

तो किसी कोयल की कूक की तरह सुनाई देता

जिसे ढूँढते हुए

तुम्हारी गर्दन दुखने लगती

बांसुरी से निकली ध्वनि की तरह होता प्रेम

जिसके लिए बांस के पेड़ों ने

अपनी कुर्बानी दी होती

 

प्रेम की अगर कोई गंध होती

तो वो ठीक उसी तरह महकती

जिस तरह रात में

रातरानी, या फिर

पहाड़ों से आती मटमैली सी गन्ध !

 

प्रेम का अगर स्वाद होता

तो वो ठीक उस निवाले की तरह होता

जो बचपन में तुम अपनी माँ के हाथों से खाया करते थे

एक मोटी रोटी और नमक जितना

ही स्वाद...

 

प्रेम की छुअन अगर होती

तो वो ऐसी होती

जैसे किसी घाव पर मरहम लगाते वक़्त

कोई उसे छूता है पहली दफ़े

और मन में ही निकलती है

एक मीठी सी आह !

 

5.   गाँव को देखा

 

हमने तुमने

गाँव को देखा

हवाओं के सैकड़ों थपेड़े देखे

उड़ते हुए मकां

तैरते हुए घर देखे

कपकपाते हुए हाथ

लड़खड़ाते हुए पाँव को देखा

हमने तुमने

गाँव को देखा

आंखों में एक उम्र देखी

आस देखी, प्यास देखी

बीहड़ो के राज़ देखे

कांटो की पत्तियाँ, काँटों के फूल

काँटों की छांव को देखा

हमने तुमने

गाँव को देखा!

सूखे रास्ते देखे

सूखे जलकुंड

सूखे पेड़ों के काँटे देखे

कभी न बहने वाली नदी

कभी न बनने वाली नांव को देखा

हमने तुमने गाँव को देखा।

  

 

6.      ख़ाली

 

कोई भी ख़ाली चीज़

देखता हूँ तो सोचता हूँ...

इसमें पौधा लगाया जा सकता है या नहीं ?

 

सोचता हूँ

जो पेड़ काटने के बारे में सोचता होगा,

वह आदमी कितना ख़ाली होगा I

  

7.      आदमखोर दुःख

 

दुनिया के किस हिस्से से आता है दुःख?

कहाँ से होती है दुःख की उत्पत्ति

वह सांप की तरह रेंगता हुआ

जहाँ से आता हैं,

वहाँ से एक लकीर खींचते चला आता है

राह में हर मिलने वाले को छूता हुआ,

नदी के बहने की विपरीत दिशा से

गाँवों को उजाड़ते हुए आता है,

पेड़ों के बढ़ने की दिशा से ठीक उल्टा

उनकी जड़ें बिखेरने को आता है,

पाँव तले की ज़मीन खिसकाने

नींव हिलाने और छत उड़ाने

खेतीहर ज़मीं को बंज़र बनाने आता है दुःख!

शायद इसीलिए

किसानों के भण्डारगृह दुःखों से भरे पड़ें हैं.

दुःख उसका पूरा अनाज पहले ही खा चुका है

अब दुःख आदमखोर हो चला है I

 

8.    चाह
 

उम्र बढ़ रही है

गुज़र रही है

या बढ़ रही है

पता नहीं ...

तने के व्यास

छाल की झुर्रियों

में बढ़ोतरी लगी हुई है

भीतर से जितना नम्र कभी था

बाहर से ठीक उतना ही

कठोर हो रहा हूँ,

सदियाँ गुज़ार दी

एक ही जगह पर!

 

गुज़रा हुआ भी

केवल घटित ही हुआ

जिया हुआ नहीं!

 

चाहता हूँ

किसी दिन

किसी के लिए

घटित हो जाऊँ
और वह जी ले!

 

9.    छोटी सी इच्छा

 

तारों से लबालब

भरे आसमान को

दिल में समाने के लिए

आसमान से बड़ा दिल नहीं

 

प्रेम से लबालब भरा हुआ

एक छोटा-सा दिल चाहिए होगा

 

पूरी पृथ्वी को समाने के लिए

पृथ्वी से बड़ी इच्छा नहीं

 

चाहिए होगी

प्रेम कर पाने की

एक छोटी-सी इच्छा I

 

 

10.  गिलहरी की उड़ान

 

मैं लेना चाहता हूँ

सूरज से कुछ रोशनी

और बन जाना चाहता हूँ एक सुबह

जो किसी चिड़िया के चहचहाने की वज़ह बन जाए,

 

चाँद से कुछ चमक ले लूँ,

और बन जाऊँ चमकती लहरें

जो किनारे पर जाकर

कछुओं के बच्चों को

अपनी गोद में बिठाकर

समंदर तक छोड़ आयें

 

मैं रात से कुछ

अँधेरा भी लेना चाहूँगा

और बन जाना चाहूँगा एक नींद

जो बच्चों को सपनों की दुनिया में ले जा सके

 

मैं पेड़ों से उनकी शाखाएँ चाहता हूँ,

कुछ समय के लिए

और बन जाना चाहता हूँ एक झूला

जिस पर एक बाप

अपने बच्चे को एक ऊंचा-सा झोटा दे पाए

 

मैं परिंदों से

उनके पंख लेना चाहता हूँ

ताकि मैं एक लंबी उड़ान भर सकूँ

वही उड़ान

जो किसी गिलहरी ने अपने सपने में

देखी होगी I

 - मुदित श्रीवास्तव
ग्राम खापाभाट
, जिला छिंदवाडा
मध्य प्रदेश

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