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बुरे दिनों के बाद

बुरे दिन जब चले जायेंगे पूरी तरह
हम लौटेंगे अपने भीतर
दूरियों को फाड़कर
सिलेंगे नजदीकियों की जेबें
भरेंगे उनमें हँसी के
खील-बताशे

नदिया के किनारे पड़ी नाव को
धकेल देंगे पानी में
नाव की सूखी देह में जब सीझेगा पानी
महक उठेगी मिट्टी नाव की
जब सूखी दरारों में घुसेगा पानी तो उठेंगे बुलबुले
जो भले ही ख़ुशी न दें किसी और को
लेकिन नाव के कानों के पीछे होगी
मीठी-मीठी गुदगुदाहट
धारा के बीच हमारी आँख बचाकर
इठलायेगी काठ की नाव

तब छुएँगे हम पानी को
देखेंगे उछलती मछली को
अंदाजते हुए उसकी धड़कन
छू लेंगे हम अपनी ही धड़कनें और बन जाएँगे
संगी-साथी उसके
पूछेंगे उससे “बोल मेरी मछली कित्ता पानी”
वह नापेगी जब तक नदिया की थाह
तब तक हम निकल जायेंगे
दूर यात्रा पर

बुरे दिन जब चले जायेंगे अपने देश
हम मिलेंगे सबसे पहले अच्छे दिनों से
अच्छा वाला पहला दिन कैसा होगा?
आम की ताम्बई पत्ते-सा
दसबजिया के गुलाबी फूलों-सा
या माँ की लाल बिंदी-सा

देखेंगे उसकी धज को हम ध्यान से
फिर निकल जायेंगे कटहली वन की ओर
जहाँ डालियों पर लटक रहे होंगे
पीले पके कटहल
कई फल अपनी पकास नहीं सम्हाल सके होंगे
उन फलों में पड़ गये होंगे दर्रे
काँटों ने छोड़ दिया होगा नुकीलापन
अच्छे दिनों में वे भी तो बन जायेंगे अच्छे
पके कटहल के कोयों की
फैलेगी भीनी-भीनी मीठी गंध

फलों को छेदकर खा रहे होंगे कौए
हम बिना सकुचाये ही
माँग लेंगे पका कटहली कोया उनसे
बुरे दिनों के बाद लगती है न !
भूख भी अच्छी

पहचानेंगे हम अपने हाथों को
छुएँगे उँगलियों से हथेलियाँ को
देखेंगे पाँवों की अच्छी चाल को

पत्थर पर चित्त पड़ी
पथरचटा की बेल पर झुककर पूछेंगे
उसके जिन्दा बने रहने का राज
बुरे दिनों के बीहड़ वक्त में

बिना दीया जलाए पूरी की पूरी रात को
आने देंगे घर में
फिर उतार लेंगे उसके काँधे से
सपनों का बड़ा थैला
नींद की चादर खींचकर उसके हाथ से
बिछा लेंगे खाट पर
और करेंगे प्रतीक्षा नींद की
क्योंकि
बुरे दिनों में सबसे ज्यादा
झेलती हैं हमारी रातें
अच्छे दिन आते ही सबसे पहले सुलाऊँगी
अपनी रातों को |

- कल्पना मनोरमा
 

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