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।। नीरज मिश्रा की कविताएं ।।

ज फ़िर हवाओं में बासुरी की आवाज़ घुल गई है
देखो मोर किसी के कदमों की आहट सुन रहे हैं
एक साथ रोने लगीं हैं खुश होकर बृज की सभी गायें
माखन किसी शगुन की तरह तैयार है
यमुना आज फ़िर उफ़ान पर है
जल से ज़ुबान खारी,
प्रेम और भी गहरा हो गया है
नंदगाँव, बरसाना, बलदेव, गोवर्धन, गोकुल
सब प्रेम के पर्यायवाची
चौरासी कोस में फैल गयी है महक भंडारे की
सज गये हैं झूले वन-उपवन में
आज वन के कांटे फ़िर से चुभने लगे हैं
बृज की मिट्टी आज फ़िर मरहम बन गयी है
अपने बाल रूप में अक्सर बृज को लौट आते हैं कृष्ण
अब इस पावन भूमि को छोड़कर
बैकुंठ कौन जाए?

*****

मैने तुम्हारे लिए चन्द्रमा से साठगांठ की
तुम्हारे लिए सूरज को सींचा मैने
तुम्हारे लिए दोपहरों को बेइज्जत किया
सुबह को देर तक उलझाए रखा बातों में अपनी
रात को अंधेरों से महरुम किया
शाम को नज़रबंद किया सिर्फ़ तुम्हारे लिए
कई बार मौसम की तस्करी की
दिशाओं पर टोटके किये
बारिशों को उलझाया,
तुम्हारे शहर में देर तक बरसने के लिये
आसमान को डराया और चुप कराया कई बार
ऐसा करने में तुम्हारी कोई रज़ामंदी नहीं थी
इस क़ुदरती असंतुलन का दोष मुझ पर है
मैं अपने गुनाह कबूल करता हूँ
तुम्हारा प्रेम पाना मेरी आख़िरी इच्छा है

- नीरज मिश्रा

मोबाइल – 9760540595

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