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क्षितिज ये नहीं

क्षितिज़ ये नहीं।
आज जहॉं खड़ी हूँ मैं
ये मेरी मंज़िल नहीं।
चलना है मुझे और
और बहुत दूर जाना है
ज्ािं.दगी के सफर में
कुछ बनकर दिखाना है।
क्षितिज़ ये नही।
मुझे और
बहुत कुछ करना है
रोते हुए के ऑंसू पोंछकर
उदास दिल को हँसाना है।
किसीको सपने दिखाकर खुशियों के
अपने सपनों को पूरा करना है
मुझे ज़िदगी में कुछ बनना है।
क्षितिज़ ये नहीं।
मुझे तो और बहुत दूर जाना है
होठों पे मुस्कुराहट सजाके
गम को भुलाना सिखना है।
लिखे गये अफसानों में
अपना नाम जोड़ जाना है
जाते जाते दुनिया से
अपना नाम छोड़ जाना है।
हॉं सच है ये
यही जो मैने कहा है
क्षितिज ये नहीं।
अभी तो मरने से पहले ज़िदगी में काफी कुछ करना है
अपने पैरों पे खड़े होके
मुझे आगे चलते जाना है
जब तक रहे ज़िदगी
क्षितिज़ की ओर बढ़ते जाना है।
क्योंकि
हकी.कत तो यही है
क्षितिज़ ये नहीं
क्षितिज़ तो अभी दूर है।

– आरती होनराव

सरहद

सरहद पर न जाने कितना खून बहा था उस दिन।
मुझे तो सिर्फ याद है इतना
मेरे घर चिराग नहीं जला था उस दिन।

वहां गोलियां चलीं और ज़ख्म यहां लगे थे,
उस दिन सिर्फ सरहद नहीं सारे शहर मुर्दाघर लगे थे।
कितना खुश था समा मगर, सारा कुछ खत्म हो गया।
सरहद पर चली गोली मगर
यहां किसी का भाई किसी का पति
किसी का बेटा खो गया।
एक का नहीं पता नहीं कितनों की गोद
कितनों के सुहाग उजड़े थे उस दिन
पता नहीं कौन कौन यतीम बना था उस दिन।
चंद लोग अपने स्वार्थ के लिये
गुल गुलिस्तां उजाड़ देते हैं।
सरहदों पार चलवा कर गोलियां,
सारा जहां उजाड़ देते हैं।
मरते नहीं वो . . . . .
मर तो जाता है निर्दोष कोई।
हो अपना या पराया,
निर्दोष होता है हर कोई।

सरहद के उस पार रहने वाला भी
घर गृहस्थीवाला होता है।
सरहद के इस पार रहने वाला भी
घर गृहस्थीवाला होता है।
फिर क्यों अपनी घर गृहस्थी छोड़ कर
कोई सरहद पार गोलियां चलाता है?
वही हाथ जो हल चलाता था कभी,
आज गोलियां चलाता है।

सरहद पर जब मरता है एक इन्सान कोई,
घर में उसके सभी लोग मर जाते हैं।
क्यों आखिर मरता है और मारता है कोई?
जब ऐसा करने से कई लोग बेवजह, बेमौत मर जाते हैं!

करे दुआ दिल मेरा यही,
न किसी सरहद पर गोली चले।
करे दुआ हर दिल यही,
न खून की बू फैले,
हर तरफ अमन की हवा चले!

– आरती होनराव

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