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(प्रस्तुत कथा श्री रामकृष्ण परमहंस अपने शिष्यों को माया का प्रभाव समझाने के लिए सुनाया करते थे।)
अब सुनिएः नारदमोह निवारण

श्रोताओ सुनो यह पुरानी कहानी
नारद जी थे एक मुनि महा ज्ञानी
सालों तक की घनघोर तपस्या
सोच लिया माया का कट गया पत्ता
सोचते ही ऐसे हुआ यह गुमान
जिससे उपजा भयानक अज्ञान
माया को चुनौती देने का किया ध्यान
मन की गति से पहुंचे जहां थे श्री भगवान
प्रभु बोले नारद कैसे आना हुआ आज
कैसा है सारा मृत्युलोक का समाज
नारद जी बोले प्रभु जानते हैं आप
छाया मृत्युलोक में आपकी माया का प्रताप
किन्तु प्रभु सुनिये बड़े काम की बात
इस दास पर माया न कर सकेगी हाथ साफ
नारद जी बोले प्रभु मेरा यह अन्तर
कामनाशून्य जैसे बिल्कुल हो ऊसर
वासना का नहीं इसमें उग सकता जर्म
हार जाएगी मुझसे आपकी माया यह निर्मम
मुझसे टकरा के आपकी माया यह ऐसी
खम्भा नोचेगी जैसे खिसियाई बिल्ली
प्रभु बोले नारद तुम उड़ाओ न खिल्ली
माया कभी नहीं बैठेगी बन के भीगी बिल्ली
ग़लती करोगे करके माया को अन्डरएस्टीमेट
कर सकती है यह आपका पूरा मटियामेट
नारद जी बोले प्रभु बकते हैं आप
दम है अगर तो दिखाओ कुछ हाथ
अन्तर है मेरा एकदम निष्पाप
माया स्टैन्ड नहीं करती यहां चान्स
प्रभु बोले नारद चलो चलें भ्रमण को
क्षीरसागर से होरही बड़ी बोरियत मुझको
चलते चलते आगया एक मरूस्थल
प्रभु बोले नारद अब चलना बड़ा मुश्किल
लग रही है वत्स मुझको बड़ी प्यास
आगे जाकर करो तुम जल की तलास
ले आओ मेरे लिये कमंडलु भर पानी
नारद तुम तो हो महा विज्ञानी
नारद जी चले थोड़ा सा ही आगे
देखा बड़ा सा एक महल है सामने
द्वार पर जाकर बजाई जब घंटी
नवयुवती निकली एक अति सुन्दरी
नारद जी बोले सुमुखि तुम्हारा क्या नाम
तुम्हारे रूप का मैं हूं चिर गुलाम
युवती बोली प्रभु अन्दर पधारिये
कृपा करके मेरे मां बाप से मिलिये
श्रोताओ नारद जी की होगई शादी
मियां बीबी बच्चे सभी पूरी बरबादी
बारह साल तक चला यह चक्कर
बाढ़ एक फिर आयी भयंकर
बह गया नारद जी का सारा परिवार
मन में उनके होरही व्यथा अपार
इतने में आयी यह कानों में आवाज़
नारद जी क्या आगए लौटके आप
चौंक कर नारद ने उठाई जब आंख
विस्मय से मुख खुल गया अपने आप
न देखा कहीं भी एक बूंद जल
जल रहा था कठिन धूप से मरूथल
आवाज़ आई फिर नारद सुनते हो क्या
तीस मिनट से मैं बैठा हूं यहां
आशा है लाए हो मेरे लिए पानी
वत्स होरही क्यों ऐसी हैरानी

– लक्ष्मीनारायण गुप्त

जीवन का संगीत

जीवन का संगीत
बज रहा अविरल अक्षुण्ण
तुम भी इसमें
अपनी तान मिला दो।
कान्हा का यह रास
चल रहा निशिदिन
तुम भी इसमें
अपने कदम मिला दो।
‘‘रस ही है परमात्मा.,’’
कहती है श्रुति
आस्वादन में इसके
अपना चित्त रमा दो।
भिन्न नहीं जगदीश्वर
कोई इस जगती से
इस जग के अर्चन की
अपनी वृत्ति बना लो।
नहीं बहो प्रतिकूल
जगत की इस गंगा के
इस गंगोदक से ही
अपनी प्यास बुझा लो।
“ईशावास्यं इदं सर्वं,”
वेद वाक्य यह
इस कथनी को तुम अब
अपना चरित बना लो।
 

– लक्ष्मीनारायण गुप्त

कब उर से कविता उठती है

उर में स्पन्दन होता है
रस मन में व्यापक होता है
कलियां तब कुसुमित होती हैं
प्रेम तभी जाग्रत होता है
तब उर से कविता उठती है
प्रियतम का आना होता है
स्नेहातुर तब मन होता है
प्यारे से मिलना होता है
तब उर से कविता उठती है
प्यारे से बिछुड़न होता है
मधुर मधुर पीड़ा होती है
कसकों से जो भर जाता है
उस उर से कविता उठती है
बहुत प्रतीक्षा जब होती है
घोर निराशा जब छाती है
उर में अति पीड़ा होती है
सीने से आहें उठती हैं
तब उर से कविता उठती है
 

– लक्ष्मीनारायण गुप्त

 

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