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Where is That Fragrance

The ocean measures depth
The ocean measures distance too

O my country 
having left you 
the farthest that I have traveled 
the nearest I have come to you.

The same faces, the same people
Same sorrows , the same afflictions.
Measuring the roads in a quick succession
are the same shinning , glittering cars
wrapping pretty forms, the same way
are beautiful Sarees.

Just take a look through the open window
like a blushing bride 
the moon of Delhi
is peeping through the Trinidad sky.

Trinidad or Indianad
Same sameness 
yes the same sameness 
everywhere.

O dear little bird Kisskadee
having shattered the barriers of language
what is the song you sing
the strings of my heart say
this , yes this is the very song I heard
just before I got here.

When you took the music from the breath of the wind
O trees, and made it part of yourself.
Nothing at all did change in you.

Truly nothing has changed
the same trees, the same tiny bird
the same people , the same cars
the very same moon, the same sky.
Really nothing at all has changed.

But , O my beloved country
where is that fragrance
which comes from your soul.
I search everywhere
O mother, 
but can not find your comfortable lap.

Original in Hindi by Dr. Prem Janmejai
Translation by Sumita Chakraborty Brooms
 

Sumita Chakraborty Brooms is a Trinidadian poetess and radio personality.

स्वलेखन – स्ववाचन
वो गंध कहां है
समुंदर गहराई नापता है
समुंदर दूरियां भी नापता है
ओ मेरे देश
तुझे छोड़ जितना
दूर आ गया हूं मै
उतना ही पास आ गया हूं मैं
वही सूरतें‚ वही लोग
वही शोक‚ वही रोग
सड़कों को धड़ाधड़ नापती
वैसी ही चमचमाती गाड़ियां
वैसी ही‚ सौंदर्य को लपेटे
खूबसूरत साड़ियां
देखो तो ज़रा खुली हुई खिड़की से
शरमाती दुल्हन–सा
दिल्ली का चॉद
झांक रहा है त्रिनिदाद के आकाश में
अरी ओ नन्हीं चिड़िया
भाषा की दीवारों को तोड़
तूने यह क्या गाया
दिल के तारों ने आवाज़ दी
यही‚ हां यही गीत तो सुनकर
मैं अभी–अभी हूं आया
हवा की सांसों के संगीत को
अपन हिस्सा बनाते ओ पेड़ों
कुछ भी तो नहीं बदला है तुम्हारा
सच कुछ भी नहीं बदला है
वही पेड़‚ वही चिड़िया
वही लोग‚ वही गाड़ियां
वही चांद‚ वही आकाश
सच कुछ भी नहीं बदला है
मेरे देश
पर वो गंध कहां है
वो जो तेरी मिट्टी से आती है
बहुत ढूंढता हूं
मां
तेरी गोद नहीं मिल पाती है

– डॉ प्रेम जनमेजय

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