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विप्रलब्धा

बुझी हुई राख‚ टूटे हुए गीत‚ डूबे हुए चाँद
रीते हुए पात्र‚ बीते हुए क्षण सा–
मेरा यह जिस्म
कल तक जो जादू था‚ सूरज था‚ वेग था
तुम्हारे आश्लेष में
आज वह जूड़े से गिरे हुए बेले–सा
टूटा है म्लान है
दुगना सुनसान है
बीते हुए उत्सव सा‚ उठे हुए मेले सा–
छूटा हुआ एक साबित मणिजटित दर्पण सा–
आधी रात दंश–भरा बाहुहीन
प्यासा सर्पीला कसाव एक
जिसे जकड़ लेता है
अपने गुंजलक में
अब सिर्फ मैं हूँ‚ यह तन है‚ और याद है
खाली दर्पण में धुंधलाता–सा एक प्रतिबिम्ब
मुड़–मुड़ लहराता हुआ
निज को दोहराता हुआ!

कौन था वह
जिसने तुम्हारी बाँहों के आवर्त में
गरिमा से तन कर समय को ललकारा था!
कौन था वह जिसकी अलकों में
जगत की समस्त गति
बँध कर पराजित थी!
कौन था वह
जिसके चरम साक्षात्कार का एक गहरा क्षण
सारे इतिहास से बड़ा था, सशक्त था!
कौन था कनु वह‚
तुम्हारी बाँहों में
जो सूरज था‚ जादू था‚ दिव्य था‚ मन्त्र था
अब सिर्फ मैं हूँ‚ यह तन है‚ और याद है

मन्त्र पढ़े बाण से छूट गए तुम तो कनु‚
शेष रही केवल मैं
काँपती प्रत्यंचा सी
अब भी‚ जो बीत गया‚ उसी में बसी हुई
अब भी उन बाँहों के छलावे में कसी हुई

जिन रूखी अलकों में मैंने समय की गति बांधी थी–
हाय! उन्हीं काले नागपाशों से
दिन–प्रतिदिन‚ क्षण–प्रतिक्षण बार–बार डँसी हुई

अब सिर्फ मैं हूँ‚ यह तन र्है
– और संशय है
बुझी हुई राख में छिपी चिन्गारी–सा
रीते हुए पात्र की आखिरी बूंद–सा
पाकर खो देने की व्यथा भरी गूंज–सा…

– धरमवीर भारती
यह कविता "कनुप्रिया" से

 

लड़कियों की ज़िन्दगी

धूल के सिंगार ने वक्त की बहार के
फूल चार चुन लिये
और फिर संभल–संभल‚
पंखुड़ी समेट कर
गीत चार गुन लिये

गीत स्वर को साथ ले‚
साज़ का भी हाथ ले
जहान में बिखर गए
और फिर ठहर्रठहर‚
कर चुके पहर–पहर
स्वप्न हो बिखर गए

तीर एक चल गया‚
सब निखार ढल गया
सारी धुंध हट गई
लड़कियों की ज़िन्दगी
आज भी जहान में
चीथड़ों सी बंट गई

ठीक है कि चांद पर‚
शेर की भी मांद पर
अब तुम्हारा ज़ोर है
ठीक है ज़मीन पर‚
और बजती बीन पर
किया खूब गौर है

गौर पर ना कर सके‚
अपने घर के राग पर
दर्द के चिराग पर
ना कभी नज़र गई‚
चांदनी के संग–संग
बहती हुई आग पर

रात भी अजीब है‚
जुल्म की पनाह से
बेखबर ही कट गई
लड़कियों की ज़िन्दगी
आज भी जहान में
चीथड़ों सी बंट गई
– अभिनव शुक्ला

स्त्री विशेषांक


   

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