मुखपृष्ठ  |  कहानी कविता | कार्टून कार्यशाला कैशोर्य चित्र-लेख |  दृष्टिकोण नृत्य निबन्ध देस-परदेस परिवार | फीचर | बच्चों की दुनिया भक्ति-काल धर्म रसोई लेखक व्यक्तित्व व्यंग्य विविधा |  संस्मरण | सृजन स्वास्थ्य | साहित्य कोष |

 

 Home |  Boloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | FeedbackContact | Share this Page!

 Click & Connect : Prepaid International Calling Cards 

You can search the entire site of HindiNest.com and also pages from the Web

Google
 
चैनल्स  

मुख पृष्ठ
कहानी
कविता
कार्यशाला
कैशोर्य
चित्र-लेख
दृष्टिकोण
नृत्य
निबन्ध
देस-परदेस
परिवार
फीचर
बच्चों की दुनिया
भक्ति-काल धर्म
रसोई
लेखक
व्यक्तित्व
व्यंग्य
विविध
संस्मरण
सृजन
स्वास्
थ्य
साहित्य कोष
 

   

 

चितेरा
कागज बौना हो जाता है और
मेरे रंग कम पड़ जाते हैं
जब मैं आंकना चाहता हूँ इस
रेगिस्तान का चित्र ।
मेरी समझ छोटी पड़ जाती है
और नज़र धुँधली
जब मैं आकाश को देखता हूँ
पढ़ना चाहता हूँ दूर
नीले पट पर लिखे संवाद।
कई बार कोशिश की है मैंने
एैसा ही एक चित्र बनाने की
वैसी ही एक कविता घड़ने की
लेकिन
हर बार मेरी कल्पना
छोटी रह जाती है।
उस चितेरे
उस कवि के सम
मैं नत हूँ।

– निशांत कुमार झा

 

प्रकृति की विशालता और उसका खुलापन जो मैंने यहॉं देखा है उस में अथाह भयावहता और नैसर्गिक सादगी का नया मिश्रण पाया है। यही अनुभव इस कविता की प्रेरणा है ।

 

मुखपृष्ठ  |  कहानी कविता | कार्टून कार्यशाला कैशोर्य चित्र-लेख |  दृष्टिकोण नृत्य निबन्ध देस-परदेस परिवार | बच्चों की दुनिया भक्ति-काल धर्म रसोई लेखक व्यक्तित्व व्यंग्य विविधा |  संस्मरण | सृजन साहित्य कोष |
प्रतिक्रिया पढ़ें! |                         प्रतिक्रिया लिखें!

HomeBoloji | Kabir | Writers | Contribute | Search | Fonts | FeedbackContact

(c) HindiNest.com 1999-2015 All Rights Reserved. A Boloji.com Website
Privacy Policy | Disclaimer
Contact : manishakuls@gmail.com