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एक नज़्म

सोचता हूँ जो सोच मुझ पे तारी है.
वही ख़याल मेरे एहबाब को भी आता होगा

जो हादसा गुज़रा है इन्सानियत के साथ,
उनके ज़हन मे भी आधियां उठाता होगा

जाने किसका हाथ किसका साथ छूट गया,
जाने किसकी नींद किसका चैन लूट गया

जाने किसने खरीदा किसका कफन,
जाने किस किसका नसीबा डूब गया


कोई हाथ में सिदूंर लिये बैठा था,
कांपते लब कोई सुरूर लिये बैठा था,
किसीने नसीब आज़माने आना था,
कोई ख्वाब लिये हरएक ज़रूर बैठा था
 

किसे ख़बर थी . चन्द सरफिरों के हाथों की,
वाहियात साज़िश ये रंग लाएगी,
वो जो अपना शरीके हयात चुनने आती थी,
मौत की ग़र्त में अकेली ही समा जाएगी
 
 

– राजेश वालटर प्रीतम

विरह

आजकल शाम
फसल की कटाई
के बाद की
ठूंठ की तरह
चुभती है
पैरों में ।
आग में तपी
लाल
लोहे की
गोली की तरह
घुसती जाती है
मााथे में ।
आजकल शाम
नुकीले चाकू से
मुझे
चीरने की
कोशिश करती है
आजकल शाम
काटे नहीं कटती ।
तुम कैसे काटती हो
आजकल
अपनी शाम ।

– राजेश वालटर प्रीतम

एक शाम
इक शाम ए अलम बीती भी नहीं ।
इक दौर जो था क्या दौर था वो
एहबाब ए वतन ज़िन्दादिल थे
इक हाथ मिला इक हाथ बढ़ा
हर गाम सहारा देते थे।
एक शहर था वो क्या शहर था वो
दरवाजे. सदायें देते थे
कभी बादे सबा कभी शेर औ सुखन
कभी चांद निहारा करते थे

एक कमरा वो था जो छोटा था
पर दोनो तरफ से खुलता था
पूरब की हवा,
पच्छम की महक
कभी सर्द हवाएं सहते थे
एक शहर तो ये भी है लेकिन
वो शहर नहीं वो दौर नहीं
कहीं चांद उतर भी आता था
यहां चांद कभी उगता ही नहीं

– राजेश वालटर प्रीतम

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