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क्या खोया
क्या पाया
क्या खोया. क्या पाया
खोने को था क्या.
कुछ भी तो नहीं
पाने को
था सारा संसार
फिर भी
खोया है कुछ
उधार लेकर
दिल का चैन
मन की शांति
ढूंढता
फिर रहा हूं गली गली
चुकाना जो है
उधार
सूद समेत
प्रश्न,
क्या देखा है
कभी
झांक कर भीतर
अन्तर्मन के।
डरता हूँ
भटक न जाऊं
कहीं
भूलभुलैया में
मन की
यह खोज है
अनन्त
क्योंकि खोया है
उसे मैने
अपने भीतर कहीं
ढूंढता हूं
बाहर यहां वहां
शायद
मैने पाया है यही
आनंद
ढूंढते रहने का
उसे
जो कभी खोया ही नहीं
 

– रतिकान्त झा

इंतजार …

शब्द
घुट कर रह जाते हैं
आने से पहले
जुबां पर
कहीं भीतर
भावनाएं
उछाह भरती हैं
उभर आने को बाहर
दम तोड़ती
आरजूएं
सिसकती आतुर
फूट कर रो पड़ने को
आंसू
जो बन चुके हैं पत्थर
चुभन
महसूस होती है
आत्मा तक
बीत चुका है बसंत
जो शायद आया ही नहीं
इस ओर
आया तो बस पतझड़
शाखाएं सभी
पात विहीन
प्रतीक्षालीन
बसंती बयार
कभी तो बहेगी
पा कर स्पर्श
हरित हो उठेगा
तन मन
इंतजार
बस इंतजार …
दूर तक
छायी हुई वीरानगी
मरूस्थल
थार का
समा चुका है ऑंखों में
सीने में
दफ़न हो चुकी
पौराणिक नदी
हाँ
पौराणिक ही तो
नहीं जिसका नामोनिशां
दूर दूर
पर
हृदय में
कहीं गहरे
गीलापन है मौजूद
आज भी
तरंगित हो उठता
जल
सतही हलचल से
पुनः शांत
नीरव निस्तब्ध
प्रतीक्षारत
कोई तो करेगा
प्रयत्न
गहराई में उतरने का
हृदय में
गहरे पैठ कर झांक पाने का
तब
गाथाएं न रहेंगी
गाथाएं
कहानियां न रहेंगी
सिर्फ कपोल कल्पनाएं
सच जो सिर्फ सच है
है तो बस इंतजार
उस
अंतःकरण के राही का
बदल जाएगी
यह खामोशी
कलकल ध्वनि में
जिसकी पदचापों से
उस पथिक का
है इंतजार…

– रतिकान्त झा

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