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प्रथम पुरस्कार  

ओस की नन्हीं बूंद
सुन्दर शान्त काली आंखें, सांवला - दमकता हुआ रंग, गैरपारम्परिक अनगढ़ नैन - नक्श और निश्छल हंसी। वह एक आकर्षक बच्ची थी। बातें इतनी मीठी करती थी कि किसी को भी मोह ले। उसके हर काम में एक सुघड़ता झलकती, जन्मजात आभिजात्य उसकी हर अदा में दिखाई देता। सब कहते एक बुद्विमान पिता और अभिजात वर्ग में जन्मी संस्कारी मां की बेटी ऐसी न होती तो कैसी होती? कैरेलाईन और डेविड गर्व से मुस्कुरा देते, जब हर पार्टी में उन्हें अपनी नन्ही सारा की झोली भर तारीफें सुनने को मिलतीं।
कैरेलाईन उसे हमेशा सुन्दर रंगों के लैस वाले फ्रॉक्स और स्कर्ट्स पहनाती, घने काले घुंघराले बालों में साटिन रिबन्स।
दस साल की सारा दिन भर व्यस्त दिखाई देती। कभी पियानो और कभी बैले की कक्षाएं, कभी कंप्यूटर पर व्यस्त तो कभी अपनी दादी से क्रोशिया सीखती। मैं दो बेटे की मां, सारा जैसी बेटी पाने को ललक जाती। मैं कैरेलाईन से कहती -`` कैरल भगवान बेटी दे तो सारा जैसी। मेरा घर तो भूतों का डेरा है। दोनों बेटे स्कूल से आकर, खाना खाकर सीधे कंप्यूटर पर व्यस्त होते हैं, फिर क्रिकेट खेलने जो निकलते हैं, सात बजे घर में घुसते हैं... मां बस भूख लगने पर याद आती है। कोई त्यौहार - त्यौहार नहीं लगता।''
`` तो क्या...अब भी वक्त है... कर ले एक बेटी।'' वह छेड़ती।

कैरेलाईन और मैं एक ही स्कूल में काम करते थे... डेविड और अतुल अच्छे मित्र थे, हम पड़ोसी भी तो थे। पिछले ही साल कैरेलाईन - डेविड हमारे पड़ौस में शिफ्ट हुए थे। मुम्बई आने से पहले वे लोग दिल्ली में थे। डेविड कैनरा बैंक में वरिष्ठ अधिकारी था। कैरल दिल्ली में एक प्रतिष्ठित एन जी ओ में काम किया करती थी। यहां आकर उसने मेरे स्कूल में काऊन्सलर का पद संभाल लिया... वह एक अच्छी प्रोफेशनल थी। आते ही उसके काम को बहत सराहना मिली। एक ही स्कूल, पड़ोस का मामला, पतियों की मित्रता के कारण हम दोनों बहत अच्छी मित्र बन गइं। हमउम्र होने के बावज़ूद जहां कैरेलाईन की सारा महज दस साल की थी वहीं मेरे अभि - अनु क्रमश: १६ और १२ के थे।

डेविड और कैरल की ज़िन्दगी को मैं ने सारा के ईद गिर्द ही झूमते देखा। उनका घर एक स्वर्ग लगता। शाम को पियानो बजाती कैरल, गीत गाती हुई सारा। दादी के साथ केक बेक करती सारा... सनडे को लंच बनाता डेविड, और पापा की हैल्प कराती सारा... दादी और कैरल चर्च में होते उस वक्त।
कैरल अकसर कहा करती - `` मृदुल सारा हमारे जीवन में नहीं आई होती तो मैं और डेविड दो दूरस्थ द्वीप होते। सारा हमारे बीच सोने का बना पुल है। बेटियां सच में मां के दिल के एक कतरे से पैदा होती हैं, मां के दर्द को पल भर में बूझ लेती हैं।''
`` हां कैरल, मैं उतनी भाग्यशाली कहाँ।''
`` नहीं मृदुल, कोख से संतान को जन्म देना औरत का सबसे बड़ा सौभाग्य है बेटा हो कि बेटी। तेरा अनुराग तेरी बेटी से ज़्यादा परवाह करता है... जब घर आएगा, कहेगा... आंटी मम्मी अकेली हैं, उदास हैं...पापा फ्लाइट पर गये हैं... उन्हें हंसा कर आता हूँ। वो बिलकुल तुझ पर गया है...हंसमुख ज़िन्दा दिल।''
`` तेरी सारा ने भी तो डेविड की आंखें और रंग पाया है और तेरी मुस्कान और और बाल।''
`` हां....।'' कह कर न जाने क्यों कैरल विषय बदल देती।

हमारे ये घर समुद्र तट से ज़रा दूरी पर ही थे। कई बार हम वहां पर पारिवारिक पिकनिक का आयोजन किया करते।
एक लम्बा सप्ताहान्त हम लोगों को मिला था। सौभाग्य से मेरे पायलट पति अतुल भी घर पर थे, डेविड भी... तीनों बच्चे आउटिंग के मूड में थे। डेविड की मां उन दिनों अपनी बेटी के घर गोआ गई हुई थीं।

मैं ने और कैरल ने खाना पैक किया और हम सातों डेविड की `स्कॉरपियो' में भर कर मुम्बई के करीब एक सुन्दर टापू पर पिकनिक मनाने चले गये, जहां डेविड के बैंक का गेस्ट हाऊस भी बना था।

पूरा दिन समुद्रतट पर बच्चों ने खूब मज़ा किया... हम लोगों को भी खींच खींच कर भिगोया। दोपहर में लंच के बाद थोडा आराम किया गया। शाम होते ही फिर समुद्र तट...बारबेक्यू... संगीत और डांस... सारा का उल्लास देखते बनता था। अभि - अनु उसे छेड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे...।
सुख का सूरज दमक रहा था ज़मीन पर... कि अचानक आकाश दुख के एक काले बादल से धरती को भी स्याह कर गया। सारा नाचते नाचते गिर पड़ी... चीख कर उठ न पाने की शिकायत करती रही। कैरल का चेहरा उतर गया था... वह उठी पर डेविड ने कहा...
`` डोन्ट पैम्पर हर... शी इज़ ब्रेव अभी उठ जाएगी।''
उधर अनु उसे छेड़ रहा था... `` ऐ सारा की बच्ची...अभी क्या कह रही थी? मैं कोई लड़कों से कम हूँ... ज़रा से में हवा निकल गई। उठ चल...''
सारा उठी मगर उठते ही लडखड़ा कर गिर पड़ी। फिर उठी फिर गिर पड़ी। अब अनुराग का चेहरा उतर गया वह चीखा - ``अभि भैया...''
अभि ने दौड़ कर सारा को उठाया और हमारे पास ले आया। कैरलाईन विव्हल हो उठी थी।
`` चलो डेविड डॉक्टर के पास।''
`` कुछ नहीं हनी, पैर में मोच होगी... मसाज से ठीक हो जायेगी।''
मगर सारा उस शाम दोनों पैरों में दर्द और झनझनाहट की शिकायत करती रही... खड़ा होना तो दूर वह बैठ भी नहीं पा रही थी। हम तुरन्त लौट पड़े। हमने अस्पताल स्र्क कर बच्चों को अतुल के साथ घर भेज दिया।

कई तरह के टेस्ट और स्केन्स के बाद डॉक्टर ने बताया, `` सारा की पैरों की मसल्स पर वायरल अटैक हुआ है।'' सारा को एक दिन अण्डर ऑब्ज़र्वेशन में रख कर ढेर सारी दवाआें के साथ घर बेज दिया गया।

सारा के घर लौटने पर मैं कैरल से मिलने और सारा को देखने गई। कैरल बहत व्यथित थी, एक दम बिखरी हुई। डेविड ऑफिस गया था। सारा की स्थिति के बारे में जान डेविड की मां लौट आइंर् थीं और सारा की बगल से उठती ही न थीं... बस उसके करीब बैठ बाइबिल पढ़ा करतीं। सारा उस वक्त दवाआें के असर से सो रही थी। कैरल निढाल सारा के निकट बैठी थी... चेहरा आंसुआें से गीला था। सारा की नींद का ख्याल कर ... मैं कैरल को बाहर सिटिंगरूम में ले आई।
`` ठीक तो हो जायेगी न मेरी सारा...?''
`` हां...कैरल...ज़रा सा वायरल इन्फैक्शन ही तो है।''
`` नहीं मृदुल ये ज़रा ........ सा ` वायरल' नहीं हुआ तो! तो मैं क्या करूंगी बोलो?''
`` श्शश...धीरे बोलो। बच्ची जाग जायेगी। ये तुम कैसी बातें करती हो?''
मैं हैरान थी... सभ्रान्त, संयत, नपा तुला और लगभग फुसफुसाने से ज़रा ही ऊंचा बोलने वाली कैरल आज चीख क्यों रही है!

मैं ने उसे सोफे पर कुशन के सहारे टिक जाने को कहा। मैं उसके बाल सहलाने लगी। कोई सोया दर्द जागा था... अतीत का कोई फोड़ा फूट गया था... उसके हाथ भय से ठण्डे थे। आंखें पीली और निस्तेज। छोहरे पर पीड़ा पुती हुई।
`` सारा, मेरे जीवन का केन्द्र है।''
`` जानती हूँ। बच्चे मेरे भी हैं। तुझे याद होगा...अभिमन्यु को कन्धों का फ्रेक्चर हुआ था। तब तूने कितना सहारा दिया था... बुरा वक्त भी बीतता है... हमारा भ्रम होता है कि धीरे बीत रहा है पर उसी रफ्तार से वह बीत रहा होता है।''
`` मैं ने उसे यहां तक लाने के लिये...लम्बा संर्घष किया है। दर्द सहा है।''
अब मैं खीज रही थी। हरेक मां बच्चे को बड़ा करने में संर्घष करती है। मन किया कि कहूं तुमने क्या अनोखा कर दिया?
`` हां भई नौ महीने की पीड़ा सही है तुमने... हमने १८ महीने की।'' हंसकर मैं ने माहौल हल्का करना चाहा।''
`` मैं ने वह पीड़ा तो नहीं सही मृदुल...डेढ़ साल की थी सारा...जब मुझे मिली...।''
`` मतलब?''
`` सारा मेरी अपनी बेटी नहीं है। मतलब मेरी है पर बायलॉजिकली नहीं।'' मेरे कैरल के बालों में चलते हाथ स्र्क गये। कैरल उठ बैठी... अपने कांपते दुर्बल हाथों से मेरे हाथ पकड़ कर बोली `` किसी से कहना नहीं, यह बात मैं, डेविड और डेविड की मम्मी जानते हैं। मेरे पेरेन्ट्स, डेविड की सिस्टर्स और रिश्तेदार कोई नहीं जानता। तुम भी अतुल से भी मत कहना। डेविड केा या मम्मी को मत जताना कि तुम जानती हो। सारा...को...।''
`` कैरल... भरोसा रखो, मेरे होंठ इस विषय पर सिले रहेंगे। अतुल को भी नहीं बताऊंगी।मेरे दोनों बच्चों की शपथ।''
`` नहीं इतनी बड़ी कसम की ज़रूरत नहीं है।'' वह फिर कुशन पर लेट गयी और आंखें मूंद लीं।
एक खामोशी कोहरे की तरह कमरे को ढक चुकी थी। मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या कहूं अब?
मेरे हाथ फिर उसके बालो में चलने लगीं। मुझे लगा वह सो गई है... मैं उठना चाह रही थी कि अस्फुट स्वर उस खामोशी के कोहरे में तैरे।

`` एक साल की भी नहीं थी...जब मैं ने इसे देखा था। एक मिशनरी अस्पताल के सबसे उपेक्षित वार्ड में अपनी एच आई वी संक्रमित मां के साथ चिपकी रहा करती थी। तब मैं एड्स के लिये काम करने वाले एक एन जी ओ के लिये काम किया करती थी। मां अपना चेहरा ढके पड़ी रहती... यह घुटनों के बल चल कर बाहर आ जाती। कॉरीडोर में आकर बच्चों की अर्थहीन भाषा में म्म्मा पपपा गु गा गा... करती।'' कुछ देर चुप रह कर कैरल अपनी सहज आवाज़ में पूरा किस्सा बताने लगी।

`` यह कभी किसी नर्स के पैरों में आ जाती तो वह चीख पड़ती। `` इसे संभालो।'' इसकी मां हरदम खामोश रहा करती, न हंसती न बोलती। बहत कम खाना खाती। बस वार्ड बॉय से कहा करती, `` मुझे कुछ नहीं चाहिये, इसके लिये दूध की बोतल भर दिया करो।''

``एच आई वी संक्रमितों के उस वार्ड में कुल चार मरीज़ थे। दो अधेड़ पुस्र्ष, एक यह और एक और औरत। तब तक एड्स के प्रति इतनी जागस्र्कता जगाने के बाद भी लोगों के मन से यह भय नहीं गया था कि एच आई वी छूने या आस पास रहने से नहीं फैलता। आज भी आम लोगों का भय, भ्रम, शंकाएं इतने प्रचार के बावज़ूद कम नहीं हुए कि शबाना आज़मी कह कह कर थक गई - `` यह छूने से नहीं फैलता, छूने से प्यार फैलता है।'' मेरे खयाल में यह डर तो आज भी लोग मन में पालते हैं।''

``कितनी बार उस बच्ची यानि इस सारा को मैं ने... गोद में उठा कर चूम लिया। नर्सें सिहर जाती थीं... डॉक्टर तक चेहरा घुमा लेते। बीमार मां अपनी इस गोल मटोल बच्ची को साफ - सुथरा रखने में कोई कसर नहीं छोड़ती थी। लेकिन इसके पहले जन्मदिन से पहले ही वह गुज़र गई। इसके पहले जन्म दिन पर मैं इसके लिये चॉकलेट का डब्बा, नई फ्रॉक और उसे गोद लिये जाने की एप्लीकेशन लेकर गयी थी। ...हमारे बच्चे नहीं थे...न हो सकते थे...मेरी फैलोपियन ट्यूब्स बन्द थीं। डेविड पहले हिचके, मम्मी ने मेरा साथ दिया...वे सही मायनों में यीशू की भक्त हैं। मानवधर्म से ऊपर उनके लिये कुछ नहीं। मृदुल मेरी सास दुनिया की सबसे प्यारी औरत है।''
`` फिर...।'' मुझे अपनी ही उत्सुक आवाज़ बेगानी लगी। आशंकाएंं मेरे मन में फन उठा रही थीं।
`` हां ... मृदुल... तुम्हारी तरह ही सोच कर गोद देने से पहले मिशन अस्पताल की इंर्चार्ज ने कहा... `` बच्ची का एलिज़ा टेस्ट करवा लो।'' डेविड की भी यही राय थी। लेकिन......।'' कैरल चुप हो गयी।
`` मैं ने मना कर दिया... मैं नहीं चाहती कि टैस्ट करवा के बच्ची के एच आई वी पॉज़िटिव निकलने पर मैं इसे इस वार्ड में अकेले मरने के लिये छोड़ दूँ। अब यह संक्रमित है तो भी मेरी है... नहीं है तब भी। यीशू ने जितना भी जीवन इसे दिया है उसे यह मेरे साथ बिताएगी... यहां नहीं। मैं इसे वो सारी खुशियां दूंगी जो इसे ईश्वर ने बख्शीं थी और संसार ने छीन लीं।''
`` फिर...?''
`` फिर क्या मृदुल... आज मैं वही मजबूत औरत...भीतर से डर गई हूँ... कहीं सारा......।''
`` कुछ नहीं होगा सारा को...।'' डेविड लौट आये थे। कैरल उठ खड़ी हुई।
`` क्या कहा डॉक्टर ने?।''
`` मैं डॉक्टर से बात करके आया हूँ... मैं ने तुम दोनों की बात भी सुनी... लेकिन यह बात मिशन अस्पताल की सीनियर डॉक्टर ने मुझे तभी बता दी थी, बच्ची एडॉप्ट करते वक्त कि गर्भ से एच आई वी संक्रमण लेकर जन्मे बच्चे पांच या छ: साल से ज़्यादा नहीं जीते। और हमारी सारा तो इसी महीने ११ की हो जायेगी। इसके सारे टेस्ट हो चुके हैं। ब्लड टेस्ट भी वह एकदम स्वस्थ बच्ची है। यह वायरल इन्फैक्शन जल्द ही ठीक हो जायेगा।''
कह कर डेविड ने कैरल को थाम लिया। तभी सारा जाग गई थी और अपनी मां को पुकार रही थी। सारा ने बांहें फैला कर बेडरूम की तरफ बढ़ते हुए कहा - `` आई मेरी नन्हीं एंजेल।''
मैं बाहर निकल आई टेरेस पर उगे गुलाबों पर नन्हीं ओस की बूंदें झिलमिला रही थीं।

कविताएं
वश में है   - रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
तुम बोना कांटे
  - रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
माँ की ममता - राजेसिंह उपनाम पी.डी.राजन   तृतीय पुरस्कार
तुम्हारी ममता - श्रीमती स्मिता दारशेतकर
माँ होने का अहसास -  कायनात काजी
हम और बच्चे -  विकेश निझावन
बचायें बचपन
  - रोहिनी कुमार भादानी
ममता का समंदर  - रेणु आहूजा।
ममता
- अम्लान मिश्र
लहरों में  -गरिमा गुप्ता
यादें - समीर लाल

कहानियां
उसके हिस्से का सुख - विकेश निझावन
तरंगों की तल्खियां - धनपत राय झा
ओस की नन्हीं बूंद प्रथम पुरस्कार
लेख
बचपन
: सिखाएं अपने बच्चों को दोस्त बनाने की कला- के. सुधा
आप और आपके किशोर होते बच्चे : आज आपने अपने बच्चे को गले लगाया
? - के. सुधा द्वितीय पुरस्कार
 

कार्यशाला  16 | 15 |14 | 13 | 12 | 11 | 10 | 9 | 8 | 7 | 6 | 5 | 4 | 3 | 2 | 1

 

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