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रोमा जिप्सीज़

बहादुर सिंह राठौड़

 

रोमाज़, जिनको आमतौर पर जिप्सीज़ की तरह जाना जाता है, सदियों से यूरोपियन समाज का महत्वपूर्ण अंग रहे हैं। कोसोवो में इनकी जनसंख्या दो प्रतिशत से भी कम है लेकिन ये इस क्षेत्र के हर हिस्से दिख जाएंगे। ऐसा हिस्सा जो स्वयं इनके द्वारा औरों के लिए प्रतिबंधित होता है वह ज़िप्सी कैंप कहलाता है और अकसर शहरी इलाकों से बाहर ही होता है, जैसे कि कच्ची बस्तियाँ। अल्बेनियन इलाकों में इन्हें ‘ रोमा मोहल्ला’ ही कहा जाता है। ये रोमा अपनी रंगत और नाक-नक़्श से भारतीय ही लगते हैं। ये सारे श्रम-साध्य काम करते हैं और इनकी स्थिति लगभग वही रहती है जो हमारे देश में दलितों की है। इनमें से कुछ शिक्षित भी होते हैं और अपने आपको आधुनिक यूरोपियन समाज में प्रतिष्ठित करने में भी कामयाब हो जाते हैं। लेकिन इनमें से अधिकतर निचले स्तर का ही जीवन जी रहे हैं।

संयोग से, न्यू मिट्रोविका के एक जिप्सी कैम्प में जाने का अवसर मुझे मिला। वहाँ अधिकतर घर अस्थाई से बने हुए थे, कच्चे-पक्के ढाँचे पर टिन, एस्बस्टॉस, ट्रेम्पोलिन की शीट के छतें बनी हुई थीं। वहां जाकर पता चला कि उनके छोटे बच्चों को स्कूल तक मयस्सर नहीं था। कुछ युवक छोटे-मोटे अपराधों में भी लिप्त बताये गये।

कितनी सारी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएँ कोसोवो में ‘पीड़ित मानवता’ की सहायतार्थ काम कर रही हैं लेकिन ऐसा कहीं से नहीं लगा कि वे इन ख़ानाबदोशों को सर्वहाराओं की श्रेणी में रखते होंगे या इन्हें अपनी जनगणना तक में शामिल करके होंगे। रोमाज़ को आमतौर पर बेवजह ही जिप्सीज़ कहा जाता है जबकि ये तो यूरोप में भटक कर पहुंच गये हमारे ही बंधु-बांधव हैं। जैसा कि इतिहास कहता है, शोध कहते हैं कि पंजाब के इलाके से 1000 ईस्वी के आस-पास ये लोग यूरोप की तरफ़ आए थे। गहराई में जाएं तो एक अवधारणा यह है कि ये किसी राजा द्वारा पर्शिया ( अब ईरान) से यहां लाए गये थे क्योंकि ये अच्छे संगीतकार, गायक, नर्तक और घोड़ों को ट्रेनिंग देने वाले होते थे। इनके समूह में लुहार, डोम, करतबबाज़ और तरह – तरह के तमाशेबाज़ भी शामिल थे। ये पर्शिया से  निकल कर वाया तुर्की यूरोप के पश्चिमी हिस्से में आए और अब ये अमेरिका और कनाडा में भी बिखर चुके हैं। तक़रीबन 12 मिलियन रोमाज़ यूरोप और अमेरिका में रह रहे हैं।  

दूसरी अवधारणा के तहत माना जाता है कि ये यहां भारत के एक सीमांत हिस्से से भाग कर यहां तब पहुंचे होंगे जब अरबी आक्रांताओं ने इन्हें इस्लाम कुबूल करने को विवश किया होगा। इनकी भाषा हमारी भारतीय भाषाओं से मिलती-जुलती सी है। सर्वमत से यह माना जाता है कि इनकी भाषा पंजाबी और संस्कृत से जन्मी है। सबसे पहली गलत धारणा के तहत इनको इजीप्ट से आया हुआ माना जाता है और इसी गलतफहमी के चलते ये आमजन द्वारा जिप्सी कहलाए जाते हैं।

इनके नाक-नक़्श, इनकी धारणाएँ और विश्वास, जीवन-शैली, पारिवारिक परंपराएँ और भाषा पर भारतीय संस्कृति का दूरस्थ प्रभाव दिखाई देता है। इनकी एक भाषा है जिसे डूमरी कहते हैं। उसमें बहुत से शब्द पंजाबी के मिल जाते हैं – मू ( मुंह) , अख (आँख), खेल, लोन ( नमक), बडो ( बड़ा), अमरो (हमारा).

अमेरिकी लेखिका इज़ाबेल फोन्सेका ने रोमाज़ पर एक किताब ‘Burry me standing’ लिखी है। वे इसमें लिखती हैं कि – “रोमाज़ के एक अग्रणी नेता

मैसेडोनिया के सैप जुसुफ़ ने 1971 में, लंदन में पहली ‘वैश्विक रोमानी कांग्रेस’ की मीटिंग आयोजित की थी। इस बड़ी कॉन्फ़्रेंस के आयोजन के लिये भारत सरकार ने भी आर्थिक मदद प्रदान की थी। और इस कॉन्फ्रेंस के प्रस्तावों के बाद युनाइटेड नेशन ने एक भिन्न सांस्कृतिक समूह के तौर पर रोमाज़ के अस्तित्व को वैश्विक स्वीकृति भी प्रदान की। साथ ही कुछ बरस बाद अंतरराष्ट्रीय रोमानी यूनियन को वोट के अधिकार पर भी सहमति मिली।“

वे आगे बताती हैं कि जुसुफ़ ने बाद में इस्लाम त्याग कर अपने पुरखों का  हिंदू धर्म भी अपना लिया था, बड़े उत्साह से उन्होंने अपने संग्रह की मूर्तियों

गणेश, पार्वती और दुर्गा को लेखिका को दिखाया था। रामचे मुस्तफ़ा जो कि एक कवि भी हैं उन्होंने अपना पासपोर्ट उन्हें दिखाया जिसमें ‘सिटीज़नशिप’ तो युगोस्लाव की थी, नेशनलिटी की जगह ‘हिंदू’ लिखा था। ये भारत की खोई हुई संतानें अपने पुरखों की ज़मीन को खोजकर इस प्राचीनतम सभ्यता पर बड़ा गर्व करती हैं --- संसार की सबसे प्राचीन जीवित सभ्यता को वे कहते हैं – “ आमरो बड़ो थान्ह” ( हमारी विशाल भूमि)।

रोमा महिलाओं में बहुत सारी युवतियाँ अपने पारंपरिक भारी-भरकम फूले हुए तुर्की पायजामों, घाघरों से तंग आ चुकी हैं। वे अब साड़ी पहनती हैं। इंटरनेशनल रोमानी ऑर्गेनाइज़ेशन ने अपना एक दुरंगा झंडा बनाया है, जिसके बीचों-बीच एक चक्र है, जैसा कि तिरंगे में होता है।

डॉ. इयान एफ़. हैनकॉक, एक ब्रिटिश रोमानी हैं और टेक्सास, यू. एस. ए. में रोमानी संस्कृति के अध्ययन के प्रोफ़ेसर हैं। उन्होंने रोमाज़ के मूलस्थान के बारे लिखा है – “18 वीं सदी के उत्तरार्ध तक यूरोपियन विद्वानों को यह एहसास ही नहीं था की रोमानी भाषा दरअसल भारत से आई है। मूलभूत शब्द जैसे कि कुछ संख्याएं और नाते-रिश्तों की शब्दावली, शरीर के हिस्सों के नाम, क्रियाएं आदि स्पष्ट रूप से भारतीय प्रतीत होते थे।
इस बात पर उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि अगर किसी भाषा में भारतीय शब्द है और इस भाषा की भारत में जड़ें  हैं तो तो उसके बोलने वाले भी निश्चय ही मूलभूत रूप से भारतीय होंगे। जैसे ही उन्हें यह एहसास हुआ तो आगे नये मूलभूत सवाल उठना जायज़ थे : अगर रोमा भारतीय थे तो इन्होंने भारत कब छोड़ा और क्यों, और क्या उस भारत में अभी भी रोमा रहते हैं? 

11 वीं सदी की एकदम शुरुआत में भारत पर एक मुस्लिम जनरल मोहम्मद गजनी ने आक्रमण किया था जो कि इस्लाम को पूर्व तक भारत में फैलाना चाहता था। जो कि मुख्यतः हिंदू बहुल हिस्सा था। भारतीय शासक पहले भी सदियों से इस तरह के बाहरी मुगल आक्रमणों और प्रयासों से लोहा लेने के लिए अपनी सेनाओं को मजबूत करते आए थे। वही जानबूझकर ऐसे योद्धाओं को इकट्ठा कर रहे थे जो दूसरी समुदायों से थे और आर्य नहीं थे। जैसा कि ज्ञात है कि आर्य बहुत सदियों पहले भारत में जा बसे थे। भारत की मूलनिवासी जातियों को उन्होंने दक्षिण की तरफ धकेल दिया था। या फिर वे मूलनिवासी समाज-व्यवस्था में निचले वर्ग में सम्मिलित हो चुके थे। जिससे लोग बहुत सारे अलग-अलग सामाजिक वर्गों, जातियों में बंट गए। उन्हें ही संस्कृत में वर्ण कहा गया।

आर्य लोगों ने अनार्य लोगों की बनिस्पत आर्यों के जीवन को ही हमेशा महत्वपूर्ण समझा। ऎसे में वे अपने जीवन युद्ध में व्यर्थ करने का खतरा क्यों उठाते? इसलिए मोहम्मद गजनी के खिलाफ जो सैन्य-टुकड़ियां बनाई गयीं, उनमें सैनिक अनार्य जनसंख्या से लिए हुए थे। हांलाकि उन्हें क्षत्रिय तथा लड़ाकू जातियों के माननीय सदस्य होने का सम्मान प्राप्त था। उन्हें योद्धाओं की पोशाक पहनने की और सम्मानजनक युद्ध चिन्ह पहनने की अनुमति थी। इन्हें अलग-अलग जातियों और समूहों से लिया हुआ था जो कि कई अलग भाषाएं और बोलियां बोलते थे। इनमें कुछ हथियार बनाने वाले लोहार थे, कुछ गुज्जर, कुछ तांडा, कुछ राजपूत थे। कुछ वे लोग भी शामिल थे जो सदियों पहले सुदूर बाहरी इलाकों से भारत में रहने आ गए थे और उनके पास लड़ाकू क्षमताएं और सिद्धियां थी।

पूर्वी अफ्रीका की समुद्र तट से अफ्रीकन आए थे जिन्होंने भाड़े के सैनिकों के तौर पर हिंदू और मुस्लिम दोनों तरफ से युद्ध लड़ा था। इस तरह यह बहुमिश्रित सेना मुस्लिम सेनाओं से युद्ध लड़ते हुए भारत से बाहर कूच कर के पहाड़ों और दर्रों से होकर पर्शिया के पश्चिमी हिस्से से होते हुए इस्लाम के फैलाव की पूर्वी सीमाओं तक पहुंच गई।
भाषाई और ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित यह बात एक हद तक विचारयोग्य है, और यह काल को लेकर सबसे अधिक विश्वसनीय दृश्य प्रस्तुत करती है। क्योंकि इस्लाम ना केवल भारत के पूर्व में अपना रास्ता बना रहा था बल्कि यह यूरोप के पश्चिमी हिस्से में भी फैल रहा था। यह युद्ध की अनवरत स्थिति भारत की ओर से लड़ने वाली सैन्य टुकड़ियों को जो 'शुरुआती रोमाज़' थे, उनको उस दिशा में आगे और आगे ले जाती चली गयी, जब तक कि इन्होनें 1300 A.D.  के उस काल में दक्षिण-पूर्वी यूरोप में प्रवेश न कर लिया।

आरंभिक रोमाज़ की इस सामूहिकता के बाद से ही अनेक ऐसे ही समूह अलग-अलग दिशाओं से भटकते हुए आए और आपस में आ जुड़े और इनकी जनसंख्या बढ़ती गई। इस रोमानी समुदाय में जातीय और भाषाई आधार पर जुड़ने वाले ये लोग तरह तरह के पेशे और कामकाज वाले लोग थे जो अपनी सरज़मीं से निकल कर आगे और आगे बढ़ते चले आए ( समय रहा होगा ग्यारहवीं सदी का आरंभ )। 

धीरे-धीरे इस समुदाय ने अपनी पहचान बनाना शुरू कर दिया, इनकी मिली जुली भाषा भी आकार लेने लगी। लेकिन भाषा और विविध समूहों के इस मिश्रित समुदाय में मिश्रण होना यहीं नहीं रुका। क्योंकि इनमें आगे शामिल होने वाले योद्धा उत्तर पश्चिमी रास्तों से पर्शिया होकर इधर की बढ़े थे, इसलिए इन्होंने शब्द और व्याकरण पर्शिया से भी ले लिए, और हां बिलाशक ये नये सदस्य भी उनका हिसा बने। लगभग यही घटित हुआ आर्मेनिया में और बाइज़ेन्टाइन एम्पायर में और यूरोप तक पहुंचते पहुंचते यह मिश्रण होता रहा।
कहीं-कहीं तो कुछ ऐसा भी हुआ कि छोटे-छोटे रोमा समूहों के अन्य लोगों से मिलते चले गये परिणाम स्वरूप उनकी रोमानी पहचान छूटती चली गयी। दूसरी ओर यह हुआ कि बाहरी लोग रोमानी समूहों में शामिल हुए और वे रोमानी बन कर रह गये।
आगे चल कर यूरोप में ये रोमानी या तो बाल्कन प्रदेश में दास-प्रथा के शिकार हुए, आज यही इलाक़ा रोमानिया कहलाता है। या फिर ये आगे बढ़ने में सफल रहे और 1500 AD तक पूरे महाद्वीप में भटकते विचरते रहे, हर पूर्वी और पश्चिमी यूरोपियन देश में फैल गये। एक समय के बाद बहुत से यूरोपियन समुदायों के संपर्क में आते हुए, बड़े और दूर-दराज तक बिखरे हुए समूहों में बंटते हुए ये रोमानी लोग विविध जातीय समूहों के बावजूद एक बहुत बड़े समुदाय की तरह उभरे। "

यूरोप में ये किसी अनाम खुदा या बिना ईश्वर की संतान की तरह हैं। कुछ देश तो इन्हें अपनी जनसंख्या में गिनते ही नहीं है द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजियों ने 1.5 मिलियन जिप्सियों को मार डाला था। न्यूरेमबर्ग ट्रायल में नाजियों के वकील ने दलील दी थी कि जिप्सियों को मारना न्याय संगत था क्योंकि यह अपराधियों की तरह मारे गए थे ना कि किसी प्रजाति की तरह। और इन जिप्सियों के लिए कोई आवाज़ उठाने वाला तक नहीं था और इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल ने इस दलील को स्वीकार कर उन्हें दोषमुक्त भी कर दिया था! आह! मानवीयता।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान  नाजियों के द्वारा हजारों बेकसूर रोमा जेलों में बंद रखे गए,  रोमा लोगों में आज भी एक गीत प्रचलित है, जिसमें एक रोमा युवती की भावनाओं का ज़िक्र है कि उसका पति आश्विट्ज़ जेल में बंद होता है। वह काली चिड़िया से अनुरोध करती हैं कि मेरा पति आश्विट्ज़ में है और वह हमेशा केवल मेरे बारे में सोचता है। उधर पति भी उसी काली चिड़िया पूछता है कि वह उसका संदेश उसकी प्यारी पत्नी तक पहुंचा देगी? जो घर पर है, जो उसके बिना उसके लिए जेल ही है।
यह वैसा ही गीत है जैसे कि राजस्थान में हमारी लोक कथाओं में गाया जाता है। 
'कुरजा ए म्हारो भंवर मिला दिज्यो रे'
ये गाते हैं -- 
ओ तु कालो चिरकलो 
आॉश्विकेट हि खेर बरो 
अदोज बेसल मरो पिरानो
बेसल बेसल गोन्दोलिनेल
ते प्रे मांडे पोबिस्टिरेल 
ओ तु कालो चिरकलो
लिड्ज़ा मांगे म्रो लिलरो

ए काली चिड़िया 
आश्विट्ज़ में एक बड़ा घर है
उधर मेरा प्रियतम कैद है 
वह बैठा बैठा विलाप करता है
मेरे बारे में सोचता है
ओ काली चिडकली मेरा पत्र ले जा

यह समुदाय आज भी यूरोप में सबसे निचले स्तर पर भी जगह नहीं पाता। ये लोग लगातार बार-बार, समय बदलते जाने के साथ भी लोगों की घृणा का शिकार होते आए हैं। यूरोप के तथाकथित सभ्य और सुसंस्कृत समाज आज भी इस गरीब समुदाय के साथ दुर्व्यवहार और नफरत के साथ पेश आता है।
‌कोसोवो में 2 परसेंट से भी कम जनसंख्या है रोमाज़ की, लेकिन इनकी गलती बस यह रही कि अल्बेनियन और सर्बियन युद्ध के दौरान इन्होंने किसी भी तरफ से भागीदारी नहीं की, जबकि दोनों ओर से इन्हें अपने साथ लड़ाई में शामिल करने का दबाव बना था। परिणाम यह निकला कि दोनों समुदायों द्वारा इन पर आक्रमण हुए और ये दुरदुराए गये। हजारों की संख्या में ये पड़ोसी राज्य मेसेडोनिया की तरफ भाग गए या फिर आज भी कैंपों में रहते हैं। कोसोवो में कई इंटरनेशनल एनजीओ हैं जो अल्बेनियन और सर्बेनियन लोगों की सेवार्थ काम करते हैं लेकिन कोई भी इन रोमाज़ के लिए आगे नहीं आता। 
इस समुदाय की एक बात बहुत अच्छी है कि इनकी कम्युनिटी संगीत की बड़ी शौकीन है और इन्होंने यूरोपियन म्यूजिक के विकास में बहुत कुछ दिया है। आश्चर्यजनक रूप से इनकी कुछ धुनें हिंदुस्तानी क्लासिकल राग पर भी आधारित हैं जैसे राग कल्याणी भैरवी और मालकौंस। इनके कई प्रसिद्ध व्यवसायिक म्यूज़िकल बैंड्स हैं जो कई उत्सवों में आमंत्रित किए जाते हैं। इनका संगीत बहुत पॉपुलर होता जा रहा है आजकल। इनका एक ग्रुप ‘जिप्सी किंग’ यूरोप में सबसे अधिक लोकप्रिय माना जाता है। 

इनके कुछ विश्वास और आस्थाएं भी हमसे मिलती जुलती हैं, जो आज भी भारत के ग्रामीण इलाकों में मान्य हैं। रोमाज़ को अपनी दैविक शक्तियों पर भरोसा है, जिनका इस्तेमाल वे किसी बीमारी को ठीक करने या श्राप, बद्दुआ देने के रूप में करते हैं, जिसे ये 'अमरिया' कहते हैं। इनमें से कई भविष्यवक्ता की तरह अपना व्यवसाय करते हैं, लेकिन अपने समुदाय के भीतर ये इसे नहीं आज़माते। विष्यवक्ता हमेशा औरतें होती हैं जो 'ड्राबार्डी' कहलाती हैं। ये अलौकिक 'हीलिंग पावर्स' में भी यकीन रखते हैं। क्योंकि इनके अनुसार बीमारी कोई दैविक प्रकोप होती है जिसे 'प्रिकाज़ा' कहते हैं। इनके समुदाय में बहुत सी ऐसी मान्यताएँ हैं जिनके अनुसार मंत्रों और टोटकों से बीमारी से बचा और बीमारी को ठीक किया जा सकता है। जैसे बुखार कम करने के लिए किसी युवा पेड़ को लगातार झकझोरा जाए। इससे बुखार उस व्यक्ति से निकल कर पेड़ में चला जाएगा। बुखार उतारने के लिए ये कुछ जीव-जंतुओं के कुछ हिस्सों का चूर्ण भी मंत्रों के साथ लेते हैं ।

सौभाग्य लाने वाली घंटियां, घुँघरू और ताबीज़ों वगैरह में भी इनका विश्वास रहता है। ये इनका व्यवसाय भी करते हैं। बाकि दुनिया की तरह ही रोमाज़ में भी घोड़े की नाल को सौभाग्य लाने वाला माना जाता है। इनकी कुछ मान्यताओं में छछूंदर का पंजा साथ रखने से गठिया नहीं होता और हेजहॉग का पंजा साथ रखो तो दांत में दर्द नहीं होता। ये कई तरह की जड़ीबूटियां रखते हैं उनको ये 'ड्राब' कहते हैं। इनमें से कुछ जड़ीबूटियां जिनको ‘सस्तारी मस्कोद्रा’ कहते हैं वे रामबाण दवाओं की तरह कई रोग ठीक करती भी हैं, उनमें अलौकिक क्षमताएँ भी होती हैं। 

वर्जनाएँ 


अधिकतर रोमा समुदाय गंभीरता से 'पवित्र' और 'अपवित्र' के बीच के फर्क को मानते हैं। पवित्र - वूजो, अपवित्र - मारीमे। मारीमे के दो अर्थ होते है इनके लिए। यह अपवित्रता और कलंकित व्यवहार के लिए समानता से इस्तेमाल होता है ।  ऐसे ही जब किसी को पवित्रता के नियमों का उल्लंघन, या रोमा समुदाय के प्रति कोई विध्वंसक और बदनाम करने वाले व्यवहार की सज़ा या जाति-बाहर होने के आदेश को भी मारिमे कहते हैं।
 

अपवित्रता और त्यागना आपस में सम्बंधित शब्द हैं। अपवित्रता को लेकर वर्जनाएँ और उनके नाम हर समूह में भिन्न हो सकते हैं। हालांकि ये रोमाज़ स्वयं को इन पवित्रता के विध्वंसक अनुष्ठानों के चलते वर्गीकृत करते हैं। कि इन में से कौन पवित्रता - अपवित्रता की मान्यताओं का अधिक गंभीरता से पालन करता है। मारिमे शब्द निजी साफ-सफाई को लेकर भी इस्तेमाल होता है। मारिमे शब्द का इस्तेमाल बहुधा स्त्री के शरीर की लिए होता है। जब स्त्री के शरीर को दो भागों में बांट दिया जाता है। कमर से ऊपर का भाग पवित्र और साफ कमर से नीचे अपवित्र होती है। स्त्री के ऊपरी भाग में लज्जा यानि 'लाशाव' निहित नहीं होती, निचला भाग 'बरो लाशाव' यानि लज्जाकारक होता है। क्योंकि यह मासिकस्त्राव से संबंधित हिस्सा है। उनकी मान्यता के अनुसार बिना ज़ख्म के बहा रक्त शरीर की अपवित्रता का सबूत है। मारिमे का स्त्री से निहितार्थ रोमाज़ के अधिकतर समुदायों में प्रचलित है, इस मान्यता के चलते रोमा औरतें लंबे घाघरेनुमा स्कर्ट पहनती हैं। और इनके इन घाघरों का सिरा इनके पति के अलावा किसी अन्य पुरुष से स्पर्श नहीं होना चाहिए। पारंपरिक तौर पर घर में स्त्री को पुरुष के सामने से होकर, या दो पुरुषों के बीच से नहीं गुज़रना चाहिए। उसे दूर से होकर निकलना चाहिए, ताकि पुरुष स्त्री की तथाकथित अपवित्रता से संक्रमित न हो जाए। इसी तरह पुरुष को खाना भी पीछे से परोसा जाना चाहिए। अगर रोमा स्त्री लंबा स्कर्ट न पहने हुए तो उसे अपने पैर कंबल या कोट से ढक लेने चाहिए।  किशोरी कन्याएँ और बूढ़ी औरतों को औरतों के अलग वर्ग में रखा जाता है। क्योंकि वे मासिकस्त्राव से मुक्त हैं। इन्हें सामाजिक तौर पर पुरुषों से बात करने और निकट जाने में अपेक्षाकृत कम बंदिशें होती हैं। 

सफाई के पारंपरिक नियम अकसर पानी के माध्यम से निबाहे जाते हैं। मसलन ये केवल बहते पानी में ही हाथ धोना और नहाना कर सकते हैं। बरतन उस सिंक में नहीं धोए जा सकते जहां कपड़े धुलते हों। रसोई का सिंक केवल बर्तनों के लिए होता है, वहां हाथ भी नहीं धुल सकते। स्त्रियों-पुरुषों के कपड़े साथ नहीं धुल सकते, क्योंकि स्त्री देह अपवित्र होती है। रोमा जनजाति में नदी या झरने से पानी लाने के अपने अपने बहुत कड़े और विशिष्ट नियम होते हैं। 

किसी भी जलधारा के सबसे दूरस्थ या उच्चस्थों सिरे से लाया गया पानी सबसे पवित्र और पीने और खाना बनाने योग्य होता है। बीच की जलधाराओं में बर्तन और नहाना-धोना हो सकता है। उससे नीचे के स्तर की जलधाराओंका पानी घोड़ों को पिलाने नहलाने के लिए, इससे आगे या नीचे गंदे कपड़ों के धोने का पॉइंट होता है। सबसे निचले स्तर पर बहते पानी को मासिक से गुज़रती महिलाओं या गर्भवती महिलाओं के लिए सही समझा जाता है। इस तरह के वर्गीकरण से पवित्रता बनी रहती है। 

पारंपरिक रोमा महिलाएं अकसर रंगीन घाघरे पहने रहती हैं और कान में लंबे झाले। महिलाओं के पैर नहीं दिखने चाहिए। महिलाओं का पैर दिखाना बड़ा उल्लंघन माना जाता है। कई परतों वाले ये ख़ुशनुमा रंगीन घाघरे ही इनकी पहचान हैं। बस अलग अलग रंग के घाघरों के अलावा रोमा युवतियों की वार्डरोब में कुछ और नहीं होता। कई जनजातियों में अगर स्त्री विवाहिता है तो उसका सर ढका होना चाहिए, 'डिक्लो' नामक ओढ़ने से। या फिर माथे पर स्कार्फ बँधा हो। ये महिलाएं लंबे बाल रखती हैं, जिनको चोटी में या रोल करके जूड़ों में बाँधती हैं। रोमा महिलाएं खूब ज़ेवर पहनती हैं न केवल सुंदरता के लिए बल्कि इनके पारंपरिक महत्व के चलते। ज्यादातर के पास बैंक अकाउंट या लॉकर्स नहीं होते। इसलिए इनको लगता है कि अपनी संपत्ति देह पर ही धारण कर ली जाए। पारंपरिक तौर पर  इनके यहां भी कमाया हुआ धन आभूषणों या सोने के सिक्कों  जिसे ये 'गाल्बी' कहते हैं, के रूप में ही रखा जाता है।  इन्हें ये कपड़ों में सिलकर रखती हैं या बालों में टाँककर ।

पुरुषों के लिए कोई तयशुदा पोषाक नहीं है इनमें। जैसा कि सर को एक खास बिंदु की तरह माना जाता है तो ये पुरुष सर पर हैट पहनते हैं और बड़ी मूँछें रखते हैं। उत्सवों के समय ये अच्छा सूट पहनते हैं, बस उसका रंग चटख हो। इनमें से ज़्यादातर के पास ज़िंदगीभर एक ही सूट होता है जिसे वे खास मौकों पर पहनते रहते हैं जब तक कि वह फट न जाए। एक रंगीन स्कार्फ ज़रूर ये गले में डालते हैं।

मारिमे या अपवित्रता की वर्जना जानवरों पर भी लागू होती है। वे कुछ ही जानवरों का माँस खाते हैं और रोमाज़ के पालतू बनने के लिए जानवरों में कुछ ख़ासियतें ज़रूरी हैं। ये रोमानी जानवरों के प्रति क्रूरता का बहिष्कार करते हैं और जानवर को केवल भोजन के लिए मारते हैं। 'जर्मन सिन्टी' और अन्य रोमा समूह घोड़े के मीट को खाना बहुत बड़ा अपराध मानते हैं। क्योंकि घोड़ा रोमाज़ के अतीत में परिवहन और जीवन का महत्वपूर्ण अंग रहा है तो उसके मीट को खाना 'मारिमे' के कलंक से जोड़ा जाता है।

कुत्ते और बिल्लियों को अपवित्र मानते हैं रोमाज़ क्योंकि वे साफ सफाई से नहीं रहते। खासतौर पर बिल्लियां जो अपने मल को मिट्टी से ढक कर अपना पंजा जो चाटती हैं। कुछ रोमा जनसमूहों के लिए बिल्लियां आकस्मिक मृत्यु का कारक भी होती हैं। अगर बिल्ली घर में, मोटर में, ट्रक के ट्रेलर में घुस जाए तो पवित्रता की कुछ रस्में करना ज़रूरी हो जाता है। कुत्ते भी उन लोगों के अनुसार गंदे होते हैं, पर थोड़े कम। इसलिए कुत्ते घर के बाहर चौकीदारी हेतु स्वीकृत हैं। उल्लुओं को रोमा अन्य लोगों की तरह मौत का प्रतीक मानते हैं। कई रोमा लोग उल्लू की चीख को दुर्भाग्य सूचक यानि 'बिबाक्स्ट' मानते हैं। इसलिए उल्लू भोजन और पालतू दोनों की श्रेणी से बाहर का जीव! 

हांलाकि अधिकतर रोमा अपना सामुदायिक जीवन, विदेशी समाजों से घिरे रह कर बिताने के आदी हो चुके हैं। लेकि इनके समुदायों के महंत, मुखिये इन्हें लगातार नॉन रोमा लोगों से अलग - थलग रहने का आदेश - उपदेश देते रहते हैं। यह अलगाव ही है जो रोमा समुदायों के लिए नुक़सानदेह रहा है बजाय उन नॉन-रोमा जनजातीय समुदायों के जो बाकि समाज से अलग-थलग होकर नहीं रहे। जबकि ये लोग अतीत में अपनी बराबरी के हक के लिए लड़ते रहे, मगर रोमा समुदायों ने अपनी मर्ज़ी से अलग-थलग रहना चुना। कई रोमा परिवार बिना अपनी पहचान खोए धीरे-धीरे अमेरिका और यूरोप की मुख्यधारा में शामिल होते जा रहे हैं।

दरअसल मासमीडिया की दख़लंदाज़ी ने रोमाज़ के लिए अपना अलग अस्तित्व बनाए रखना मुश्किल कर दिया है। टेलीविज़न के कैमरे लगातार उनके पीछे रहते हैं, अगर वे एक जगह से दूसरी जगह प्रवास बदलते हैं तब भी। 

शिक्षा का दबाव भी जो अलग अलग रोमा समूहों पर अलग अलग मात्रा में है, समस्या को उलझा चुका है। हांलांकि थोपी हुई शिक्षा की जगह अशिक्षा ही है जो उनके समूह की जातिगत पहचान को बचाने में सहायक हो सकती है, उन्हें अपने घेरे में ज्यों का त्यों छोड़ कर। यह बीच की अवस्था आधुनिक समाज में उनको पंगु ही बनाएगी। न वे घर के रहेंगे न घाट के। 

हांलांकि ये अपने जीवनयापन के लिए अपने मेज़बान देश के लोगों से संपर्क में आते ही हैं फिर भी  रोमाज़ इन आधुनिक समाजों का हिस्सा नहीं होना चाहते, न ही अपनी पारंपरिक आस्थाओं और विश्वासों को त्यागना चाहते हैं। 

अगर इनको आगे किसी तरह के समझौते करने की ज़रूरत आई भी तो वह हमेशा रोमाज़ की अपनी ही इच्छा पर निर्भर करेगा है कि वे अपने आस-पास के माहौल से कितना और कैसा सामंजस्य बैठाएं। 

इतना समय गुज़र जाने पर भी बहुत से रोमाज़ भयभीत रहते हैं कि यह एकीकरण उनके समुदाय का अनुकूलता कर देगा और धीरे धीरे स्वत: ही उनकी रोमानी पहचान समाप्त हो जाएगी। 

         

बहादुर सिंह राठौड़

यह लेख बहादुर सिंह राठौड की पुस्तक UNMIK ( United Nation’s Mission in Kosovo) A Civpol’s diary’ से लिया है।

-बहादुर सिंह राठौड़

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