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फिर छिड़ी बात फूलों की...

राजश्री मिश्रा

सौंदर्य को सहजता से प्रस्तुत करना हो , श्रद्धा , सम्मान अभिनंदन को मूर्त स्वरूप प्रदान करना हो ,विषाद विराग के मौन को आकार देना हो अथवा  प्रेम को अभिव्यक्त करना हो पुष्पसभी सुकोमल संवेदनाओं का पर्याय है। जीवन में पुष्प के महत्व को रेखांकित करते हुए अनेक ऋचाएँ , कविताएँ साहित्य में मिल जाएँगी लेकिन सभी सार एक ही है कि पुष्प हृदय को अल्हादित करते हैं । प्रकृति ने सुंदर फूलों की रचना संतप्त हृदय को सांत्वना देने के लिए की है ।पुष्प जीवन के हर संस्कार में शामिल हैं । कितने ही प्रकार के फूलों को हम देखते हैं सराहते हैं , उनसे  सज्ज होते हैं , अपने परिवेश को संवारते हैं लेकिन हर फूल से परिचित नहीं होते । फूलों का संसार इतना विशाल और  अद्भूत है कि सभी के विषय में जानना सम्भव भी नहीं है किन्तु कई फूल इस तरह से हमारे जीवन में शामिल हैं कि उनको नज़रअन्दाज़ नहीं किया जा सकता । मेरे जीवन के स्मृतिपटल पर अंकित ऐसे ही कुछ फूलों के बारे में है बातें फूलों की 

गुलमेहँदी 

....कुछ बिसरी यादें बरसों बाद अचानक मेमोरी स्क्रीन पर पॉप-अप होतीं हैं और बैचेन किए रहती हैं। ऐसी ही एक याद मेरी याददाश्त में बालसम, गुलमेहंदी, तिवड़ा या छत्तीसगढ़ी में कहें तो चिरैया फूलों के चटक लाल रंग के पुष्प-हार की है। मुझे अच्छी तरह याद है कि मेरे बचपन में हम जहाँ रहते थे ,वहाँ घर के सामने ही सार्वजनिक पंडाल में गणेश जी की स्थापना की जाती थी और गणेश जी की मूर्ति को इन फूलों की चाँदनी फूलों के साथ गूँथीं सुंदर माला पहनायी जाती थी।

उस समय में हमारे छोटे शहर में नर्सरी या फूलों की दुकानें नही थीं। फूल घरेलू बगीचों में मिलते थे या फिर माली घरों में पूजा के लिए केले या पलाश के पत्तों में बांध कर चाँदनी के सफ़ेद फूल , गुड़हल के लाल फूल , दूब  और बेल पत्र पहुँचाया करते थे। मौसम के हिसाब से इस पैकेज में थोड़ा बहुत परिवर्तन होता था बारिश में गुलमेहंदी के फूल और ठंड में गेंदे के फूल शामिल रहते थे। हाइब्रिड पौधे हमारे उस छोटे शहर में बिरले ही किसी बाग़वानी के शौक़ीन के यहाँ दिख जाते । उस दौर में बाग़वानी के शौक़ीन एक दूसरे से पौधों की कटिंग्स , बीज और रोपों का आदान-प्रदान किया करते थे।पौधे ख़रीदे और बेचे भी जा सकते हैं यह तब शायद किसी ने सोचा भी नही होगा।

मैंने ख़ुद इसी बारटर सिस्टम ( barter system ) से एक जमाने में अपना 175 प्रकार के कैक्टस का कलेक्शन तैयार किया था और ग्राफ़्टिंग की तकनीक सीख कर गुलाब और कैक्टस पर कई सफल असफल प्रयोग किए थे।

फूलों की सीमित उपलब्धता के उस दौर में चटक लाल रंग के गुलमेहँदी के फूलों की लम्बी सी माला मेरे लिए अजूबा थी। अतः उसे तो मेरे स्मृति पटल पर अंकित होना ही था ,क्योंकि उस दिन से पहले तक मैंने तो गुलमेहँदी के माहुरी रंग के दो तीन पंखुड़ी और एक छोटी कलगी-तुर्रे वाले छोटे-छोटे गंधहीन फूल    ( Himalayan balsam)  ही देखे थे जिनके सीड पॉड ( seed -pod) हल्के से दबाने पर हरे रंग की इल्लियों जैसे बन जाते थे ,उनकी तुलना में कहाँ ये सुन्दर गुलाब के फूलों सी बनावट और चटक रंग वाले फूल ,लेकिन बीते कई सालों में मेरे ज़हन में कभी उसका ख़्याल नही आया और बहुत समय हुआ मैंने गुलमेहँदी के फूल कहीं देखे भी नही शायद अब इतने तरह के फूलों के पौधे मिलते हैं कि लोग इसे अपने बगीचों में नही लगाते हैं।

सालों बाद इस साल मुझे गुलमेहँदी के फूलों की इतनी याद आयी कि मेरा मन गुलमेहँदी के पौधे लगने के लिए हुलसने लगा। गुलमेहँदी के पौधे पर ,गणेशोत्सव तक अर्थात अगस्त सितम्बर तक फूल आ जाते हैं ,तो निश्चित ही जुलाई के आरंभ में लगाए जाते होंगे इस अनुमान से मैंने नर्सरी में पूछताछ शुरू की , संयोग से मेरे ऑफ़िस जाने के रास्ते के दोनो ओर शहर की कई बड़ी प्लांट नर्सरी हैं , सो आते-जाते पड़ताल करती और आश्चर्य कि उनमे से कुछ तो  impetiens के पौधे को ही बालसम का पौधा बताते तो कुछ सर्दियों का मौसमी पौधा बता मुझे सितम्बर तक इंतज़ार करने की सलाह देते और मैं वनस्पति विज्ञान की भूतपूर्व छात्रा उन्हें समझाने का असफल प्रयास करती कि किस तरह नर्सरी की भाषा में impetiens और  balsam कहलाने वाले दोनो पौधे एक ही plant family Balsaminaceae और Genus  Impetiens  के होने के बावजूद अलग-अलग प्रजाति (species ) के होने के कारण अलग-अलग पौधे हैं, और जिस बालसम की मैं माँग कर रही हूँ वह जुलाई में ही लगाया जाता है।

मेरी इस दुरूह खोज का अंत इतने सामान्य तरीक़े से होगा यह मैंने सोचा भी नही था। एक दिन सरकारी नर्सरी जाना हुआ , वहाँ उद्यानिकी विभाग की नर्सरी में काम करने वाली एक मजदूर महिला से पूछने पर उसने बड़ी सहजता से 20-25 पौधे बस इतने ही बचे हैं कहते हुए मुझे पकड़ा दिए , किस रंग के फूल आएँगे ? मुझे लाल रंग चाहिए जैसी उत्सुकता और फ़रमाइश दोनो का जवाब उसकी एक गहरी मुस्कान थी जो शायद जानकारी नही होने की ओर इशारा कर रही थी । मुझे रंग को लेकर थोड़ी उलझन तो थी लेकिन इस बात की तसल्ली भी थी कि इन फूलों के मौसम के विषय में मेरा अनुमान ग़लत नही था।

बालसम के रोपे सही समय पर क्यारी में लगाए गए। ये लगभग जंगली प्रकृति के होते हैं ज़्यादा देखभाल की ज़रूरत नही होती है लेकिन दूज़बर पर दो आषाढ़ को चरितार्थ करते हुए भादो ने इस बार सावन को पछाड़ देते हुए कई दिनों के लिए सूर्य देव को बंधक बनाए रखा। लगातार तेज बारिश और बादल से रोपे को पौधे में बदलते देखने की साध अधूरी रह जाएगी लगने लगा था लेकिन पिछले कुछ दिनों के मौसम ने वो असर दिखाया कि रोपे ना सिर्फ़ घनी शाखाओं वाले पौधे बने बल्कि मुझे चमत्कृत करते हुए उनमे लाल फूल भी खिल रहे हैं , जब कि इनमे से जो पाँच छः पौधे मैंने मेरी सहयोगी अधिकारी  को दिए थे उनमे गुलाबी फूल आ रहे हैं।

अब मैं सोच में हूँ कि संयोग से मेरे हिस्से में लाल फूलों वाले गुलमेहँदी के पौधे आए थे या लाल फूलों के लिए मेरी ललक को देखकर इन पौधों ने लाल रंग के फूल खिलाने का सोचा है

मधुमालती

हम सभी ने अपने बचपन में चित्रकारी की शुरुआत काग़ज़ पर पेंसिल से एक छोटे गोले के चारों ओर अंडाकार पाँच पंखुड़ियों वाले फूल और उसके लम्बे पुष्प वृंत पर दो या एक पत्ते वाली आकृति उकेरने से की है । हम में से किसी ने भी शायद कभी उस फूल की पहचान जानने की कोशिश नही की होगी क्योंकि हमारे अवचेतन में अपने नन्हे हाथों से बनाया गया वह चित्र समस्त फूलों का प्रतिनिधित्व करता है। यदि आज भी हमें फूल का चित्र बनाने कहा जाए तो बग़ैर किसी प्रयास के हम वही पाँच पंखुड़ियों वाला फूल काग़ज़ पर खिंच देंगे। सबकी तरह मेरी यादों में भी ये सरल संरचना वाला फूल शामिल है लेकिन काग़ज़ से निकल कर मेरे घर के बरामदे के एक कोने से ऊपर जाती सीढ़ियों के साथ चढ़ती एक बेल में खिले फूलों के गुच्छे के तौर पर। मेरी याददाश्त की किताब के सफ़हों पर यह बेनाम फूल हरे पीले पत्तों वाले मनी प्लांट के साथ दर्ज है। मेरे उस घर में हरियाली के नाम पर लताओं वाले बस दो पौधे थे। एक था बरामदे के खम्बों पर लटका काँच की बॉटल में पानी भर कर लगाया गया मनी प्लांट ,जो पतली रस्सी के सहारे बरामदे की पूरी लम्बाई में फैलाया गया था। पहले से ही पूरे बरामदे को अपने विस्तार से अतिक्रमित किये मनी प्लांट के पौधे को और बड़ा करने फैलाने के लिए बड़े जतन किए जाते थे। मम्मी इसकी बॉटल में अक्सर किसी दवाई की गोली इस उम्मीद से डालतीं की यह और बढ़ेगा, और अधिक फैलेगा। इसकी बड़ी पूछ परख थी ,पड़ोसी और जान पहचान वाले कभी माँगकर और कभी नज़र बचाकर मनी प्लांट ले जाते थे। अगर कोई हमारे मनी प्लांट की तारीफ़ करता तो मम्मी बहुत नाराज़ होतीं थीं । ख़ुदा न ख़्वास्ता कभी मनी प्लांट के पत्ते किसी की तारीफ़ के बाद पीले पड़ जाते तो मेरी माँ का यक़ीन पुख़्ता हो जाता कि तारीफ़ करने वाले की बदनज़र का असर ही रंग ला रहा है। हम इतने नासमझ थे कि हमको ना तो मनीका शाब्दिक अर्थ धन सम्पत्ति , मुद्रा , पैसा जैसा कुछ होता है की जानकारी थी ना ही मनी प्लांट की हरियाली से घर की समृद्धि के गूढ़ रहस्य से कोई वास्ता था। हमारे लिए तो मनी प्लांट घर के बरामदे में लगी वो बिना फूलों वाली नामुराद बेल थी जिस पर मम्मी का सारा लाड़-दुलार न्योछावर था । मुझे यह  बे-गुल मनी प्लांट गुलज़ार होने के बावजूद बेज़ार लगता था। 


मुझे प्रिय थी सीढ़ियों के पास लगी हरे पत्तों और गुलाबी लाल फूलों के गुच्छों से लदी वो बेनाम बेल जिसका नाम मुझे बहुत सालों बाद पता चला कि मधुमालती है , और फिर एक क्या ? कई नाम क्विस्कवेलिस , रंगून क्रीपर , वानस्पतिक नाम Combretum indicum सब एक साथ पता चल गए और वनस्पतिशास्त्र की पढ़ाई ने मधुमालती के पूरे कुनबे से परिचय करवा दिया। लेकिन मुझे मधुमालती से अपनी वो बचपन वाली दोस्ती ही प्रिय है मैं जब शाम के समय सीढ़ियों पर बैठ उस के साथ समय गुज़ारा करती थी। तब वह मेरे लिए जादुई फूलों की बेल थी जिसमें लगभग सफ़ेद रंग की कलियाँ आतीं थीं जो शाम को खिलकर हल्के गुलाबी रंग के फूल में बदल जाती थीं जिनसे भीनी-भीनी ख़ुशबू आती थी और ये हल्के गुलाबी फूल दो से तीन दिनों में लाल रंग के हो जाते थे। सफ़ेद , गुलाबी और लाल के विविध शैड्ज़ वाले फूलों से सजा पुष्प गुच्छ बेहद ख़ूबसूरत दिखता था। यह नजारा तब और भी जादुई हो जाता जब हवा में उड़ते-उड़ते ही भूरे पंखों वाली तितली अपनी गोल करके रखी सूँड़ को स्प्रिंग की तरह झटके से खोलकर गुलाबी फूलों के बीच छिद्र में डालती और झट से वापस खिंचकर दूसरे गुलाबी फूल पर मँडराने लगती। ये भूरी तितलियाँ लाल रंग के फूलों से परहेज़ करतीं थी कभी लाल रंग के फूलों पर नही मँडरातीं थीं। दूसरी शिकायत मुझे इन भूरी तितलियों से ये थी कि ये दिन भर ग़ायब रहतीं थीं और बस शाम को ही दिखाई देतीं थीं तो पूरा दिन इनका इंतज़ार करना पड़ता था और जब ये आतीं उसके थोड़े समय बाद ही अंधेरा होने लगता था तब मुझे इनका साथ छोड़ अंदर जाना होता था क्योंकि शाम को पौधों को छूने उनके पास जाने की मनाही थी। 

कॉलेज में जीवविज्ञान और वनस्पतिविज्ञान के अध्ययन से बचपन का जादुई संसार अनावृत हुआ तो थोड़े दुःख ,थोड़े रोमांच के साथ थोड़ी शर्मिंदगी भी हुई कि जिसे हम तितली समझ रहे थे वो तितली नही मॉथ है। ये बात आज शाय प्री स्कूल का कोई छात्र भी बता दे लेकिन तब के स्कूल सामान्य ज्ञान पढ़ाते भी तो नही थे। तितली और मॉथ दोनो ही कीट समूह के ऑर्डर लेपिडोप्टेरा के सदस्य है। तितली और मॉथ दोनों में ही दो जोड़ी पंख एवं कुंडलित सूंड (प्रोबोसिस) होती है। और सूंड की मदद से ये फूलों का मकरंद चूसते हैं। तितली और मॉथ में बहुत सी असमानताएँ भी हैं जिनमे से एक जो मेरी उलझन को सुलझती है और मेरी भूरी तितली (अब - मॉथ ) दिनभर कहाँ रहती थी ? जैसे प्रश्न का सटीक और तार्किक जवाब है कि आमतौर पर तितलियां दिन में सक्रिय रहती हैं जब कि मॉथ सूर्यास्त के बाद चैतन्य होते हैं और चूँकि गुलाबी फूलों में मकरंद अधिक होता है इस लिए वे गुलाबी फूलों पर मँडराते हैं और लाल फूलों के पास नही जाते हैं। प्रकृति ने वनस्पति और जीवों के साहचर्य की जो व्यवस्था की है वह बेजोड़ है यूँ ही नही ये लम्बी सूँड़ वाला मॉथ मधुमालती के लिए दीवानगी दिखता है। प्रकृति ने इसके लिए यह नियति तय कर रखी है ।मॉथ और नलीदार फूलों वाली वनस्पति, ये दोनों साथ साथ विकास (Co-evolution) का नायाब नमूना हैं। ज्यादातर फूल जो रात में खिलते हैं या सूर्यास्त के बाद खिलते हैं, अक्सर सफेद या हल्के रंग के होते हैं और उनमें मोहक गंध होती है, जिस से वे कीटों को आकर्षित कर पाते हैं। इन फूलों का परागण मॉथ द्वारा किया जाता है। प्रकृति हमेशा ही आश्चर्य चकित करती है। 

उस शहर और घर को छोड़ने के बावजूद मधुमालती की भीनी ख़ुशबू और मीठी यादें हमेशा मेरे साथ रहीं। शायद इसलिए पाँच छः वर्ष की उम्र में एक पड़ोसी से सीखी मधु मालती के फूलों से बग़ैर सुई-धागे के पुष्प वृंत को गूँथ का पुष्पहार बनाने की विधा अब तक मुझे अच्छी तरह याद है एक इकहरी माला कलियों से बनती थी और दूसरी फूलों से जो  की पुष्प वृंत की चोटियाँ गूँथ कर बनायी जातीं थीं। मेरे शहर में मधुमालती के पर्याप्त फूल उपलब्ध नही होने से चाह कर भी मेरे लिए इन फूलों की लम्बी मलाएँ बनाना सम्भव नही हो पा रहा है। एक असफल प्रयास के बाद मैंने अपने बगीचे में इस साल फिर से मधुमालती का एक पौधा बड़ी उम्मीदों के साथ लगाया है।

मेरे शहर में मधुमालती की बेल याद कदा ही दिखती है। अपने कोलकाता प्रवास के दौरान मैंने नोटिस किया कि यहाँ ज़्यादातर पुराने घरों में प्रवेश द्वार को सजाती , मुँडेर से ऊपर चढ़ती या बाउंड्री वॉल पर फैली मधुमालती की बेलें बहुतायत में दिख जाती हैं। देखकर ऐसा लगता है कि यहाँ के घरों में बेलों और दूसरे पौधों को अपनी मर्ज़ी से बढ़ने फैलने की पूरी आज़ादी है तभी तो क्रोटोन भी छोटे वृक्ष जैसे दिखाई देते हैं और मधुमालती की बेलें भी साधिकार घरों को आच्छादित किए हैं।

काश !   यहाँ की तरह मेरी मधुमालती की बेल भी लहलहाए  ....आमीन

कनेर

....कभी-कभी जीवटता उपेक्षा का कारण बन जाती है .जीवन की सभी विषमताओं का डटकर सामना करने वालों के लिए उनके प्रियजन स्वयं ही ये अवधारणा बना लेते हैं कि उन्हें किसी के प्रेम- देखभाल की कोई आवश्यकता ही नहीं और सारा प्रेम उन लोगों पर लुटाते हैं जो हमेशा साहचर्य के आकांक्षी होते हैं . ऐसा ही वनस्पति जगत में एक फूल है ,पीले चटक रंग का कनेर . सड़क के बीचों बीच डिवाइडर पर लगे पीले कनेर के पेड़ों को देखकर मुझे और अधिक उनके उपेक्षित होने का एहसास होता है .मेरे घर के बगल में कॉलोनी का एक छोटा सा गार्डन है जिसमे कनेर , गुड़हल , चांदनी , पेंटास , सदासुहागन के पेड़-पौधे लगे हैं . अपनी बालकनी से रोज सुबह पूजा के फूल चुनने वालों का कनेर के प्रति सौतेला व्यवहार देख कनेर के लिए मेरे मन में करुणा का भाव उपजता है .फूल तोड़ने वाले ऊंचाई पर लगे गुड़हल के फूल को भरसक प्रयास कर तोड़ते हैं और अपनी डलिया में सहेजते हैं लेकिन उनकी आँखों के सामने झूलती कनेर के फूलों से लदी डाली पर नज़र नहीं डालते हैं . हर मौसम में हरा भरा फूलों से लदा रहने वाला यह सौम्य कनेर मेरी राय में इससे बेहतर व्यवहार का हक़दार है और उसका यह हक सनबर्ड अदा करतीं हैं . सनबर्ड सारा दिन अपनी पतली लम्बी चोंच से घंटीनुमा कनेर के फूलों को चूमती ,उसके कानों में जाने क्या संदेसा गुनगुनाती, कनेर के फूल के आस पास मंडराती रहतीं हैं .

पीला कनेर अपने चटक रंग के बावजूद शांत सौम्य नज़र आता है तो नारंगी कनेर किसी बैरागी सा विरक्त लगता है वहीँ शुभ्रवर्ण कनेर अपनी शुभ्रता को हरे पीले रंग से छिपाता सा नज़र आता है . जाने क्यों मुझे कनेर का पेड़ हमेशा सकुचाया सा लगता है . देव पूजन के लिए दूसरे पुष्पों की तरह स्वीकार्य नहीं होने से वह हीनभावन से ग्रस्त है ,इसलिए ?? या स्वर्णिम सौन्दर्य के बावजूद उस की धमनियों में बहती विषाक्तता उसे उल्लासित होने से रोकती है ,लेकिन यह विषाक्तता ही तो है जो उसे देवाधिदेव महादेव का प्रिय बनाती है ,जीवट बनाती है .  किसी जीवजन्तु का आहार बनने से बचाती है .  

कनेर की सहजता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की यह बीज से या कलम से आसानी से उगाया जा सकता है. इसके लिए किसी खास प्रकार की मिट्टी की या सार सम्हाल की ज़रूरत नहीं होती खुद को जीवित रखने की कला में यह माहिर होता है  .शहरों की भव्यता में इसका स्थान जहां सड़कों की शोभा बढ़ाने में है ,वहीँ गाँव-कस्बों में इसका अलग ही रुतबा है जो एक लोकगीत की पंक्ति से जाहिर है जिसमे एक बेटी अपने नैहर संदेसा भेजते हुए बटोही को अपने पिता के घर का पता बताते हुए कहती है ... 

कुंववा जगतिया कनइल बन फूले ,

  दुवरे निबिया के गाछ हो

अर्थात मेरे पिता के घर के आगे कुंए के पास कनेर का झुरमुट खिलता है और द्वार पर नीम का पेड़ है . कितनी प्रतिष्ठा और उससे जुड़ी कैसी मधुर स्मृति है कि बेटी को अपने पिता के घर की पहचान बताते हुए कनेर का पेड़ याद आता है .

कनेर भले ही कवियों और दूसरे भक्तों , को न सुहाता हो लेकिन मुझे बहुत भाता है हर हाल में मुस्कुराते रहने की उसकी अदा मुझे बहुत रिझाती है अपनी बालकनी से गार्डेन में लगे कनेर के पेड़ पर लम्बी नोकदार चमकीली हरी पत्तियों के बीच में चटक पीले फूलों को देख मुझ में जीवन-ऊष्मा का संचार होता है.  मै बिना किसी भेदभाव के गणेशोत्सव में घर में विराजे गणपति जी का पीले , सफ़ेद , नारंगी , गुलाबी कनेर की पुष्प मालाओं से श्रृंगार करती हूँ क्योंकि जिस ईश्वर ने सम्पूर्ण सृष्टि की रचना की है उसे अपनी ही एक सुन्दर कृति से भला क्यों परहेज होगा ? मुझे विश्वास है कि वे उसे उतनी ही सहजता से स्वीकारते होंगे जितनी निस्पृहता से कनेर ने अपनी नियति को स्वीकार किया है . 

चम्पा

 .....सफ़ेद रंग के एक फूल के मोहपाश से जो उस दिन बंधी तो आज तक मुक्त नही हो सकी । उस दिन से पहले मुझे याद नही कि उस फूल को कभी देखा या जाना था । देखा भी होगा तो इस नज़र से नही कि ताउम्र के लिए वह मेरी चाहतों में शुमार हो जाए।

हमारे शहर में ज़्यादा कुछ नही था पर वह नदी के किनारे बसा ,सागौन के घने जंगलों से घिरा एक शांत शहर था शायद इसी लिए प्रदेश का इकलौता वन विभाग का रेंजर्स ट्रेनिंग कॉलेज उस शहर में स्थापित किया गया था । जिसके प्रशिक्षणार्थी सफ़ेद पेंट शर्ट पर हरी-पीली धारियों वाली टाई लगाए सप्ताह में एक बार शहर में घूमते दिख जाते थे। उस उम्र में अपनी समझ के हिसाब से इनकी पहचान के लिए मैंने कुछ अंतर चिन्हित कर लिए थे जैसे टाई वाले रेंजर्स कॉलेज के लड़के हैं जो सप्ताह में एक बार दिखते हैं और बिना टाई के सफ़ेद पेंट-शर्ट पहनने वाले बी.टी.आई. के छात्र हैं जो रोज़ दिखाई देते हैं। इन के सप्ताह में एक बार दिखने का रहस्य मुझ पर तब उजागर हुआ जब सागर में ट्रेनिंग के दौरान हम प्रशिक्षणार्थी भी सफ़ेद पेंट-शर्ट पर नीली-लाल धारियों वाली टाई लगाकर रविवार के दिन ज़रूरत के सामान लेने पुलिस ट्रेनिंग अकादमी से शहर जाते थे। तब अक्सर मैं सोचती थी कि क्या कोई बच्चा हमारे बारे में भी वैसे ही सोच रहा होगा जैसा मैं सोचा करती थी। 

रेंजर्स ट्रेनिंग कॉलेज शहर के बाहर नदी के किनारे था सड़क से केवल उसका प्रवेश द्वार और दूर तक कतारबद्ध हरियाली का विस्तार दिखाई देता था। हमारे एक रिश्तेदार रेंजर्स कॉलेज में पदस्थ थे और उसी परिसर में रहते थे जब कभी हम उनके घर जाया करते तो अक्सर मौसमी फलों की टोकरी लेकर वापस आते थे । वे उत्साही प्रकृति के थे , बच्चों को परिसर की सैर कराते और तरह-तरह के पेड़-पौधों के बारे में जानकरियाँ देते और उनसे सम्बंधित कहानियाँ सुनाया करते थे। संभवतः अध्ययन के लिए वनस्पति शास्त्र का चुनाव करने में उनसे सुनी कहानियों का बाल मन पर पड़ी छाप का भी असर रहा हो। 

प्रकृति की विविधता ने मुझे हमेशा ही चौंकाया है एक ही रंग के कितने शेड्ज़ और दूसरे रंगों के साथ अनगिनत कॉम्बिनेशन सभी तरह के कलर व्हील और कलर थ्योरी को मात देते हैं । जब कोई चित्रकार अपनी किसी कृति में रंगों के प्रयोग में नवाचार की बात करता है तो उसको प्रकृति का आइना दिखाने का मन करता है । केवल रंग संयोजन ही नही वरन उपयोगिता के अनुरूप आकार-प्रकार संरचना सब कुछ अद्भूत है, इसलिए  ही संसार को ईश्वर की रचना कहा जाता होगा क्योंकि जो कुछ प्राकृतिक तौर पर है वह मानवीय क्षमताओं से परे है . प्रकृति की ऐसी ही एक उत्कृष्ट कृति से मेरा परिचय पहली बार उनके साथ भ्रमण के दौरान हुआ .

एक प्राकृतिक बोन्साई जैसा पेड़ जिस की टेढ़ी मेढ़ी खुरदुरी शाखाओं के अंतिम सिरे पर गहरी हरी लम्बी अंडाकार पत्तियों के छत्र और पत्तियों के बीच से निकले सफ़ेद-पीले अविश्वसनीय गंध वाले पुष्पों के गर्वीले  पुष्प-गुच्छ जिनमे से कुछ श्री चरणों में चढ़ाये जाने की लम्बी प्रतीक्षा से निराश हो धरती की गोद में मायूस से बैठे थे .ये चम्पा का पेड़ था , चम्पा के फूलों की स्वर्णिम आभा और भीनी महक ने मुझे सम्मोहित कर लिया था। उजले सफ़ेद रंग को हल्के से स्पर्श करता पंखुड़ियों के तल में जाकर एकत्रित पीला रंग , सादी सी बनावट एक दूसरे को किनारों से ढँकती हुई चारपाँच पंखुड़ियों के सरल पुष्प विन्यास वाले इस सुगंधित फूल के अप्रतिम सौन्दर्य को उस समय के मेरे सीमित शब्दकोश से मैं अहा! कित्ता सुंदर है कह कर ही अभिव्यक्त कर पायी थी । चम्पा के फूलों का सादगीपूर्ण गरिमामय सौंदर्य ही शायद इस के कृष्ण प्रिया होने का कारण हो. उस समय उनसे सुनी एक कहानी के अनुसार चम्पा राधा का स्वरूप है इसलिए कृष्ण को प्रिय है और चूँकि भँवरे कृष्ण के दास होते हैं ,इसलिए वे मर्यादावश सुवासित गंध के बावजूद राधा स्वरूप चम्पा के नज़दीक नही आते हैं। जिसको कवि ने सुंदर छंद में भी प्रस्तुत किया है

चम्पा तुझ में तीन गुण- रंग रूप और वास, अवगुण तुझ में एक ही भंवर न आएं पास।

रूप तेज तो राधिके, अरु भंवर कृष्ण को दास इस मर्यादा के लिए भंवर न आएं पास।। 

बाद के वर्षों में वनस्पति शास्त्र की पढ़ाई ने इस सौंदर्य माधुर्य का हरण करते हुए ज्ञान के आलोक में इस तथ्य से अवगत करवाया कि चम्पा में पराग नहीं होता है इसलिए इस के पुष्प पर भंवरे मधुमक्खियां कभी भी नहीं बैठते हैं .

वनस्पतिशास्त्र की पढाई ने फिर चम्पा और उसके परिवार के अन्य सदस्यों से खूब परिचय करवाया जैसे सोन चम्पा, नाग चम्पा, कनक चम्पासुल्तान चम्पा और कटहरी चम्पा ,और हमने भी सभी की पूरी जन्मकुंडली घोंट ली सभी तरह की चम्पा बेहद सुंदर और अद्भुत सुगंध वाली होतीं हैं .

चम्पा- प्रेम का आलम ये है कि 43  एकड़ में फैले कार्यालय परिसर में कार्यभार ग्रहण करने के बाद से अब तक प्रति वर्ष अन्य पौधों के साथ साथ चम्पा के भी सैकड़ों पौधे लगवाए हैं जो परिसर के छोटे- छोटे हिस्सों में चम्पक वन का आभास दिलाते हैं . दिल को एक तसल्ली है कि रहें न रहें हम, महका करेंगे .... 

लैंटाना

              ...रेल यात्रा के दौरान खिड़की से मनोरम दृश्यों और रेलगाड़ी की गति के विपरीत दिशा की ओर दौड़ते पेड़-पौधों देखने के शौक़ ने ही रेल्वे कैबिन और आउटर के पास जंगली झाड़ीनुमा पौधों पर लगे इन फूलों से मिलवाया था । इन्हें देख मुझे लगता है जैसे जंगल ने अपने रसिक के स्वागत में  इन झाड़ियों को रेल पाँत के दोनो ओर अँजुरी में फूल लेकर खड़ा किया है ।  हाँ सच ! दो बड़ी अंडाकार खुरदुरी पत्तियों के बीच छोटे-छोटे पीलेनारंगीगुलाबीबैगनी, रंग के मिश्रित फूलों के छोटे-छोटे गुच्छे अँजुरी में रखे फूलों का आभास देते हैं । ये सुंदर फूल हमेशा जंगल झाड़ी में सड़क के किनारे या रेल यात्रा के दौरान ही दिखते कभी किसी बगीचे में इन्हें शोभायमान होते नही देखा था ,जो मुझ जैसे इन फूलों की प्रशंसक के लिए दुःख का बड़ा कारण था । प्रेम में बड़ी शक्ति होती है ,इस बात से मेरा परिचय तब हुआ जब मेरे घर के सामने की एक ख़ाली ज़मीन पर ढेरों जंगली पौधों और कचरे के ढेर के बीच एक दिन मैंने गुलदस्तों के इस पौधे को लहलहाते देखा । घर के आँगन में ना सही घर के सामने अपने पसंदीदा फूलों को खिलते देखना उस समय मेरे लिए जीवन का सबसे बड़ा उपहार था । उस उम्र की बचकानी समझ में हर फूल सिर्फ़ फूल था सुंदर ,पवित्र , सुकोमल जिसके सामीप्य से हृदय आह्लादित होता है । इसी निश्छल प्रेम से वशीभूत मैं रोज़ सबकी नज़र बचा कर कचरे का ढेर लांघकर अपने कल्प वृक्ष तक पहुँचती प्रकृति के उपहार उन गुलदस्तों को फ़्रॉक की जेबों में सहेजती , उसके जामुनी फलों और पत्तियों को दीवार  पर घिस घिसकर फ़्रेसको पेंटिंग करती और एक अनोखी गंध ख़ुद में समेटे घास - पात से सुसज्जित होकर कर घर पहुँचने पर घर वालों से अपना पूजन करवाती । घर बदलने तक यह सिलसिला चलता रहा ।

मेरे लिए एक पुष्प हर्ष , उल्लास , प्रेम , विषाद , श्रृंगार सभी भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम है ।पुष्प जीवन एवं मानवीय संवेदनाओं का प्रतीक है । ईश्वर के चरणों में पुष्पांजलि समर्पित कर प्रतीकात्मक रूप में हम स्वयं के समर्पण के भाव के साथ नतमस्तक होते हैं । देवार्चित होने का सौभाग्य सभी फूलों को नही मिलता मेरा प्रिय भी उन्ही में से एक है ये बात मेरे मन को कचोटती थी ,हालाँकि उसकी दुष्टता का तब मुझे अंदाज़ा नही था ।मैं कल्पना भी नही कर सकती थी कि ऐसे सुंदर भोले चेहरे के पीछे एक ख़तरनाक शैतान छिपा है ।

लैंटाना कमारा “ ( Lantana camara ) यही नाम है उस जंगली का , प्रवासी है ,पता नही तमाम बंदिशों के बावजूद कैसे सबकी नज़र बचाकर कुछ सजावटी फूलों के पौधों के साथ लुकते-छिपते ब्राज़ील से भारत पहुँच गया । रहने को कोई ठिकाना नही मिला किसानों ने , मालियों ने हर किसी ने इसे दुत्कारा लेकिन इस जीवट ने जंगल , खेत ,सड़क ,जहाँ जगह मिली इसने मज़बूती से अपने पाँव जमाए और कुछ इस तरह अपना आधिपत्य जमाया कि अपने आसपास किसी और  पेड़ -पौधे को पनपने ही नही दिया ।इस काम के लिए इसने तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जिस ज़मीन पर खड़ा होता वहाँ ऐसा विष छोड़ता कि उसके प्रभाव से उस ज़मीन में कोई और बीज अंकुरित ही ना हो सके । इसके शरीर की तीखी गंध की वजह से कोई कीड़े -कुरकुट -मच्छर इसके पास नही फटकते । शरीर पर काँटों के कारण मवेशी इसे अपना आहार नही  बना सकते और यदि किसी ने इसकी हरियाली देखकर साहस भी किया तो इसके विष से उसका अंत निश्चित ही है ।  ये ढीठ इतना  है कि मौसम का कोई तेवर इसे डरा नही सकता । कड़ी धूप , बरसात , ठंड हर  मौसम को धता बता हमेशा  खिलखिलाता रहता है । अपने रंग बिरंगे फूलों और  जामुनी रंग के बेरी जैसे फलों से यह भोले पंछियों को आकर्षित करता है और वे इसके झाँसे में आ कर इसके फलों  और बीजों को दूर-दूर तक पहुँचा देते हैं। ये जहाँ पहुँचता है वहाँ अतिक्रमण करना शुरू कर देता है । इसकी असुरी प्रवृत्ति से सिर्फ़ दूसरे पेड़-पौधे ही त्रस्त नही हैं बल्कि बाघ और हिरण की प्रजाति के अस्तित्व पर भी इसके कारण संकट में है । इस आततायी के आक्रांत का असर ये है कि हिमाचल प्रदेश के संसाधनों का एक हिस्सा इस दुष्ट लैंटाना से छुटकारा पाने की कोशिश में जाया हो रहा है । राजस्थान के उदयपुर में सज्जन सिंह अभयारण्य में लोगों ने बाघ और हिरण की इससे रक्षा के लिए इसके उन्मूलन का बीड़ा उठाया है ।

लैंटाना वरबीनेसी कुल का पौधा है ।इस कुल की प्रसिद्धि सुंदर फूलों और ख़ुशबूदार पौधों के लिए है । जब मुझे राई मुनिया, पँचफुली , जंगल सेज  (Jungle sage ) पूटुस , कुरी  जैसे सुन्दर नामधारी अवगुणी की काली करतूतों का पता चला तो बहुत शर्मिंदगी हुई ।मेरे मन ने इस कुलघाती को अपना स्नेहभाजन बनाने के लिए मुझे धिक्कारा ,लानतें भेजी ,मेरे दिमाग़ को भी अच्छे बुरे की पहचान ना कर पाने , विवेकहीन हो इस सत्यानाशी के सौंदर्य जाल में फँसने से पूर्व आगाह नही करने के लिए बहुत लताड़ लगायी । अपने बचाव में मेरे पास कम उम्र , कम तजुर्बा , नासमझी जैसी कमजोर दलीलें थीं जिन्हें  मेरे मन ने लैंटाना से भी ज़्यादा बुरी तरह से ठुकरा दिया ।

 वनस्पति शास्त्र की पढ़ाई के दौरान वरबीनेसी कुल के  पौधों की व्यावसायिक उपयोगिता  के अध्ययन से जानकारी हुई कि सभी का कोपभाजन यह लैंटाना तितलियों का दुलारा है ,तितलियों के ब्रीडिंग सेंटर लैंटाना के सहयोग से ही चलाए जाते हैं ।इसका विष कीटनाशक , मच्छरनाशक है और इससे मिलने वाले essential oils से कई औषधियाँ बनाई जाती हैं । लैंटाना से भले ही आँगन ना सजाया जाता हो लेकिन इसकी टहनियों से बने बेंत के फ़र्नीचर ड्रॉइंग रूम की साज-सज्जा के लिए अपरिहार्य हैं ।हाइब्रिड तकनीक से इस जंगली का डीटाक्स के बाद रीहैब कर लाल, पीले , गुलाबी , सफ़ेद , जामुनी , सिंदूरी फूलों वाले कितने ही नए स्वरूप तैयार किए गए जो अब बगीचों की शोभा हैं । शहरों की सड़कों और चौक चौराहों की लैंड स्क़ेपिंग इसके बिना अधूरी है । इन खूबियों का पता चलते ही मेरा  लैंटाना प्रेम फिर जोर मारने लगा और एक बहुरूपिये के मोहजाल में फँस जाने के अपराधबोध को परे धकेलते हुए मैंने अपने दिल को समझाया कि ऐसे भी नादान नही थे हम... :)

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