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विषमराग से उत्तरराग के बीच

 

पिछले साल की बात है, मैं यमुना पार जाने वाली मैट्रो में खड़ी थी, ‘गजपुराण’ कहानी के बदलते परिवेश को चीन्हते हुए, मस्तान, नूरा और पुत्तु को खोजते सी मेरी आँखे ...और मेरे कानों में ‘कहानी’ को लेकर उनकी संतुलित राय ‘आस – पास गौर से देखो तो पात्रों की कमी नहीं होती, पात्र प्रतीक्षा नहीं करते हैं...कि कोई कहानीकार आकर उन पर कहानी लिखे.’ और कहानी में शब्दों की मितव्ययता पर उनके सघन वाक्य घूम रहे थे. चेखव का मानना था कि अगर किसी नाटक के प्रथम दृश्य में दीवार पर बंदूक लटकी है, तो उसे नाटक में कहीं चलना ही होता है, ऎसे ही शब्द होते हैं....

वे बिलकुल वैसे ही कहानीकार थे, जिसके आदर्शों और जीवन शैली और कथा संसार में फाँक नहीं थी. उनकी कहानियों में बदलते समय में, मरते लोक – परिवेश, बढ़ते महानगरों में पिसते माईग्रेट होकर आए लोक – समाज के सर्वहारा, विकास की दौड़ में नंगे पैर भागते पिछड़ने से डरते मनुष्य व्यापकता में होकर भी एक नायक/नायिका के तौर पर मौजूद रहे हैं.  

मेरी उनसे पहली मुलाक़ात बिलकुल अप्रत्याशित तौर पर हुई थी. मैं संगमन पिथौरागढ़ के जरिये हिन्दी कथा -साहित्य के क्षैत्र में नवागंतुक के तौर पर शामिल हुई थी, समकालीन कथा साहित्य के दिग्गजों से, संपादक, आलोचकों से मेरा परिचय नगण्य था, नाम परिचित थे, गोकि किताबों से खूब परिचय था. साक्षात देखने – सुनने का अवसर कभी आया ही नहीं था.

काठगोदाम से पिथौरागढ़ जाते समय, हम लोग सामूहिक तौर पर बस में जा रहे थे. ऊँचाई की यात्रा हमेशा मुझे अस्वस्थ कर देती है, इसलिए जब बस लंच के लिए रुकी तो मेरा कुछ खाने का मन न था, मैं बाहर अहाते में लगी एक अलग टेबल पर बैठ कर बस सलाद खा रही थी, एक और व्यक्ति अपनी धीर – गंभीरता और आभामण्डल लिए मेरी टेबल पर आ बैठा. सौजन्यता पूर्वक सिगरेट की अनुमति लेना चाही, तो मैंने बताया कि मैं अस्थमैटिक हूँ, मैं किसी और टेबल पर बैठ जाती हूँ. तो उन्होंने सिगरेट का जानबूझ कर किया गया आधा टुकड़ा भी फेंक दिया. मुझे होमियोपैथी की कुछ दवाएँ नोट करवाईं. ये अरुण प्रकाश जी थे. अरुण जी शायद किसी अन्य ट्रेन से आए थे, और गिरिराज किशोर जी के साथ कार में आ रहे थे इसलिए काठगोदाम स्टेशन पर परिचय हुआ ही नहीं था.

अपने संकोच से उबर कर हम परिचय आदान – प्रदान करते तभी एक महत्वाकांक्षी शख्सियत आ बैठी, जो मुझसे सीनीयर थी लेखन में, शायद एक दो कहानियाँ लिख चुकी थी, उपन्यास लिख रही थीं, ओह आप हैं अरुण जी, समकालीन के सम्पादक..सर, सर मैं हिन्दी लेखन में कैरियर बनाना चाहती हूँ. कैसे, क्या करूँ?

‘क्यों नहीं, ज़रूर बनाईए हिन्दी लेखन में कैरियर, उसके लिए ‘अच्छा लिखना’ कतई शर्त नहीं.’

उन्होंने यह ‘सटल, विटी’ उत्तर दिया और उठ गए. मैं हँसी रोकती रह गई. फिर ‘हिन्दी लेखन एक कैरियर ऑप्शन’ पिथौरागढ़ के दौरान एक चुटकुला और एक संवाद सेतु बना. तब तक मैंने ‘बिगड़ैल बच्चे’ कहानी के अलावा कुछ नहीं लिखा था, फणीश्वर नाथ रेणु हमारी साझी पसन्द थे, वे खूब किस्से, उद्धरण सुनाते रहे थे. मन ही मन कोई मुझे ‘कनविंस’ कर रहा था कि प्रेमचंद की परम्परा से इतर और जैनेन्द्र मनोजगत की प्रेरणा से परे किसी तीसरी ही वास्तविक परम्परा का भी प्रशंसक हुआ जा सकता है .  हमने ‘मैला आँचल’, ‘मारे गए गुलफाम’, ‘ठुमरी’...रेणु जी की अनेक रचनाओं पर बातें की.

‘लाखों के बोल सहे’, ‘कोंपल – कथा’, के बाद उन्हीं दिनों ‘विषमराग’ सम्पूर्ण कथा - संकलन के रूप में आ चुका था और बहुत लोकप्रिय हुआ था, ‘जल प्रांतर’ मेरी सर्वप्रिय कहानियों में से एक, जिन्हें सौ बार पढ़ कर भी एक सौ एकवीं बार पढ़ कर नया कुछ निकाला जा सकता है, ना, कोई विमर्श नहीं. अरुण प्रकाश जी विमर्शों की बात से खीजते – ऊबते थे. विमर्श खोजने वाले को सीधे कहते क्या मूर्खता है.

उन्होंने विमर्शों से परे, उन विषयों को कहानियों में उठाया जो जाति, भाषा, वर्ग और प्रथा – परम्परा, फैशन से किसी भी पीड़ित या सर्वहारा की आवाज़ बनते. ऎसा न होता तो, विमर्श – वाद के इस अटपटे समय में
‘जल प्रांतर’ कहानी क्लासिक हिन्दी कहानी का दर्ज़ा न पाती. वे बहुत कलात्मक तटस्थता के साथ, यथार्थ लिखते.

सुश्री एक्का रो रही हैं.
सहज विश्वास जंगल की सघनता में ही पनपता है. पत्तियाँ हिलती हैं, हवा के संग कलाबाज़ी करती हैं – ऊपर नीचे. ! पत्तियाँ हँसती हैं. तालियाँ बजाती हैं. आदिवासी मन इन दृश्यावलियों में सहज विश्वास से रम जाता है. खुले शहर में आते ही आशंका का मच्छड़ में भिनभिनाने लगे तो महुआ का मासूम पत्ता भी चाकू नज़र आने लगता है.
( कहानी ‘बेला एक्का लौट रही हैं’ से )

‘बेला एक्का’ कहानी खूब प्रसिद्ध हुई, भैया एक्सप्रेस के कई – कई अनुवाद हुए. मधुबनी अपहरण विवाह प्रथा पर उन्होंने एक नॉवेला लिखा था ‘ कोंपल – कथा’.  उस पर खूब चर्चा हुई, ‘समकालीन हिन्दी साहित्य’ में संपादक का प्रभार संभाला उन्होंने, मगर मैंने अरुण प्रकाश जी को वही पाया. ज़हीन, सादादिल, सदा पुस्तकों में गुम, इंटरनेट के उस शुरुआती दौर में उन्होंने बिलकुल उत्साही युवाओं की तरह इंटनेट की संभावनाओं को एक्सप्लोर किया, अपना सारा लेखन वे इंटरनेट पर करते थे,

मुझे हैरानी होती थी कि दिल्ली के एकाध एलीट उन्हें कैसे ‘रस्टिक’ लिख जाते थे, अपने लेख में, वे रस्टिक नहीं, बहुत ‘सोफेस्टिकेटेड’ थे. ‘सोफेस्टिकेशन’ के लिए महानगर में रहना – न रहना मायने नहीं रखता. वह या तो होता है या नहीं होता. मैं उन कुछ लोगों में से हूँ, जो धैर्य से किस्से सुनते हैं, अरुण जी से उनके संस्मरण सुनना ‘सुपर – धैर्य’ की माँग करता था, पहली बात तो उनके ‘फैमिलियरटी ज़ोन’ का प्रवेश पत्र हो आपके पास, फिर चढ़ती साँस के साथ....बहुत धीमे स्वर में एक एक वाक्य के बोलने से लेकर बीच में आधी सिगरेट को सुलगाने का ब्रेक लेते हुए अरुण जी को बिना बाधा डाले सुनना. रोचकता मुझे बाँधे रखती.

उनके सुनाए गए किस्सों में नॉर्थ कैम्पस में सांसद निवास के बाहर की ‘वी आई पी’ सड़कों पर स्कूल के दिनों में साईकिल चलाना भी शामिल था, क्योंकि उनके पिता तब राज्यसभा के सदस्य बने थे, उनकी समाजवादी पृष्ठ भूमि रही थी । अरुण जी के पिता भी पुत्र की भाँति बेहद ईमानदार और मूल्यों के वाहक रहे होंगे, सो उनके राज्यसभा सदस्य, सांसद होने का उनके परिवार ने लाभ तो कभी नहीं उठाया, बल्कि उन्हें सदा खोने और एकाएक अर्श से फर्श पर आ जाने की हानि ज़रूर उठाई. अरुण जी जैसे एक दुर्लभ रचनाकार के जीवन का प्रसाद उसके जीवन के संघर्ष और उत्थान – पतन ही होते हैं जो उसकी रचनात्मकता को ‘रेंज’ देते हैं. एक भ्रष्ट राजनैतिक नेता का पुत्र होकर कोई ‘अरुण प्रकाश’ कैसे हो सकता था?  फिर जीवन को वह रैंज कैसे मिलती? फिर यह रैंज उनसे ‘कोंपल – कथा’ ‘मैंने लाखों के बोल सहे’ कैसे न लिखवाती?

मुझे भी सुनाया था उन्होंने अज्ञेय वाला वो किस्सा. उसे सुनाते हुए अरुण जी उत्साहित थे और मैं हतप्रभ. मैं बहस कर नहीं सकती थी, बहुत कनिष्ठ थी, मगर मन सवाल उठाता था, वाह रे एलीटिज़्म ‘अज्ञेय ने इला जी को रोक दिया टिप देने से कि युवक अरुण प्रकाश के अहम को ठेस न पहुँचे, क्योंकि व्रे उनके पिता के परिचित थे’ अज्ञेय कुछ और भी तो कर सकते थे...मसलन फोन नम्बर देते कि...फोन करके. आकर मिलो कभी. क्या पता किया हो, और युवक अरुण प्रकाश अपना आत्मसम्मान लिए ख़ामोश संघर्ष करता रहा हो.....शायद यही हुआ होगा, क्योंकि जल्दी ही लोधी होटल प्रकरण समाप्त हो गया था.

उस दिन उनकी शोक सभा में जब उनकी शिक्षा का ज़िक्र हुआ तो, उनके एम. बी. ए. होने का ज़िक्र किया गया, पता नहीं कितने लोग जानते हैं कि यह एम. बी. ए. खेल खेल में....बल्कि चुट्कियों में. 2004 में गुरुजम्भेश्वर युनिवर्सिटी से किया गया था, हिसार या रोहतक से, बिस्तर पकड़ने के बस दो – तीन साल पहले, समकालीन के सम्पादक होते हुए भी अरुण जी के भीतर एक खूब ब्रिलिएंट, उत्साही युवक ही रहता रहा ताउम्र,..जो सब कुछ पढ़ लेना, जान लेना, जी लेना चाहता था. कोई असमर्थता उन्हें किसी चुनौती से रोक नहीं सकी. अपने फेंफड़ों का ऑक्सीजन होल्ड करने का कुछ कम सामर्थ्य भी उन्हें पहाड़ी स्थानों में होने वाले सेमिनार्स में जाने से नहीं रोक पाता था, बस विषय मजबूत हो और आपके आग्रह में सहज स्नेह और सम्मान हो तो वे ज़रूर जाते थे. वे प्रखर वक्ता थे. जब वे बोलते किसी भी विषय पर तो नपा – तुला बोलते और अपने स्पष्ट दृष्टिकोण के साथ बोलते. हिन्दीजगत में इस वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाला आलोचक मैंने नहीं देखा. वे बहुत संतुलित और विधा की सशक्तता और उसके मूल तत्वों को तवज्जोह देने वाले आलोचक थे, हिन्दी जगत में हर आलोचक/ समीक्षक/ स्कॉलर किसी न किसी विचारधारा से प्रभावित या उसकी तरफ झुका मिला, केवल अरुण जी थे जिन्होंने हर साहित्यिक विधा को उसकी तात्त्विकता के साथ विश्लेषित किया. अगर वे और लिख पाते तो हमारा समीक्षा का पलड़ा थोड़ा भारी होता...


मगर इस जीवट उत्साह को नज़र लग गई, वे किसी कार्यक्रम से कहीं से लौट रहे थे, कि रास्ते ही में बीमार हो गए, ट्रेन से उतार कर उन्हें बीच में भोपाल में एडमिट करना पड़ा.

मुझे याद है, जब मैं और अरुण जी निरंतर संवादरत थे, तब वे साहित्य की समस्त विधाओं पर आलेख तो लिख ही रहे थे, कुछ छपे भी बल्कि एक पुस्तक श्रृंखला की बात किया करते थे कि मैं इन विधाओं पर एक एक किताब लिख रहा हूँ, कहानी से लेकर कविता, संस्मरण, रिपोर्ताज, निबन्ध, ललित निबन्ध, डायरी साहित्य की तमाम विधाओं पर तात्विक विश्लेषण और पाश्चात्य तुलनात्मकता के साथ, उन्होंने बहुत कुछ लिखा और सीधे कम्प्यूटर पर लिखा. मुझे नहीं पता था कि उन्होंने उसे हार्डकॉपी की तरह कभी सेव नहीं किया...और भोपाल वाला अटैक हुआ. पता नहीं तब वे रिटायर हो गए थे या होने वाले थे समकालीन के सम्पादक के पद से....मगर उनका बहुत सा लिखा साहित्य अकादमी की पत्रिका ‘भारतीय समकालीन साहित्य’ के सम्पादक की डेस्क पर रखे कम्प्यूटर की हार्डडिस्क में दफन हो गया.
‘एक पॉलिटिकल उपन्यास लिखना चाहता हूँ, शीर्षक होगा, ‘उत्तर – राग’

भोपाल से लौट कर वे ज़्यादातर बेटे के पास रहे या अस्पताल में, उनकी अस्वस्थता के कारण सम्वाद - सेतु टूटने लगा. वे कभी – कभी फोन करते, किसी किताब या कहानी के आने पर...तारीफ नहीं विश्लेषण करते. ‘कठपुतलियाँ’, कुरजां कहानियाँ उनकी प्रिय कहानियाँ थीं, मेरे पूरे तब तक के लेखन में. फिर धीरे धीरे यह सूत्र भी छूट गया. साल दर साल बीते और एक दिन दिल्ली ट्रांसफर हो गया. यहाँ आते ही मुझे पता चला कि वे काफी बीमार हैं...मैंने उन्हें फोन किया और मिलने की इच्छा ज़ाहिर की, उन्होंने कहा ‘आ जाओ, किसी दिन फोन पर तय करके. मुझे अकसर अस्पताल जाना होता है. अभी कल ही लौटा हूँ, मेरा वज़न 38 किलो रह गया है और अब से एक क्विंटल का ऑक्सीजन का एक इंस्ट्रूमेंट साथ ढोना पड़ेगा. हर समय. ’ अरुण जी बताते और मेरी कल्पना कुन्द पड़ जाती. एक अच्छी लम्बाई वाला मनुष्य 38 किलो का कैसे हो सकता है? उस पर 100 किलो का ऑक्सीजन – उपकरण, हर पल ढोना !!   

मैंने बात बदली, आपके पॉलिटिकल उपन्यास का क्या हुआ? और यह याद दिलाया कि उन तमाम साहित्यिक विधाओं पर तात्विक विश्लेषण वाली किताबों की पाण्डुलिपियों का क्या हुआ? तो उनका धीमा सा उत्तर मिला था, कुछ के प्रिंट आउट लिए थे....वे भी घर की शिफ्टिंग में खो गए...कुछ वहीं दफ्तर में, अब तो कम्प्यूटर ही डिस्कार्ड हो गए होंगे....जाने दो, क्या करना है...अब तो शरीर क्या दवाओं के असर में दिमाग़ भी नहीं करता....

फिर जब उस दिन मैं और पल्लव गए उनसे मिलने समय लेकर, रास्ते में मेरी और पल्लव की भी बात हुई थी उनकी ‘मिसिंग’ पाण्डुलिपियों को लेकर ......पहुँच कर हमने उनसे आग्रह किया कि वे पांडुलिपियाँ फिर खोजी जाएँ. जो खो गई हैं, या जो हार्ड कॉपी की तरह उपलब्ध हैं. या जो कम्प्यूटर में रह गईं उन्हें साहित्य अकादमी में खोजा जाए. पर उन्होंने बताया कि पता करवाया था, पर वहाँ के कम्प्यूटर बदल चुके थे.  तब हमने कहा कि उन खोए अध्यायों को न सही कम्प्यूटर की हार्ड डिस्क से बल्कि स्मृति के आधार पर मस्तिष्क की हार्ड डिस्क से निकाला जाए, आप बोलें मैं और पल्लव उन दुर्लभ चीज़ों के लिए आपके स्टेनो ग्राफर भी बनेंगे...बारी – बारी. पर तब वे टाल गए. मुझे पता था कि वे एक पॉलिटिकल नॉवल लिखना चाहते थे. हमने उन्हें उसके लिए भी उत्साहित किया. तब उन्होंने कहा कि - देखो नॉवल का तो पता नहीं मोहलत मिले या न मिले.... लेकिन विभिन्न विधाओं पर लिखी गई सामग्री दिखवाता हूँ, कुछ प्रिंट आउट या नोट्स सामान में मिल जाएँ.

कुछ याद करके डिक्टेट करवा लूँगा...(भगवान का शुक्र है कि उनकी स्मरण शक्ति बहुत अच्छी निकली.)

वीना जी मुझसे और पल्लव से मिलकर बहुत खुश हुईं, उन्होंने एक सुघड़ मेज़बान की तरह उत्साह दिखाया... उस दिन मैं वीना जी से पहली बार मिली थी, वे अरुण जी भी से ज़्यादा उत्साहित थीं. उन्हें बहुत अच्छा लगता था कि साहित्य – जगत से कोई आए, क्योंकि साहित्य से जुड़े मित्रों से मिलना अरुण जी को स्वस्थ व प्रसन्न रखता होगा. तभी तो लिफ्ट में विदा लेते – देते उन्होंने भीगी आँखों से कहा, आते रहना तुम दोनों, ये खुश होते हैं. लेकिन  दिल्ली की दूरियों, तनावों और व्यस्तताओं ने ऎसा जकड़ा कि फिर मैं कभी जा ही न सकी..... एक बार अरुण जी का फोन आया ‘ मनीषा, उनमें से 2 किताबें डिक्टेट हो गईं उन्हें गौरीनाथ को दे भी दिया. जल्दी ही आजाएँगी. पुस्तक मेले तक. ‘ मैं परिचित् थी उनके लेखन के प्रति एक वैज्ञानिक की तरह के अनुशासन और लक्ष्य निर्धारण से!

पिछले कुछ समय से मैं अपनी माँ को कैंसर से जूझते हुए देख रही थी और हर सप्ताहांत जयपुर दौड़ जाती थी. उन्हीं दिनों की अन्यमनस्क व्यस्तता में फेसबुक पर गौरीनाथ का सन्देश देखा था कि ‘कथाकार अरुण प्रकाश पटेल चेस्ट हॉस्पिटल में एडमिट हैं. मैं उसी शाम मिलने जाना चाहती थी, पर जा न सकी उस शाम अंशु को दफ्तर से आने में देर हो गई और अगले दिन माँ के आई सी यू में एडमिट करने की खबर आ गई. मैं जयपुर चली गई. 20 – 22 दिन बाद लौटी तो फेसबुक पर अरुण जी के अंतिम इंटरव्यू का लिंक था, अंतिम...क्यों भाई? तब सत्यानन्द निरुपम का सन्देश मिला...और ऎसे में हम वक्त, व्यस्तता और आत्मकेन्द्रित जीवन को गरियाने और ग़्लानि महसूस करने के सिवा क्या कर सकते थे....एक घने पश्चाताप के साथ वही किया!

 

फिर भी पीछे मुड़ कर देखूँ तो एक संतोष पाती हूँ कि मेरे अलावा बहुत बहुत स्वर रहे होंगे, आलोचना पर उनकी किताबों को लिखवाने के पीछे, हम तो ‘लिप सर्विस’ करके रह गए, जिसने डिक्टेशन लिया होगा, उसका श्रेय रहा होगा...गौरीनाथ के अथक प्रयास रहे होंगे. फिर भी एक छोटा सा आग्रह मेरा और पल्लव का भी था कि  ..उन्होंने फिर से जीजिविषा, ऊर्जा, स्मृति और उस स्पष्ट साहित्यिक समझ को एक – डेढ़ साल को ही सही, फिर से सहेजा और बटोरा तो होगा ही.

अरुण जी चाहते थे, मैं कहानी लेखन को गंभीरता से लूँ...एक बार संवाद विहीन, उनकी अस्वस्थता के शुरुआती दिनों में मुझे एक पार्सल मिला था, हिन्दी कहानी पर लिखी गईं, लोकभारती से छपी कुछ दिग्गज आलोचकों की महत्वपूर्ण पुस्तकों का...इसे अरुण जी ने भेजा था. मेरे भीतर का कहानीकार उनके प्रति कृतज्ञता महसूस करता है...उस एक दुर्लभ कथाकार के प्रति जो लम्बी कहानी ऎसे साधता था जैसे कि कोई अनुभवी दर्ज़ी कम – ज़्यादा कपड़े में भी ग़जब की फिट शेरवानी सिल दे. कसी हुई, सधी हुई, रोचक और पूरी कहानी...लिखना, हर एक के बस की नहीं.

नवलेखन लहर के प्रति उनका भी नज़रिया अन्य सभी गंभीर साहित्यकारों की तरह था, ‘लम्बी रेस का घोड़ा भीड़ के साथ रेस नहीं लगाता मनीषा. कम शब्दों वाला वह शख़्स जब यह कहता था तो कई – कई अर्थ व्यंजित होते थे...वे गज़ब के वक्ता. वक्तव्य भी सधा हुआ. टू द पॉईंट. कुछ भी न यहाँ की न वहाँ की.

साहित्य अकादमी के माहौल में उनका ‘संतुलित’ व्यवहार, कर्मठता....और जीवन जीने का एक अन्दाज़....हर हाल में शालीन ड्रेसिंग़. वे कहा भी करते थे, लेखक हैं तो किसने कहा है कि ‘मुचड़े हुए कपड़े पहने जाएँ? झोला लटकाया जाए.’ वैसे वे धरती के रंग ही पहना करते थे...जंगल ग्रीन, ब्राउन...ग्रे.  

अपनी पीड़ाएँ, अभाव छिपाना उन्हें सिखाया नहीं गया, इस सन्दर्भ में अभिमन्यु थे वे. अपने अच्छे – बुरे – बहुत अच्छे दिनों में भी सामूहिक भलाई की सोचते, आत्मकेन्दितता उनमें से सिरे से गायब थी. यह शायद इस ‘क्लेन’ का जीनोटायप है, मैं उनके बेटे मनु प्रकाश से कभी नहीं मिली, लेकिन एक पिता के उद्गार सदा सुनती थी, ‘बहुत करता है मेरे लिए...मैं बहुत भाग्यशाली पिता हूँ.’ वे बहुत प्रसन्न रहते, जब बेटे के पास जाते, पोती के तुतलाते शब्द निहाल कर देते.  कभी – कभी वे बताते थे कि मेरे लंग्स की कैपेसिटी 30% रह गई है, उस बात को 6 साल हो गए...कितना इलाज़ चला, वे अपनी जीजिविषा के सहारे चलते रहे, बेटा भी तत्पर...एक ओर सफल प्रोफेशनल, दूसरी ओर श्रवण कुमार के लिए भी मिसाल...हर बार सामर्थ्य और समय लिए पिता के साथ.

अरुण प्रकाश जी शोक – सभा में पहुँचना, मेरे लिए अविश्वास – भ्रम जैसी मानसिकता में पहुँचना था. पखवाड़े भर माँ के बाहरवें के बाद उसी दिन लौटी थी, कि यह खबर मिली थी. वीना जी की शोक – संतप्त स्थिति ने विचलित कर दिया, अरुण जी के बेटे मनु प्रकाश से मिलना पहली बार हुआ था. मैं उससे बस यही कह सकी ‘अरुण जी को बहुत नाज़ था तुम पर. बहुत तारीफ करते थे.’ पीड़ा में भी वह हँसा, उसकी हँसी में अरुण जी की प्रतिच्छवि कौंध गई.  

मेरे मस्तिष्क में उनके अनूठे कथा शीर्षक कौंधने लगे – कोंपल कथा....नाव में अकेले....स्वप्न घर,.... शेष....विषम राग....फिर मिलेंगे....आखिरी रात का दुख....एक ज़िन्दगी स्थगित...शांति पाठ......और
उत्तर राग !!!

 

मनीषा कुलश्रेष्ठ


 

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