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बाल्‍ज़ाक का एक रोज़ और कार्य शैली

 ·        स्‍टीफन स्‍वाइग

                                                         (अनुवाद: ओमा शर्मा)

  

शाम के आठ बजें हैं। पेरिस के बाशिन्‍दों ने अपना काम-काज कब का निबटा लिया है और दफ्तरों, दुकानों और फैक्ट्रियों से लौट आए हैं। रात का खाना खाने के बाद ये लोग अपने परिजनों, मित्रों या अकेले-अकेले ही मौज-मस्‍ती करने सड़कों पर जमघट लगाएंगे। कुछ लोग चौपाटी पर टहलेंगे तो कुछ कैफे में बैठे होगें। कुछ लोग सिनेमा या थिएटर देखने के लिए बन-संवर रहे होंगे। अकेला बाल्‍ज़ाक है जो अपने अंधेरे कमरे में सोया पड़ा है... अपनी मेज पर अदद सोलह-सत्रह घंटे काम करने के बाद उसे दुनिया की कोई खैर-खबर नहीं है।

 

      रात के नौ बजे हैं। नाट्य प्रस्‍तुतियाँ शुरू हो चुकी हैं। नाचखाने में थिरकते युगलों का रेला है। जुआघर में सोने के सिक्‍के टनटना रहे हैं। पिछवाड़े की गलियों में नज़र-चोर प्रेमियों के कसाव बढ़ रहे हैं। मगर बाल्‍ज़ाक की नींद जारी है।

 

      दस बजे हैं। इक्‍का-दुक्‍का घरों की बत्तियाँ बुझने लगी हैं।बुढ़उ लोग सोने की तैयारी में हैं। सड़क पर खट-खट करते इक्‍के-ताँगे अब इक्‍के-दुक्‍के ही रह गये हैं। शहर का शोर ढल रहा है मगर बाल्‍ज़ाक सो रहा है।

 

      ग्‍यारह बजे। थिएटरों में परदे गिर रहे हैं। पार्टियों या कहीं और मौज-मजा करने के बाद लोग घर लौट रहे हैं। रेस्‍त्राओं की रोशनियाँ मद्धम हो रही हैं, सड़कें वीरान हो रही हैं, मौज-मस्‍ती की आखिरी किस्‍त खींचने लोग चौपाटी से निकल पिछवाड़े की गलियों में कूच कर रहे हैं। मगर बाल्‍ज़ाक अभी भी सो रहा है।

 

      अर्धरात्रि ! पेरिस सुनसान है। लाखों निगाहें मुंद चुकी हैं। ज्‍यादातर रोशनियाँ बुझ चुकी हैं। दूसरे आराम फ़रमा रहे हैं इसलिए बाल्‍जा़क के उठने का वक्‍त हो रहा है। वे लोग अब सपनों में टहलने लगे हैं तो बाल्‍ज़ाक के उठने का वक्‍त हो रहा है। बाकियों का दिन ढल रहा है पर बाल्‍ज़ाक का अब निकलने को है। अब न कोई उसे तंग करेगा और न कोई मिलने-जुलने आ सकेगा। न कोई परेशान करती चिट्ठी और न अब किसी लेनदार की दस्‍तक। पांडुलिपि की अगली किस्‍त या जांच लिए प्रूफों के लिए पाँव पटकते मुद्रक का कारिन्‍दा भी नहीं। ढेर सारा वक्‍त है। आठ-दस घन्‍टे का सम्‍पूर्ण एकान्‍त है उसके पास जिसे वह अपने विशाल उद्यम में लगा सकेगा। उस भट्टी भी आग ठन्‍डी नहीं होनी चाहिए जो भुरभुरी धातुओं को गलाकर कड़क इस्‍पात में बदल देती है...इसलिए नजर के ताप में कोताही नहीं आने देनी है:

‘‘पेशानी से मेरे विचार यूं टपकें जैसे झरने से पानी। यह प्रक्रिया पूरी तरह खुद-ब-खुद होती है।’’

उसके काम ने उसे बस एक ही फतवा दे रखा है:

‘‘बाहर निकलकर मेरे लिए काम करना असम्‍भव है। मेरे से लगातार सिर्फ़ एक-दो घन्‍टे काम नहीं होता है।’’

 

      वह निरन्‍तरता तो रात की घड़ी में ही मुमकिन हो पाती है जब उसके हवाले अपना पूरा और बेहिसाब वक्‍त होता है। काम की निरन्‍तरता पाने के लिए उसने वक्‍त की सुई उल्‍टी चला दी है जिससे उसकी रात दिन में बदल गयी है।

 

      दरवाजे पर नौकर की थपकी ने बाल्ज़ाक को जगाया। वह उठता है और अपना झिलंगा चढ़ा लेता है। बरसों काम के तजुर्बे के बाद यही लिबास उसे मुफ़ीद लगता है, सर्दियों में हो गयी काश्‍मीरी शाल और गर्मियों में रहा पतला झिलंगा... दूधिया और लम्‍बा जिससे डोलने-फिरने में सहूलियत रहे, गर्दन के पास से यह खुला रहता है ताकि बिना कसाव के गर्माहट बनी रहे। इस झिलंगे के चयन के पीछे हो सकता है यह सोच रही हो कि यह किसी महात्मा के परिधान से मिलता-जुलता है और जो अवचेतन में उसे याद दिलाता रहता हो कि उसे वृहत्‍तर विधान के सुपुर्द रहना है, इसे पहनकर वह बाहरी दुनिया और उसके लोभ-लालचों से संत्याग रखेगा। उसके मठनुमा परिधान के गिर्द एक ढीली-सी रस्‍सी बंधी होती (बाद में उसकी जगह सोने की जंजीर आ गयी) जिसके ऊपरले हिस्‍से में कागज़ काटने वाला चाकू और कैंची लटके होते। कमरे में ही एक-दो कदम घूम-फिरकर वह रगों के रक्‍त-प्रवाह को त्‍वरित करता है ताकि खुमारी का आखिरी अंश दफा हो जाये। अब बाल्‍जा़क तैयार है।

 

      मेज़ पर रखे रजत मोमदान पर नौकर ने छह मोमबत्तियां जला दी हैं और कमरे के परदे कसकर खींच दिए हैं... मानो बाहर की दुनिया से अब कोई ताल्‍लुक नहीं रखना है। काम करना है तो सितारों या सूरज की क्‍या परवाह। सुबह हो जाये और पेरिस नए दिन का आगाज़ कर रहा हो मगर उसे इसकी क्‍या फिक्र। दीवालों के साथ रखी किताबें, दीवालें, दरवाजे, खिड़कियां और उनके पार दिखता अनन्‍त यानी उसके सामने रखी सभी भौतिक चीजें परिछाइयाँ भर रह गयी हैं। कहने-करने के लिहाज से अब वही होगा जो उसके ज़ेहन की सर्जना चाहेगी। वह एक अलग ही दुनिया के सृजन में लगा है, एक ऐसी दुनिया जो टिकी रहने वाली थी।

 

      वह अपनी मेज़ पर आता है जिसके बारे में उसकी यह राय है: ‘‘इस कुठाली पर मैं अपनी जिन्‍दगी यूं ढालता हूं जैसे कीमियागार अपना सोना ढालता है।’’ यह एक छोटी, नामालूम-सी आयताकार मेज़ है जिसे वह अपनी दूसरी बहुमूल्‍य चीजों से भी ज़्यादा चाहता है। यह उसे फिरोजों से जड़े अपने बेंत से ज्‍यादा प्‍यारी है, उस चांदी के थाल से भी ज्‍यादा अज़ीज़ क्‍योंकि एक से दूसरी जगह बदलते घरों में इसे वह हमेशा अपने साथ रखता। कड़की और बदहाली में भी वह इसे सहेज-बचाकर यूं रखता जैसे कोई फौजी जंग के हुल्‍लड़ में फंसे अपने लाचार साथी को संभालता है। यह उसके सबसे अन्‍दरूनी आनन्‍दों और कटुतम दुखों की हमराज थी... उसकी असल ज़िन्‍दगी की इकलौती खामोश गवाह।

 

      ‘‘इसने मेरी सारी गर्दिश देखी है। मेरे तमाम मंसूबों को जानती है, मेरे विचारों की दूर से टोह ले लेती है... इसके ऊपर रखकर लिखे कागज़ों पर अपनी कलम घसीटते हुए मेरी बांहों ने इस पर जुल्‍मों के वार किए हैं।’’

 

      और सच, कोई दूसरा शख्‍स उसके बारे में इतना नहीं जानता है। उसके संग प्रबल मिलनसारी की इतनी रातें किसी औरत ने भी नहीं बितायीं। यही वह मेज़ थी जिस पर कोल्‍हू के बैल की तरह खटते हुए उसने अपनी जान गंवा दी।

 

      बस, आखिरी बार इधर-उधर नजर फिरायी कि सब चीज ठीक-ठाक तो है ना! हर सच्‍चे कट्टर कार्यकर्ता की तरह अपने तर्जो-तरीके में बाल्‍ज़ाक बड़ा पंडिताऊ है। अपने औज़ारों को वह ऐसे प्‍यार करता है जैसे कोई सैनिक अपने हथियारों को करता है। काम पर जुटने से पहले वह पक्‍का कर लेता है कि सारी ज़रूरी चीज़ें कायदे से तो रखी हैं। उसके बांयी तरफ़ कागज़ों का बण्‍डल होता। कागज़ों का चयन वह बड़े ध्‍यान से करता है। उसके कागज़ एक खास आकार-प्रकार के ही होते हल्‍की नीलिमा-सी लिए जो उसकी आंखों को चुभे-थकाएं नहीं। ये खूब चिकने होते ताकि लिखने में खड़खड़ न हो और उसकी कलम फ़राटे से लिखती जाये। कलम भी वह उतने ही एहतियात से तैयार करता है। इसमें कोई समझौता नहीं। स्‍याहीदान ज़रूर साधारण सा होता। किसी मुरीद द्वारा तोहफ़े में दिया महंगा स्‍याहीदान नहीं, उसे तो साधारण-सा, वही स्‍याहीदान चाहिए जो विद्यार्थी-काल से उसका साथ निभा रहा है। स्‍याहीदान के बगल में उपलभ्‍य के तौर पर स्‍याही क़ी एक-दो बोतल रखी हैं। अपने काम के सुचारू और निर्विघ्‍न प्रवाह की खातिर वह कोई एहतियात बाकी नहीं छोड़ता है। उसके दायीं तरफ़ एक छोटी नोट बुक रखी है जिसमें कभी-कभार वह कोई ऐसी बात या विचार दर्ज़ कर देता है जो बाद के किसी अध्‍याय में काम आ सकती है। और कोई यन्‍त्र वहां नहीं है। किताबें, कागजात और शोध-सामग्री, उसके लिए फिजूल हैं। लिखने बैठने से पहले बाल्‍ज़ाक हर चीज को अपने ज़ेहन में पचा-तपा लेता है।

 

      कुर्सी को पीछे खींचकर उसने कमर सतर की और जामे की आस्‍तीन चढ़ा ली ताकि हाथ खुला-खुला रहे। फिर नीम-मसखरी में अपने को यूं फुसलाया मानो बल्‍ली खींचने को गाड़ीवान अपने घोड़ों को ऐड़ लगा रहा हो। या, उसकी तुलना किसी ऐसे तैराक से की जा सकती है जो एक सटीक गोते से पहले अपनी बाहों और जोड़ों को ढीला करता है।

बाल्‍जाक लिखे जा रहा है, लिखे जा रहा है। बिना किसी विराम के, बिना किसी संकोच के। उसकी कल्‍पना की लौ प्रदीप्‍त हो गयी तो बस चमकती रहेगी। यह किसी जंगल की आग की तरह है जो पेड़ दर पेड़ फफककर ज्‍यादा प्रचण्‍ड और भक्षक होती जाती है। सफ़े पर कलम फ़र्राटे से दौड़ रही है मगर शब्‍द हैं कि उसके विचारों की रफ्तार संभाल ही नहीं पा रहें हैं। वह जितना ज़्यादा लिखता है उतना ही अधिक शब्‍द-संक्षेपणों में घुस रहा है ताकि सोचने की रफ्तार कम न करती पड़े। अपने भीतरी दृश्‍य में उसे कोई व्‍यवधान बर्दाश्‍त नहीं। सफ़े से उसकी कलम तब तक नहीं हटेगी जब तक उसकी उंगलियाँ ही जवाब न दे जायें या थकान और चक्‍कर के मारे लिखावट ही अंड-बंड न होने लगे।

 

      बाहर सड़के शान्‍त पड़ी हैं। सफ़े के सीने पर ररकती कलम से जनी एक मुलायम सरसराहट के सिवाय कमरे में कोई दूसरा नाद नहीं है। पूरे हुए सफ़े को लिखे हुए सफ़ों की तह में रखने पर अलबत्‍ता थोड़ी सरसराहट जरूर हो जाती है। बाहर पौ फटने जा रही है मगर बाल्‍ज़ाक को इससे क्‍या वास्‍ता? उसका दिन तो छोटे से घेरे में रखी मोमबत्तियां संजो रही हैं। उसे न जमीं की खबर है न घड़ी की। उसे पड़ी है तो बस उस दुनिया की जिसे वह ईंट-दर-ईंट गढ़ रहा है।

 

      यदा-कदा उसका शरीर जवाब दे उठता है। संकल्‍प-शक्ति कितनी भी अकूत क्‍यों न हो, शरीर की कुदरती ताकत कब तक नहीं डिगेगी? पांच-छह घण्‍टे लगातार लिखने के बाद बाल्‍ज़ाक को लगता है कि अब थोड़ा दम मार लिया जाये। उसकी उंगलियां सुन्‍न हो गयी है; आंखें पनियाली होने को हैं; कमर टीस रही है ओर कनपटियां धधक रही हैं। आगे सूत भर तनाव भी शिराओं की बर्दाश्‍त बाहर होगा। जितना काम हो चुका है उसके बरक्‍स कोई दूसरा होता तो संतुष्‍ट होकर आज रात का काम बन्‍द कर देता। मगर बाल्‍ज़ाक अभी कहां मानने वाला है। ऐड़ लगानी पड़ जाये मगर घोड़े को मुकाम तक तो पहुंचाना ही पड़ेगा। अड़ियल टट्टू अगर चलने में ना-नुकुर करे तो दे मारो चाबुक! बाल्‍ज़ाक अपनी कुर्सी से उठता है और उस मेज़ तक जाता है जहां उसका कॉफी पात्र रखा है।

 

      कॉफ़ी वह काला तेल है जिससे उसका इंजन फिर चालू हो जाएगा। इसीलिए बाल्‍ज़ाक को यह खाने या सोने से ज्‍यादा अहम लगती है। उसे तम्‍बाकू से चिढ़ है क्‍योंकि वह उसे उस जरूरी आवेग तक उत्‍तेजित नहीं कर पाता है जिससे वह काम करता है:

 

      ‘‘तम्‍बाकू शरीर को नुकसान पहुंचाता है, दिमाग कुन्‍द करता और लोगों को कम-अक्‍ल बनाता है।’’

 

      मगर कॉफ़ी की प्रशंसा में उसने यशोगान किया:

       ‘‘कॉफ़ी जब पेट में उतरती है तो हर-चीज़ स्‍फूर्त कर देती है। महासेना की बटालियनों की तरह मन में विचार उमड़ने लगते हैं, स्‍मृतियां दोहरी होने लगती हैं, अपने साजो-सामान के साथ तर्क की टुकड़ी गनगनाने लगती है; एक से एक देदीप्‍यमान ख्‍याल शार्पशूटरों की तरह भिड़न्‍त में कूदने लगते हैं। चरित्र अपना जामा चढ़ाने लगते हैं। कागज़ स्‍याही से भरा पड़ा है। जंग छिड़ गयी है और कालिख उगलते वास्‍तविक युद्धक्षेत्र की तरह ऐसे ही खत्‍म होगी जब बहुत सारा काला द्रव्‍य बह चुका हो।’’ कॉफ़ी के बिना उसका काम नहीं चलता है या कम से कम उसे तरह से तो नहीं चल सकता था जैसे वह करता था। कागज़ और कलम की तरह कॉफ़ी की मशीन भी अनिवार्य रूप से हर जगह उसके साथ होती है। यह उसकी नन्‍ही-सी मेज या दूधिया झिलंगे से  कम ज़रूरी नहीं है। अपनी कॉफ़ी बनाने की इजाज़त वह किसी को नहीं देगा क्‍योंकि उस उत्‍तेजक गरल में वैसा रंग और स्‍वाद दूसरा कोई नहीं ला सकता है। किसी अन्‍धविश्‍वासी टोटके की तरह जैसे वह खास तरह के ही कलम-कागज़ इस्‍तेमाल करता है वैसे ही खास अन्‍दाज में वह कॉफ़ी बनाता। उसके एक मित्र ने इस बाबत लिखा है: ‘‘उसकी कॉफ़ी में तीन तरह के दाने होते: बौरबोन, मार्टीनिक और मोका। बौरबोन वह मोंब्‍लां से खरीदता, मार्टीनिक को वील अद्रीत से और मोका को फ़ोवर्ग में विश्‍वविद्यालय परिसर के एक परचूनी से। इस मुहिम में पेरिस का ओर-छोर नापने में हर बार आधा दिन तो बिगड़ता ही था मगर एक अच्‍छी कॉफ़ी मुहैया करने की चाहत के रास्‍ते यह सब ज़हमत तो उठाने लायक थी ही।’’

 

      कॉफ़ी उसके लिए भांग की तरह थी। अपनी शिराओं पर बढ़ते दबाव की जरूरत तले, उस खूनी अक्‍सीर की उसे लगातार ज़्यादा बड़ी खुराक लेनी पड़ती थी ताकि उसका असर बरकरार रहे। अपनी एक किताब के बारे में तो उसने बताया भी है कि वह तो ‘‘कॉफ़ी की सरिता’’ कि सहारे ही पूरी की जा सकी थी। बीस बरस इसका छककर व्‍यसन करने के बाद, सन 1845 में उसने माना कि इसके बेपनाह सेवन की वजह से उसकी पूरी काया विषाक्‍त हो गयी है जिसके कारण उसके पेट में भयंकर दर्द तो होता ही है, इसका असर भी घटता जा रहा है। कड़क कॉफ़ी के पचास हज़ार प्‍यालों-- एक अंकशास्‍त्री के मुताबिक उसने अनुमानत: इतने तो पी लिए होंगे-- ने ह्यूमैन कॉमेडी के विशाल कालवृत्‍त को लिखने में तो ज़रूर हवा भरी मगर घन्‍टी जैसे उसके पुख्‍ता दिल की असमय खराबी के लिए भी वही जिम्‍मेदार है। ताउम्र उसके दोस्‍त और चिकित्‍सक रहे डॉक्‍टर नाकर ने उसकी मृत्‍यु के असल कारण को यूं प्रमाणित किया था- ‘‘दिल की पुरानी तकलीफ़ जो रात को देर तक काम करने और कॉफ़ी के उपयोग--या कहें दुरुपयोग - से और उखड़ गयी... आम इन्‍सान के लिए जरूरी नींद से मुकाबिल होने के लिए जिसे लेना उसकी मजबूरी थी।’’

 

      सवेरे घड़ी ने जब आठ बजाए तो दरवाज़े पर किसी ने हल्‍के से दस्‍तक दी। हल्‍के-फुल्‍के नाश्‍ते की ट्रे को लेकर ऑगस्‍त, उसका नौकर, भीतर आया। बाल्‍ज़ाक उस मेज से उठा जिस पर वह गत मध्‍यरात्रि से लिख रहा था। अब कुछ लम्‍हे आराम के हैं। ऑगस्‍त ने पर्दे खींचे। बाल्‍ज़ाक खिड़की के पास आया और शहर पर एक निगाह डाली जिसे जीतने का वह बीड़ा उठाकर चला था। अब उसे होश आता है कि एक और दुनिया, एक और पेरिस भी है.....एक वह पेरिस जो अपना काम शुरू करने जा रहा है। दुकानें खुलने जा रही हैं; बच्‍चे स्‍कूल जाने की हड़बड़ी में हैं; सड़कों पर तांगे दौड़ रहे हैं; दफ्तरों में बैठे लोग काम करने जा रहे हैं।

 

      थक कर चूर हुयी काया को आराम देने और प्रतीक्षारत कार्य के लिए अपने को तरोताज़ा करने के लिए बाल्‍ज़ाक गर्म पानी से स्‍नान करता है। नेपोलियन की तरह टब में नहाने में वह कोई घण्‍टा भर लगाता है क्‍योंकि यही वह जगह है जहां वह निर्विघ्‍न मनन कर सकता है... एक ऐसा मनन जहां उसे अपने ख्‍यालों का मर्म लिखने की जल्‍दी नहीं है, जहां कुछ कसाला किए बगैर वह स्‍वप्निल सृजनात्‍मकता के कामुक आनन्‍द पर बिछ जाएगा। अभी उसने अपना जामा बदला नहीं कि दरवाजे की तरफ़ बढ़ते कदमों की धमक सुनाई देने लगी। नेपोलियन की सेना में नियंत्रण कक्ष और हुकुम बजाती बटालियनों के बीच सम्‍पर्क साधने के लिए जैसे माल-सवार भेजे जाते थे उसी तरह उसके यहां विभिन्‍न मुद्रकों के हरकारे आ धमके हैं। पहले वाला लिखे जा रहे उपन्‍यास की ताज़ा किस्‍त मांगता है – गयी रात लिखी जिसकी पांडुलिपि अभी सीली पड़ी है। बाल्‍ज़ाक जो भी लिखता है उसे खट से मुद्रित कर देना होता है... इसलिए नहीं कि अखबार या प्रकाशक कर्जे की उगाही के बतौर इसका इन्‍तज़ार करते हैं (उसका हर उपन्‍यास लिखने से पहले ही बिक जाता है) बल्कि इसलिए कि जिस बेसुध हालत में बाल्‍ज़ाक काम करता है, उसे ही खबर नहीं रहती है कि वह क्‍या लिख रहा है या लिख चुका है। पांडुलिपियों के उस घने जंगल का उसकी बारीक नज़र खुद मुआयना नहीं कर पाती है। वे जब मुद्रित हो जातीं और वह पैरा दर पैरा उन पर नज़र फिराता (गो कदमताल करती फ़ौजी कंपनिया मुआयने पर हों) तब जनरल बाल्‍ज़ाक को समझ पड़ती कि उसने किला फ़तह किया है या उसे फिर से लामबन्‍दी करनी पड़ेगी। मुद्रकों, अखबारों या प्रकाशकों के यहां से आये दूसरे संदेशवाहक दो रात पूर्व लिखे और अगले रोज़ मुद्रित होने भेजे प्रूफ़ लाए हैं। पिछली बार दी गयी किस्‍तों के दूसरे या तीसरे प्रूफ़ भी साथ में हैं। ताजा मुद्रित गेली कागजों का पूरा ढेर है। उसकी मेज पर पांच-छह दर्जन कागजों का जत्‍था तो अमूमन रहता ही है जिनके मुद्रण की अभी नमी नहीं छूटी है और जो उसका ज़ेहन चाहते हैं।

       नौ बजे उसका यह सुस्‍ताना समाप्‍त होता है। वह बतलाता है कि उसके आराम का तरीका है एक काम की एवज़ दूसरा काम करना। लेकिन बाल्‍ज़ाक के लिए प्रूफ़ जांचना हंसी-ठट्टे का सौदा नहीं है। इसके तहत मुद्रक की गलतियां दुरुस्‍त करना और शिल्‍प या अन्‍तर्वस्‍तु में थोड़ी-बहुत काट-पीट करना भर नहीं है: इसका पुनर्लेखन और पुनर्प्रस्‍तुतिकरण है। पहले मुद्रित प्रूफ़ को तो वह अपना पहला मसौदा मानकर चलता है। अपने मुलायम गद्य को प्रूफ़-शीटों में रफ्ता-रफ्ता शक्‍लो-सूरत देने के सिवाय वह दुनिया के और किसी काम में इतनी दिली कूवत नहीं गंवाता है। बड़ी तल्‍ख-अदबी से वह इन प्रूफ़-शीटों की जाँच-परख करता है और बार-बार उनमें रद्दो बदल करता जाता है। अपने काम-काज से जुड़ी हर चीज के बारे में वह बड़ा बेरहम और कर्मकांडी है। अपने लिखे को मुद्रित किए जाने के कायदे वह खुद बनाता है: कागज विशेषकर लम्‍बा और चौड़ा होना चाहिए जिससे मुद्रित शब्‍द ताश के इक्‍के के ऊपर बनी बुंदकी से लगें। दायें और बांये, ऊपर और नीचे बड़े-बड़े हाशिए छोड़ने होंगे ताकि काट-पीट और रद्दोबदल के लिए खूब जगह रहे। अलावा इसके किसी सस्‍ते धूसरित कागज पर चढ़े प्रूफ़ उसे मान्‍य नहीं। उसे तो यह सब फ़क्‍क सफेद कागज पर ही चाहिए ताकि हर शब्‍द साफ़-साफ़ दिखता जाये।

 

      वह फिर अपनी छोटी मेज़ पर आ गया है। अपने सृजित चरित्र लुई लामबेयर* (Louis Lambert) की तरह उसके पास भी एक साथ छह-सात पंक्तियां पढ़ने की नज़र है। एक नज़र डालते ही उसकी कलम की घोंप शुरू हो जाती है। उसके दिल की दिल में रह गयी है। जो भी गये रोज़ या उससे पहले लिखा था, सब बेकार है। उसका अर्थ धुंधला है, वाक्‍य गड्डमड्ड हैं, शैली दोषपूर्ण है और संरचना फूहड़ है। हर चीज बदल देनी पड़ेगी ताकि चीजें साफ़, सरल और कम बोझिल लगें। दुश्‍मन के जत्‍थे पर प्रहार करते घुड़सवार की तरह उस पर उन्‍माद सवार है और अपनी फुफ़कारती कलम को वह निर्ममता से पन्‍ने के पोर-पोर में कोंचे जा रहा है। ये आयी उसकी कलम की तेग और अपने सन्‍दर्भ से उखाड़कर एक वाक्‍य सीधी तरफ़ उड़ा दिया; एक इकलौते शब्‍द पर बल्‍लम मारी और उसे बांयी तरफ़ फ़ेंक मारा, पूरे पैराओं को मरोड़-मसोसकर उनकी जगह नए पैरे डाल दिये हैं। जल्‍द ही हालत यहां आ पहुंची है कि कम्‍पोजिटर को निर्देश देने के लिए प्रयुक्‍त होने वाले सामान्‍य प्रतीक चिन्‍ह कम पड़ गये हैं इसलिए बाल्‍ज़ाक मियां को खुद अपने प्रतीक चिन्‍ह ईज़ाद करने पड़ रहे हैं। कुछ देर बाद तो हालत यह हो गयी कि आगे काट-पीट करने के लिए हाशियों पर जगह ही नहीं बची क्‍योंकि उन पर मुद्रित से ज्‍यादा मजमून चढ़ा दिया गया है। काट-पीटकर जो चीज़ हाशियों पर ले जाकर टांग दी गयी थी उसमें खुद काट-पीट कर दी गयी है और इस पूरक-पुनर्विचार की तरफ़ कम्‍पोजिटर का ध्‍यान खींचने के लिए अलग निशान घसीट दिया गया है। जिस पन्‍ने पर अभी तक सफ़ेदी के रेगिस्‍तान के बीच मुद्रित मजमून का नखलिस्‍तान नुमाया था, वहां आढ़ी-टेढ़ी रेखाओं का ऐसा मकड़जाल पसर गया है कि रद्दोबदल जारी रखने के लिए उसे पन्‍ने के पिछवाड़े जाना पड़ेगा। मगर उससे भी क्‍या काम चलेगा। आड़ी-टेढ़ी रेखाओं और प्रतीक चिन्‍हों की मार्फ़त कुनमुनाते कम्‍पोजिटर को रास्‍ता बतलाने के लिए जब तिल भर भी जगह नहीं बची तो बाल्‍ज़ाक को सहारा है तो बस कैंची का। अनचाहे अंशों को सशरीर हटा दिया गया और उनकी जगह नयी पट्टी लगा दी गयी है। किसी वाक्‍य के प्रारम्‍भ को उठाकर बीच में घुसेड़ दिया गया है और वहां नया प्रारम्‍भ लिख दिया है। पूरी सामग्री की धज्जियां उड़ा दी गयी हैं। काट-पीट, प्रतीकों-रेखाओं और दागों से तहस-नहस किया यही माल अब मुद्रक के पास लौटेगा जो मूल पांडुलिपि के मुकाबले कहीं ज्‍यादा बे-सिर-पैर और अपाठ्य है।

 

      अख़बार और मुद्रक के दफ्तरों में उस विस्‍मयकारी घसीट की देख लोग ठहाके मार रहे हैं। सबसे तजुर्बेदार कम्‍पोजिटरों ने उसका मतलब निकालने में अपनी नाकाबिलियत ज़ाहिर कर दी है। दुगने मेहनताने के लालच के बावजूद कोई बाल्‍ज़ाक साहब की खातिर एक से ज़्यादा दिन खपाने को राज़ी नहीं है। महीनों की मेहनत के बाद एक शख्‍स ने जनाब की चित्रलिपि उकेरने में दक्षता पायी मगर एक खास प्रूफ रीडर की दरकार तो अलबत्‍ता फिर भी रहती है जो कम्‍पोजिटर महाशय के अक्‍सर कयास भरे प्रयासों को दुरुस्‍त कर सकता है।

 

      मगर उन लोगों के काम का अभी तो सूत्रपात ही माना जाएगा क्‍योंकि जब दूसरे दौर के प्रूफ़ आते तो बाल्‍ज़ाक उन पर फिर उसी तल्‍खी से टूट पड़ता। इतनी मेहनत-मशक्‍कत से बनाए ताने-बाने को वह फिर उधेड़ने बैठ गया। ऊपर से नीचे तक हर वरक में रद्दोबदल और काटपीट का सिलसिला तब तक चलता रहेगा जब तक यह पहले की तरह ही घिचपिच और अपाठ्य न हो जाये। और यह रवायत कोई छह-सात मर्तबा की जाती है। फ़र्क बस यही है कि पहले वह पूरे पैराओं की तोड़-फोड़ करता था मगर अब सिर्फ वाक्‍यों की करता है। अन्‍त होते-होते वह एक शब्‍द की नाप-जोख पर जा टिकता है। अपनी कुछ किताबों के बाल्‍ज़ाक ने इस तरह पन्‍द्रह या सोलह प्रूफ़ चैक किए। इसी से हमें उसकी बेपनाह कूवत की थोड़ी भनक लगती है। बीस बरस के दरम्‍यान उसने न सिर्फ़ अपने वे चौहत्‍तर उपन्‍यास कहानियां और शब्‍द-चित्र लिखे बल्कि अन्‍तत: प्रकाशित होने से पहले उसने बार-बार उनका पुनर्लेखन किया।

 

      इस नौलखा हिसाब-किताब की राह में न उसकी आर्थिक ज़रूरतें बाल्‍ज़ाक को रोक पाती हैं और न प्रकाशकों की मिन्‍नतें जो दोस्‍ताना फटकारों से लेकर कानूनी धमकियों तक रंग ओढ़ती रहती थीं। कितनी दफ़ा उसने मिलने वाली फ़ीस की कभी आधी रकम तो कभी सारी, इसी बाबत ज़ब्‍त हो जाने दी क्‍योंकि इन सुधारों और फेर-बदल की लागत उसे अपनी जेब से भरनी पड़ती थी। मगर उसके लिए यह लेखकीय ईमानदारी की बात थी जिस पर वह अटल रहता था। किसी अख़बार के सम्‍पादक ने एक बार उसके एक उपन्‍यास की किस्‍त को उसके देखे अन्तिम प्रूफ़ या उसकी सहमति के बगैर ही छाप दिया तो बाल्‍ज़ाक ने हमेशा के लिए उससे अपने संबंध तोड़ डाले। बाहरी दुनिया के लिए वह लाख ओछा, फूहड़ और लोभी हो मगर एक कलाकार के स्‍तर पर आधुनिक साहित्‍य में किया जाने वाला सबसे ईमानदार संघर्ष उसी के यहां दर्ज होता है। सिर्फ़ वही जानता था कि उस निर्जन प्रयोगशाला में बैठकर अपनी रचनाओं को मुकम्‍मल बनाने में कितनी ऊर्जा और कुर्बानी झोंकनी होती है। फ़कत किताबों के आधार पर उनमें छिपे उसके कष्‍ट और श्रम का जायज़ा नहीं लग सकता है। अपने इकलौते निष्‍ठावान और विश्‍वसनीय मित्र के बतौर इसलिए इन प्रूफ़-शीटों को वह संजोकर रखता था। वह उसकी शान थीं... उसके कलाकार की उतनी नहीं जितनी उसके कामगार और अथक शिल्‍पकार की शान थीं। इसलिए उसने अपनी हर किताब की एक अलग जिल्‍द तैयार कर रखी थी जहां मूल पांडुलिपि के साथ हर पायदान पर रद्दोबदल किए सभी प्रूफ़ों को एक पोथे में बांध दिया गया होता जिसमें किसी प्रकाशित उपन्‍यास के दौ सौ पृष्‍ठों के मुकाबले कोई दो हज़ार पृष्‍ठ होते। किसी पोथे में मूल पांडुलिपि को जिल्‍द करने की बजाय नत्‍थी भर कर रखा होता। जैसे नेपोलियन अपने फ़ील्‍ड मार्शलों और निष्ठावान समर्थकों को राजसी तमगे-खिताब बांटता था वैसे ही बाल्‍ज़ाक भी हयूमैन कॉमेडी की विस्‍तृत श्रृंखला में लिखी इन जिल्‍दों को अपने सबसे करीबी मित्रों को तोहफ़े के तौर पर भेंट करता था।

 

      ‘‘इन पोथों को मैं उन्‍हें देता हूं जो मुझझे स्‍नेह रखते हैं। ये मेरे सुदीर्घ श्रम के साक्षी हैं। इन्‍हीं विकराल पृष्‍ठों पर मैंने अपनी रातें गुज़ारी हैं।’’

 

      ज्‍यादातर पोथे तो उसने मैडम हाँस्‍का** (Hanska) को दिए मगर मैडम कैस्‍ट्रीज** (Castries) और राजकुमारी विस्‍कोंती** (Countess Visconti) एवं उसकी बहन भी प्रापकों में शामिल थे। उसकी सौगात पाने वाले इन चन्‍द खुशनसीबों को इन बेजोड़ दस्‍तावेज़ों की अहमियत की खूब खबर होती थी यह बात, बरसों उसकी सेहत का ख्‍याल रखने वाले डॉक्‍टर नाकर (Dr Nacquart) – जिन्‍हें ऐसा एक पोथा नसीब हुआ था – के इस पत्रोत्‍तर से जाहिर हो जाती है; यह सचमुच एक असाधारण स्‍मारक है जो, कला की पूर्णता में यकीन रखने वाले तमाम लोगों को अवश्‍य पढ़ना चाहिए। उन आमजनों के लिए भी यह आंख खोलने वाला होगा जो समझते हैं कि ज़ेहन की सर्जना उतनी आसानी से तैयार हो जाती है जितनी आसानी से वे उसे पढ़ डालते हैं। काश, वेण्‍डोम चौराहे पर मुझे अपनी लाइब्रेरी जमाने को मिल जाये ताकि आपकी मेधा के पारखियों को यह जानने का मौका तो मिले कि आप किस कर्तव्‍यनिष्‍ठा और अध्‍यवसाय से काम करते हैं।’’

 

      बीथोविन की नोटबुक के अलावा आज शायद ही कोई दूसरा ऐसा दस्‍तावेज हो जो कलाकार की अभिव्‍यक्ति के संघर्ष को इतना मूर्त होकर दर्शाता हो जितना कि ये पोथे। बाल्‍ज़ाक कितनी कुदरती कूवत से लैस था, अपनी किताबों में वह कितनी अकूत ऊर्जा खपाता था, इसे किसी शब्‍द चित्र या दंतकथा की बजाय इन्‍हीं पोथों के सहारे ज्‍यादा अच्‍छी तरह समझा जा सकता है। इन्‍हीं के सहारे हम असली बाल्‍ज़ाक को समझ सकते हैं।

            *                     *                     *

 

      तीन-चार घण्‍टे प्रूफ़ों में लगे रहने से दुपहरिया हो गयी। कागज़ों के ढेर को उसने एक तरफ़ सरकाया और पेट-पूजा में लग गया जिसमें होता एक अण्‍डा, एक या दो सेण्‍डविच या कोई पेस्‍ट्री। उसे अच्‍छी तरह रहने का शौक था। अपने देहात तोरां (Touraine) के तले और पक्‍के खाने उसे खास अच्‍छे लगते थे... वहां का कुरकुरी मछलियां, लाल रसेदार मीट आदि-आदि भी। अपने कस्‍बे की लाल-सफ़ेद मदिराओं का तो वह ऐसा पारखी था जैसे पियानोवादक अपनी कीलियों का होता है। मगर जब वह काम कर रहा होता तो हर तरफ के सुख से अपने को जुदा कर देता। उसे पता था कि खाने के बाद आदमी अलसाने लगता है। और उसके पास अलसाने की फुर्सत कहां?

 

      थोड़ी देर यूं ही कमर सीधी करने के बाद वह वापस अपनी उसी छोटी मेज़ पर आ टिकता है। बचे हुए प्रूफों को ठीक करेगा, एकाध लेख लिखेगा, किसी को खत लिखेगा। शाम कोई पाँच बजे जाकर उसकी कलम को दम मिलता है। अभी तक वह न किसी से मिला है और न उसने अख़बार देखा है। अब उसे थोड़ा आराम रहेगा। ऑगस्‍त उसके लिए कुछ हल्‍का खाना ले आता है। इस दरम्‍यान कोई मित्र या प्रकाशक के यहां से कोई आ जाये तो आ जाये मगर वह अमूमन अकेला ही रहता है- सम्‍भवत: आने वाली रात को लिखे जाने के बारे में कुछ सोचता-विचारता। सड़क पर घूमने भी वह अमूमन नहीं निकलता है क्‍योंकि थक कर चूर हो गया होता है। आठ बचे जब बाकी दुनिया मौज-मजे करने निकल रही होती है, वह बिस्‍तर पर लेटता है और धम्‍म से सो जाता है। उसकी नींद बड़ी गहरी और बेख्‍वाब होती है। सो वह इसलिए रहा है कि भूल सके कि अभी तक उसने जो लिखा है उसने, अगले रोज या उसके अगले रोज़ या जिन्‍दगी की आखिरी सांस तक लिखे जाने के प्रति उसे मुक्‍त नहीं किया है। मध्‍यरात्रि को उसका नौकर आता है और मोमबत्तियां जलाता है। बस, बाल्‍ज़ाक के भीतर की लौ जलने के लिए बार फिर प्रदीप्‍त हो उठी है। **

 

    (स्‍टीफ़न स्‍वाइग द्वारा लिखी बाल्‍ज़ाक की विस्‍तृत जीवनी के एक अध्‍याय का अंश)

 

*  आत्‍मकथात्‍मक शैली में लिखा बाल्‍ज़ाक का शुरूआती उपन्‍यास जो इसके नायक का नाम भी है।

** इन तीनों अमीरज़ादियों पर बाल्‍ज़ाक अपना दिल छिड़कता रहा – मुख्‍यत: उनके अमीर होने के कारण मगर फिर भी जो परिष्‍कारी सोच रखती थीं। जीवन के अन्तिम वर्ष में मैडम हाँस्‍का को अपनी पत्‍नी बना पाया – वह भी इस कारण कि मिस्‍टर हाँस्‍का की कुछ वर्ष पहले मृत्‍यु हो चुकी थी।  - अनुवादक  

                ओमा शर्मा

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