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“कुछ दिन हॉस्पिटल के ... ”


बेड पर पड़ी छत देखती आँखें इस हॉस्पिटल में दो महिने पुरानी हो चुकी थीं। सारे मकड़ियों के जाले दिमाग में उतर आए थे। हॉस्पिटल की आया, वार्ड बॉय, नर्स, ड्यूटी डॉक्टर सभी से पहचान पुरानी हो चुकी थी। अविरल अश्रुधारा की किसी को कोई क़ीमत नहीं थी। पानी की तरह बहते आंसुओं पर नियंत्रण खत्म हो चुका था। दर्द से ज्यादा आंतरिक व्यथा सालती मन को मथती थी। सारे करीब और दूर के रिश्तेदारों में कोई ऐसा नहीं मिला जिससे अपनत्व बोध महसूस कर पाती। यंत्रवत पड़ी बिखरी रहती। जैसे अस्तित्व शून्य हो गया था। साया भी साथ छोड़ चुका था। आत्मविश्वास खत्म हो चुका था। हड्डियों में लिपटा माँस का ढाँचा जिसमें बंद होने के इंतजार में धड़कन अब भी व्यवस्थित थी।

एक बेटी की माँ एक जिंदा लाश बन चुकी थी। मिलते दुर्व्यवहार और अपनी असमर्थता ने आत्मसम्मान को कुचल कर रख दिया था। पल-पल मौत को आवाजें देती जिंदगी से लड़ती तीसरे ग्राफ्टिंग ऑपरेशन का इंतजार कर रही थी। जिसे अंजाम देना डॉक्टरों के लिए भी उलझने पैदा कर रहा था। जलने की वजह से होने वाले जख्म को जल्द ठीक करने के लिए त्वचा की जरूरत थी। जिसे अमूमन पहले मरीज़ की जाँघ से लिया जाता है। यहाँ हादसा घुटने से नाभि तक का शरीर आगे से जल चुकने का था। जख्म ताजे थे। जाँघ के पीछे की ओर से भी अगर जरूरत हो तो त्वचा का लिया जाना संभव था, ऐसा डॉक्टर का कहना था। अब तक ग्राफ्टिंग के लिए डॉक्टरों ने दोनों हाथों के बाँह याने कंधे से कोहनी तक की त्वचा का उपयोग बारी बारी से दो ऑपरेशनों में किया था। इस तीसरी ग्राफ्टिंग के लिए घुटनों के नीचे के हिस्सों से त्वचा निकालने के बारे में विचार किया जा रहा था। पूछे जाने पर मैंने कलाई तक के हाथों की त्वचा लेने के लिए भी हांमी भर दी थी। पर डॉक्टर उसे बचाना चाहते थे। वरना जिंदगी भर दाग की वजह से पूरी आस्तीन का कपड़ा पहनना जरूरी हो जाएगा। मुझे इस बात की परवाह न थी।

ऑपरेशन के लिए एनेस्थिशिया देने के कई प्रकार है। डॉक्टर के अनुसार कम समय में एक के बाद एक ऑपरेशन करने के लिए हर बार एनेस्थिशिया देने के अलग तरीके का इस्तेमाल करना जरूरी होता है। मुझे रीड की हड्डी में दो बार और कलाई में वेन से एनेस्थिशिया दिया जा चुका था। अबकी ओरल एनेस्थिशिया देने की बात डॉक्टर कर रहे थे। लगातार हुए दो ऑपरेशन में दोनों हाथों से ली गई त्वचा से बने जख्म जलने से हुए जख्म से कहीं ज्यादा जल रहे थे। पूरा शरीर जख्मों से भरा लग रहा था। पूरी पट्टियों में लिपटी मैं ठीक होना सपना समझने लगी थी। शून्य में ताकती मैं आसपास में होती घटनाओं को देखती जाती।

हर दो दिन बाद ड्रेसिंग होती जो जानलेवा लगती। ड्रेसिंग के बाद अक्सर बुखार चढ़ने लगता। जिसे डॉक्टर इन्फेक्शन होने की निशानी भी समझते। पर इन्फेक्शन नहीं होता। कहीं इन्फेक्शन तो नहीं हुआ है यह बात डॉक्टर जख्मों को सूँघ कर पता किया करते। जख्मों की पट्टी हटाने के लिए डिस्ट्रिल वॉटर से पूरी पट्टी भिगाई जाती। फिर भी पट्टियाँ खोलते वक्त कोई इस्टुमेंट जख्मों को हल्के से भी छू जाय तो मुँह से चीख निकल पड़ती और डॉक्टर सॉरी कहे बिना नहीं रह पाते। कई बार बेटाडिन में भीगी पट्टियों को जख्मों में बिछाकर उठा लिया जाता। इसी तरह जख्मों की सफाई की जाती। पुनः बेटाडिन से भीगी पट्टियों को लपेट कर उस पर सूखी पट्टियों को चढ़ा कर ड्रेसिंग कर दी जाती। पूरा रूम डिस्ट्रिल वॉटर से गीला हो जाता। थोड़ी देर के लिए रूम जैसे ऑपरेशन थियेटर में बदल जाता। उसके बाद अगली ड्रेसिंग की प्रतीक्षा में बीते घंटे भी पहाड़ जैसे लगते।

माँ मेरी बिटिया के साथ रोज रात खाना लेकर आती घंटा भर बैठती। बतियाती। चली जाती। दुख कम ना होता। पति सुबह, दोपहर नाश्ता खाना लेकर आते। हॉस्पिटल के बिल, डॉक्टर व लोगों के शंकित सवाल, उनके रूखे स्वभाव को बदतर बना चुके थे। उनका मुँह फुला ही रहता। मैं और टूटती जाती। डेढ़ साल की बेटी को देखकर भी दिल नहीं जुड़ाता। लगता जाने किसका इंतजार कर रही हूँ। ना जीने की चाह न ही माँगने से मौत मिलेगी। हर एक आकर दिलासा देता। बेटी के लिए जीने की बात कहता था। मुझे लोगों की बातें ताने जैसी महसूस होती। मुझे देखने आने वालों से मैंने मिलने के लिए मना कर दिया। हॉस्पिटल की मौसियाँ अकेलापन दूर करने खुद ही आ जाती और सामने बैठी बतियाती। मुझे अच्छा लगता। ड्यूटी डॉक्टर आते और मन बहलाने के इरादे से तरह तरह की बातों पर चर्चा करते मैं हाँ-ना में उत्तर देती।

पहले खाने में बहुत ना नुकुर करती थी। जब से डॉक्टर ने बताया है कि शरीर को त्वचा (चमड़ी) की जरूरत है। आप खाएँगी नहीं तो त्वचा कहाँ से बनेगी। मैंने बिना कुछ बोले सुबह मोसंबी जूस, अंडा, दिन में चिकन शाम को मूंगफल्ली दाना और रात को मटन खाना शुरू किया जैसे मुझे दिया जाता था। घर और बिटिया को माँ संभाल रही थी। मैं खुद को संभालने की कोशिश भी करती तो बिखरती चली जाती।

मैंने खामोशी से विचार किया। अपनी स्थिति पर नज़र डाली और गुमसुम हो गई। खुशियाँ बची ना थी। शरीर और मन का दर्द झेलना ही था। डॉक्टर के अनुसार मैं 27 प्रतिशत और थर्ड डिग्री बर्न थी। त्वचा की दो परतें जल चुकी थी जो सूख कर घाव से चिपक गई थी। हर ड्रेसिंग में डॉक्टर थोड़ी थोड़ी ऊपर की मरकर पपड़ी बन चुकी त्वचा काटते जाते। हर बार एक आह खामोश आसमान की ओर चली जाती। त्वचा का जल्द आना मुश्किल था इसलिए ग्राफ्टिंग की सलाह दी गई थी। शरीर के 27 प्रतिशत हिस्से में घाव को झेलना मामूली बात न थी। ड्रेसिंग के समय हर बार डॉक्टर नई आई चमड़ी मुझे दिखाते और आशावादी रहने की सलाह देते।

बेड पर सीधी लेटे लेटे मैं थक चुकी थी। घावों की टीस करवट लेने नहीं देती। थोड़े से हिलने से ही पूरे शरीर में वेदना का सागर हिलोरे लेने लगता। कई इंजेक्शन और दवाइयाँ आहार बन चुकी थी। दस-पंद्रह गोलियाँ और केप्सूल एक साथ खाना नर्स ने सीखा दिया था। जलने के दिन के बाद तीन दिन तक नशीला ड्रग्स देकर बेहोश रखा गया। नींद की दो गोलियाँ भी मुझ पर बेअसर थी। जलन बर्दाश्त नहीं होती थी। पूरे फूल एसी रूम में अर्ध बेहोशी में भी चिल्लाने लगती। पहले एक महिने जिंदगी और मौत से जूझती रही। हर एक डॉक्टर आते। देखते। पति को कह जाते पत्नी खतरे से बाहर नहीं।

एक दिन दोपहर खाना खाने के बाद नर्स दवाई देने आई। बीपी चेक किया और चली गई। पति रूम में ही थे। अचानक लगा पैर की उँगलियों में सेंस नहीं। हिलाकर देखने की कोशिश की। पर उँगलियों का एहसास नहीं हुआ। पति से शिकायत की और नर्स को बुलाने कहा। नर्स ने आने में पाँच मिनट लगा दिए। तब तक पति ने पैर के तलवे को हथेलियों से रगड़ कर गरम करने की कोशिश की। कोई फर्क नहीं पड़ा। पैर ठंडे और काले होने लगे। पति ने घबराहट में दौड़ कर नर्स को बताया। दो तीन नर्स लगभग दौड़ते हुए आईं। पैरों को देखा। तब तक घुटने तक पैर काले हो चुके थे। हेड नर्स दौड़ती आई। एसी को बंद किया। मेरे नाक में साँसों को महसूस करने लगी। घुटने के ऊपर तो पट्टियाँ थी। वें समझ गई पूरी बॉडी काली पड़ने लगी है। पति को बाहर भेजा। मेरे शरीर से चादर हटाकर बीच छाती में दोनों हाथ एक के ऊपर एक रख कर झटके देने लगी। मैं अचंभित थी कि क्या जान जा रही है? नर्स को पूछा। नर्स ने कुछ नहीं कहा। वो अपना काम किए जा रही थी। एक नर्स दौड़ कर ऑक्सीज़न सिलेंडर ठेलती हुई ले आई जिसके नीचे चक्के लगे थे। हड़बड़ी में मुझे ऑक्सीज़न का पाइप लगाया और सोने कहा गया। जबसे जली थी नींद बड़ी मुश्किलों से आती है। यह पता चलते ही हेड नर्स ने किसी इंजेक्शन का नाम लिया। एक नर्स दौड़ कर ले आई। मुझे तुरंत इंजेक्शन लगाया गया और एक नर्स ने मेरी आँखों पर अपनी हथेली रख दी। आँख बंद होते ही मैं बेहोश हो चुकी थी।

होश में आते ही मेरा पहला प्रश्न था ... क्या मर चुकी हूँ? मैंने देखा मेरी कलाई पकड़े नर्स पास ही बैठी थी। घड़ी और मेरी नब्ज़ पर उसका ध्यान केंदित था। मेरे होश में आने पर उसका दूर होता तनाव स्पष्ट दिखाई दे रहा था। उसने मेरी ओर देखा और मुस्कुराते हुए कहा “कुछ भी मत बोलो।” मैंने ऑक्सीज़न हटाने के लिए कहा। मुझे सांस लेने में बिलकुल तकलीफ नहीं हो रही यह देखते हुए कुछ देर बाद ऑक्सीज़न हटा दिया गया। मुझे लगा पाँच मिनट में चार घंटे कैसे गुजर गए पता ही नहीं चला। नर्स ने पति को अंदर आने की इजाज़त दे दी। वो सहमे से आकर बैठ गए। मैंने महसूस किया मौत छूकर गुजर गई। जिंदगी दर्द का रोलर कोस्टर हो गई थी।

कुछ दिन बाद ग्राफ्टिंग के अंतिम ऑपरेशन का दिन आ गया। जिसमें ओरल एनेस्थेशिया दिया जाना था। नर्सों ने ऑपरेशन की तैयारी की। डॉक्टर आए। मुझे ऑपरेशन थियेटर ले गए। जानकारी दी गई कि ओरल पाइप द्वारा आपके मुँह में बेहोश की जाने वाली गैस एक सीमित मात्रा में प्रवाहित की जाएगी और आपको हम निश्चित समय तक बेहोश रख सकेंगे। मुझे कोई डर नहीं लग रहा था। मैं बीते तीन महीने में चौथी बार इस ऑपरेशन थियेटर में आ रही थी। पहली बार थर्ड डिग्री जली हुई चमड़ी को जख्म से अलग करने, दूसरी और तीसरी बार ग्राफ्टिंग के लिए। डॉक्टर की प्रक्रिया शुरू हुई। मैं बेहोश होने लगी।

यह मेरी जिंदगी का वाकई बहुत भयानक हादसा था। बीच ऑपरेशन में मुझे होश आया। मैंने पोटेटो पीलर से आलू छिलने की तरह ही अपने पैरों से त्वचा को निकालते डॉक्टरों को देखा। मैंने बहुतेरा आवाज देना चाहा। छटपटाई। मुँह के पाइप में मेरी आवाज जो निकल ही नहीं पा रही थी, घुट कर रह गई। न मैं हाथ हिला पा रही थी ना ही पैर। पूरा जिस्म अशक्त था। सिर्फ एहसास और दृष्टि काम कर रहे थे। डॉक्टरों और नर्स को पता ही नहीं चला कि मैं होश में हूँ। वे अपना काम कर रहे थे। पैर से निकाली चमड़ी को फैलाकर छेदे किए गए जिससे वह फैलकर बड़ी हो जाए। क्योंकि जख्म के लिए चमड़ी कम पड़ रही थी। चमड़ी को जख्म पर लगाने से पहले घाव को हरा करना जरूरी था। अतः पहले से खुले जले जख्म को गॉस पीस (बैंडेज के टुकड़ा) से डॉक्टर ने घसना शुरू किया। मैं हृदय विदारक दर्द से उबल पड़ी और बेहोश हो गई। बेहोश होने ने मुझे उस अत्यंत पीड़ादायक क्षणों को महसूस करने से से बचा लिया।

जब होश आया मैं अपने रूम में बेड पर थी। साँसे ज़ोरों से चलने लगी। मेरी रुलाई फूट पड़ी। ऑपरेशन के समय अचानक होश आने पर जो मैंने देखा था वह सहन शक्ति के बाहर था। जब डॉक्टर चेक करने के लिए आए मैंने सारी बात बताई। उन्होंने विश्वास नहीं करने की एक्टिंग की। डॉक्टरों ने कहा ऐसा हो ही नहीं सकता। मुझे समझ गया। मुझे डर से बचाने के लिए ऐसा कहा जा रहा है। ठीक होने के कई दिन बाद उन्होंने स्वीकारा ऐसा भी संभव है।

ड्रेसिंग होती रही। हर बार जख्म कुछ कम होते मालूम पड़ते। घुटने जले होने के कारण एक शंका हमेशा आसपास मंडराया करती। मैंने डॉक्टर से प्रश्न किया “क्या मैं चल पाऊँगी ?” डॉक्टर भी नहीं जानते थे कि मैं चल पाऊँगी या नहीं। सीधी खड़ी हो पाऊँगी भी या नहीं। डॉक्टर कहते कुछ कहा नहीं जा सकता।
जख्मों के साथ डॉक्टर ने धीरे धीरे चलने की सलाह दी गई। पहली बार खड़े होते ही मैं बेहोश हो गई। फिर दूसरे दिन से दीवार पकड़कर चलना शुरू किया। चलते ही पैरों में जैसे कई सुइयाँ अचानक चुभती महसूस होती और पैर जामुनी रंग में बदलने लगता। मैं घबरा कर पसीने-पसीने होती जाती। हार कर बैठ जाती। दूसरे दिन फिर उठती। फिर चलती। मैं भीतर ही भीतर भय से मुरझाती चली गई। कई और चुनौतियाँ अभी बाकी थी। हॉस्पिटल में दिन पूरे हुए।

आखिर हॉस्पिटल से छुट्टी मिली। मैं घर आ गई। घर से ड्रेसिंग के लिए हफ्ते में दो बार हॉस्पिटल जाना पड़ता। महिनों दर्द झेला। लगाई गई चमड़ी शरीर द्वारा स्वीकार कर ली गई थी। भरते जख्म राहत देते।

मैं चलने चलने लगी। डॉक्टर ने एक्सर्साइज़ साइकिल चलाने की सलाह दी। जब भी साइकिल चलाती। पैरों में बँधी बैंडेज पट्टियाँ खून से लाल होने लगती। तुरंत पट्टियाँ बदलने जाना पड़ता। डॉक्टर साइकिल चलाते रहने की सलाह देते रहे। मैंने अक्षरशः पालन किया।


जहाँ जख्म को आखिर्कार अच्छा होना था ... जख्म खून के छोटे फुग्गे सा फूलने लगा। मेरे पूरे होश में ही डॉक्टर मुझे बताने के बाद उसे कैंची से काटते। मेरी चीख हॉस्पिटल के रूम में गूँजती। आखिर जख्म खत्म हुए। जख्मों पर चमड़ी आई। स्कार में बदल गई। जहाँ-जहाँ से त्वचा ग्राफ्टिंग के लिए ली गई थी वहाँ-वहाँ आई सारी नई त्वचा आधे-आधे इंच फूल गई। उन स्कार को दबाने के लिए मोजे जैसे प्रेशर बैंडेज हाथों और पैरों में पहनने के लिए डॉक्टर ने सुझाव दिए। जिसका कहीं कहीं असर हुआ। कुछ स्कार दबने लगे। त्वचा पर दाग बनते गए।
ग्राफ्टिंग की वजह से छह महिनों की एक्सरसाइज के बाद मैं उठने बैठने में कामयाब हुई। त्वचा में हो चुके स्कार पूरी तरह नहीं दबे। जिसे खत्म करने के लिए डॉक्टर ने पुनः प्लास्टिक सर्जरी की सलाह दी। मुझे स्कार मंजूर थे पर फिर से हॉस्पिटल, ऑपरेशन थियेटर जाना कतई गवारा न था।
मैंने पूरे स्कार और दाग के साथ जिंदगी को स्वीकारा। जिंदगी को नए सिरे से देखने का सपना कहाँ छूटता है। मुस्कुराहट ने जिंदगी का स्वागत किया। कुछ सपने दौड़ने लगे राहों में मुझसे आगे .... ।
 


-रीता दास

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