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दशहरा और दशहरे में नवदुर्गा पूजा !

दशहरा और दशहरे में नवदुर्गा पूजा ! क्या पहाड़ी- क्या मैदानी , क्या बंगाली -क्या गुजराती , क्या असामिया क्या बिहारी अधिकतर भागों व प्रत्येक गृहों में यह अनुष्ठान कितने सुमन से किये जाते हैं ।

यही दशहरे के तो दिन थे वे ! बच्चों के लिए छुटियाँ और धर्मार्थियों के लिए पूजा - व्रत के द्वारा आत्मशुद्धि के दिवसों के दस दिन । हिमानी के घर में भी पूजा -व्रत होता था ।  हिमानी की सखी मनु के घर यह दशहरा धूमधाम से मनाया जाता था ।  मनु प्राय: हिमानी को अपने घर हरछीना लेकर जाती ।  ' हरछीना ' का अर्थ है वे दो पहाड़ियाँ जो आपस में पास-पास हों ।

यहाँ मनु की बड़ी हवेली थी;जहाँ नवरात्र में देवी पूजा होती थी और शारदीय नवरात्र- दशहरे पर भी पूजा के अनुष्ठान होते ।  हिमानी को यह व्रत -अनुष्ठान बहुत मन भाते थे , उसने अपनी इजा को व्रत-पूजाएँ करते देखा था तो निश्चित तौर पर उसके बाल मन पर भी इन सभी परम्पराओं -रीतियों का प्रभाव पड़ा ।
मनु के साथ हिमानी कई बार हरछीना की ओर गयी थी ।

हरछीना में एक कृष्ण मंदिर भी था जहाँ भगवान -योगी कृष्ण की पीतवर्ण ; धोती धारण किये व नील रंग के उत्तरीय ओढ़े हुए एक बड़ी मूर्ति थी ।  उनकी त्रिभंगी मनमोहक मुद्रा मन को लुभाती ।  बंशी जीवंत प्रतीत होती और नेत्र भावप्रवण ! ऐसा प्रतीत होता जैसे वेणु की मधुर ध्वनि निकल रही हो , शायद यह भक्तों के प्रेम की पराकाष्ठा थी कि उनको यह नटवर अपना मित्र-सखा लगता ।  अनंत को जाता अगरबत्तियों का धुंवा इस दृश्य में जीवंतता जगाता था ।

जन्माष्टमी को यहाँ एक मेला लगता था ।  दूर -दराज के उच्च शिखरों से आये तिब्बती -भोट , स्थानीय यहाँ सड़क के किनारे अपनी छोटी-छोटी दुकानें लगाते थे ; अधिकतर जन्माष्टमी में बादल बरसते इसलिए इन दुकानों के ऊपर प्लास्टिक और तिरपाल डाल दिए जाते थे ।  इन दुकानों की ऊँचाई और आकार बहुत छोटा होता था । 

हिमानी और उसकी सभी सखियाँ कितना इन्तजार करती थीं इस मेले का !!
श्री कृष्ण मंदिर से कान्हा का डोला पूरे हरछीना की तिराहे वाली सड़क का एक चक्कर लगाता ।  स्थानीय जन श्रद्धापूर्वक इस डोले के पीछे अपने पहाड़ी एक्सेंट में कृष्ण भजन करते चलते थे -

' कान्हा आन बसों ब्रिंदाबन में मेरी उमर गुजर गयी गोकुल में '
वृन्दावन की गोपियों- सखियों का दुःख इस भजन द्वारा जैसे आँखों के आगे चित्रित हो उठता ।

' हाथी- घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की '

इस भजन के बोल बच्चों के उत्साह से भरे स्वर में गोपियों के दुःखभरे भावों को कुछ कम करने में सहायक होते ।

डोले के फेरे , गायन सुनने के बाद छतों , पहाड़ी , टिब्बों , गली , पगडंडियों में चढ़े जन मेले की दुकानों की राह लेते , घूमते । 

हीरासिंह की दुकान की जलेबियाँ इस दिन खूब बिकती ,थाल में रोपी गयी गहरा धुंवा उड़ाती; अँगुली जितनी मोटी काली धूप मक्खियों को दूर रखती ।  चतुरसिंह भी अपने माल पुओं को बेचते हुए थाल से मक्खियाँ ह्काता रहता ।  जोशी पंडित जी के नमकीन समोसों के अन्दर की हरी-और लाल मिर्चा इन मीठे पुओं और जलेबियों के साथ खूब रास रचाती ।  मुँह मर जाने वाले अत्यधिक मीठे पुए और जीभ जलने के बाद कनपट्टी तक लगने वाली मिर्चा की झाल वाले नमकीन समोसे ; क्या बच्चे -क्या बड़े सबको खूब भाते थे ।

हिमानी और उसकी पाँचों सखियाँ भोटिया लोगों के छप्पर में पीतल के छल्ले , नकली फिरोजा लगे हेयर क्लिप्स , नकली मूँगों के मनके वाले कलाई -कड़े और नकली चाँदी के ऑक्सीडाइज आभा वाले मोटे पहाड़ी कड़े , और नन्हें कान के झुमके देखते -मग्न रहते । 

किशोरी कन्याओं की देर तलक वस्तुओं को देखने, उथल-पुथल करने पर कभी-कभी पृथुल काठी की गोरी; गाय के जैसे मक्खन की त्वचा और बंद नेत्रों वाली भोटियारिन और उसका झुकी पीठ वाला साथी तंग होकर कह उठते -

' ऐ ! लरकी लोग ; लेना हो तो लो नई तो टैम खराब मत करो !! '

कन्याएं जैसे नींद से जागती तुरत -फुरत अपने छोटे -छोटे बटुओं , छोटे यत्नपूर्वक कंधों में सजाये ; माता-मौसी के पर्स में से सिक्के - मुड़े -तुड़े पिछले बरस से जमा किये हुए द्रव्य निकालती और भोटिया दम्पति का उलाहना मनपसन्द वस्तुएं खरीदकर दूर कर देती ।  इस मेले से खरीदे गये उपहार सखियों के आदान-प्रदान का एक सुन्दर हिस्सा भी बनते ।

कितना हर्ष और कितना आनंद ! अब वैसी ख़ुशी -हरीष कहाँ मिलता है कोई हीरे- कुंदन का गहना खरीदने पर भी !! अधिकतर यह मेला पंद्रह -अगस्त के आस-पास पड़ता ।  जन्माष्टमी के पहले दिन लडकियाँ गुलमेंहदी के पौधों की कोमल - चिकनी हरी पत्तियों को पीसकर अपने अंगूठों , हथेलियों में मजेठी को पीसकर खोपे व ठप्पे लगाती ।  तीन दिन तक यह मेंहंदी के कत्थई ठप्पे कन्याओं की हथेलियों में उनकी अल्हड़ उमंगों की भाँति उमग-उमग सुगंध बिखरते ।  अति भावुक कन्याएं कई बार अपनी हथेलियों को अपने नासारंध्रों के समीप लेजाकर इनकी ताज़ी महक को अन्दर तक साँसों में खींच लेने के मधुर क्रियाकलाप करतीं ।

अगस्त , सितम्बर बीत जाता ।  अब आता अक्टूबर का सुहावना मौसम ! बारिशों की बसंत या धारासार धाराएं लगभग बंद हो जाती थीं इस समय और धूप हल्की हो उठती थी, इसमें गर्मी जैसा ताप नहीं रहता था ।
ढाई महीना स्कूल की पढ़ाई के बाद अब बेचैनीपूर्वक फिर किसी लम्बी छुट्टियों के इंटरवल का इन्तजार किया जाता ; यह छुटियाँ होती -दशहरे की छुट्टियाँ ।
प्रात: स्कूल से मिले होमवर्क को दैनिक बैठकी में दैननंदिनी के तौर पर निपटा लिया जाता ।  इन दिनों रामलीला का भी मंचन होता था ।  पूरे परिवार के साथ माँ व पड़ोस की चाची-आंटियों , ताई के परिवारों के साथ कभी-कभी रामलीला देखने का ही सुअवसर मिलता था ।  यह भी किसी मुँहहमांगे मनोरंजन से कम न था ।

इसी बीच हिमानी की बाल -सखी मनु बताती कि उसके घर में सप्तमी से अष्टमी- नौमी / नवमी तक की पूजा होगी ।  उसका परिवार अधिकतर अपने-जान पहचान के मित्रों को इन पूजाओं में आमंत्रित करता था ।
कभी-प्रात: तो कभी साँय; इन पूजाओं में मित्र भी शामिल होते ।  हिमानी और उसकी सखियों के लिए यह पूजा कम बल्कि सखियों से बातों में मशगूल रहने का अवसर अधिक होता । 

अब हिमानी को भरपूर अक्ल थी वह सातवीं कक्षा में थी , आज मनु के घर अष्टमी का महा -अनुष्ठान व बलि थी । यूँ पहले भी बीते वर्षों में बलि होती आई हो पर हिमानी के बालमन ने तब इस ओर अधिक ध्यान न दिया । 

क्या पता वह इस समय सखियों के साथ हो या हो सकता है इस अनुष्ठान में इस ख़ास दिवस में शामिल न हुई हो !  खैर जो भी था ; आज मनु का परिवार व् कुछ अभिन्न मित्र अति उत्साहित थे । हमेशा की भाँति उनके घर से एक फर्लांग दूर उनके व्यक्तिगत मन्दिर देवीथान में अनेक मित्र उपस्थित थे ।  आस-पास के छोटे-छोटे गाँव से रिश्तेदार -मितुर आये थे ।

जानकीबल्लभ जोशी जी और उनके सहायक चार पंडितों ने ओजस्वीपूर्ण देवी कथा व देवी पाठ किये ।  गुग्गुल -धूप, अगरबत्ती , कर्पूर जलने से सम्पूर्ण वातावरण सुगन्धि से भर उठा ।  चीड़ , बाल बाँज, बाल-काफालों के वृक्षों से घिरा यह स्थान सुगंधि और पाठों की ध्वनि से अपूर्व -महिमामय हो गया ।
हिमानी अपनी सहेलियों के साथ दरियों के ऊपर बिछे कालीनों में से एक कालीन पर भक्तिभाव से बैठी हुई थी ।

मन्दिर से लगी रसोईघर के बड़े गोठ में रस्यारों की हलचल थी , काँधे पर यज्ञोपवीत के धागे , श्वेत धोती और तेल चुपड़ी शिखाओं के साथ पुजारी कहे जाने वाले पंडितों और पूजा में विश्वास रखने वाले ठाकुरों में से युवा दल भोजन बनाने के उपक्रम में बड़ी तल्लीनता से खोये थे ।

कुछ देर में स्त्रियों से पूरियां बेलने को कहा गया , उत्साहित और कर्मठ महिलायें आगे-आगे आ गयीं ; कुछ आलसी-कामचोर स्त्रियों ने सुने की अनसुनी कर आरती गाने वाली स्त्रियों के पीछे अपना मुँह छुपाया ।  कार्य नहीं करना पड़ेगा करके तो वे यहाँ पूजा के बहाने अपने गृह से निकली थीं ।


तांबे के बड़े चौड़े मुँह वाले बर्तन पतीले और पीतल के तौलेनुमा बर्तन ' कस्यर ' में भात-दाव खदक रहा था ।  काले लौह की दोनों किनारों में मोटे कुंडे -हत्थे जड़ी कढ़ाई में आलू-गोभी की सब्जी बन रही थी ।  लकड़ी की कई ठेकियों में पहाड़ी पीला- दनकार रायता बन चुका था जिसमें से पिसी राई की उठती महक स्वाद -ग्रंथियों को उकसा रही थीं ।

उधर बड़ी लेकिन उथली तैके की कढाई चढ़ी और घी गर्म होने पर पूरियों की कई-कई खेप उतारीं जाने लगी ।  एक बड़े कढ़ाह में दानेदार घी का हलवा बनकर रखा था ; जो पूर्व में ही बना लिया था ।  देवी के आरती थालों के सम्मुख हलुवे का एक नन्हा पहाड़ पंच-मेवों से सुसज्जित था , बच्चों का एक दल हलुवे को देखकर अपनी लार टपका रहा था ।  छोटे बच्चे तो एक नींद भी निकाल चुके थे ; हलुवे मिलने की आस की देरी अब उनसे सहन नहीं हो पा रही थी ।


खैर ; अब यह आरती का अंतिम अध्याय था , गणेश वन्दना , शिव स्तुति फिर महागौरी - भगवती की आरती ! नक्काशी वाली ; गोल किनारों वाली थाली में आटे की पंच-दीयों की सेली सजी थी ।  थाल में स्वस्तिक के आकार की आटे की पट्टियां , उन पर चार दिए और फिर बीचों -बीच एक और दीया ।  आटे की पट्टियों में खड़ी कर रोपी गयीं जौ के बीजों के कनार ! अहा !! कितना सौदर्य और घी के जलते दीयों की अनुपम सुगंध !

किनारे एक ओर केदारी और हिरवा दमुवे-नंगाड़े बजाते हुए अपने आस्तीनों से कभी-कभी अपनी नासिका पोंछ लेते , दोनों बाप-बेटों को जुकाम ने पीड़ित कर रखा था पर दमुवे व नगाड़े की लय में व्यवधान नहीं पड़ता था । ऐसे पवित्र वातावरण में देवी का आह्वान किया जाए तो क्यों न देवी पधारेंगी भला !
इतने में एक उच्च स्वर में घोषणा हुई कि आरती समाप्त हो गयी है ;नान -नान बच्चों को भोजन करा दिया जाय ।

मन्दिर के दूसरी ओर एक भिन्न हलचल थी , छोटे बकरी के पाठे , बकरे और एक जतिया यानि भैंस का पुत्र बछड़ा / कटड़ा उपस्थित थे ।  उनके स्वरों से बचने के लिए उनके आगे उत्तम प्रकार की हरी दूर्वा ओर घास डाली गयी थी ।
इतने में युवाओं का दल ; जिनमे बड़े-छोटे क्षत्रिय जातियों के युवक शामिल थे ; एक-एक कर बकरों को सामने प्रांगण पर लाने लगे ।

युवाओं का दल बड़े उत्साह और जोश में दिखा ; यह वे युवा थे जिन्होंने अपने शरीर को व्यायाम द्वारा सुगठित कर रखा था , सुदर्शन न भी हों तो शरीर -सौष्ठव में वे बेजोड़ प्रतीत होते थे । इतने में ही आरती के थाल से सम्पूर्ण जनों व युवाओं को भी तिलक-पिठ्याँ लगाया गया ।  हजारी-गेंदे के नव - पुष्प माथे से लगाकर सिर पर रखे गये , नम -पिघले बताशे और पंचमेवा अंजुरी में लेकर मुँह-बिटाव किया गया ।

अब एक-एक कर उन चार बकरों और कटड़े के मस्तक में पिठ्याँ लगाया गया , उन्हें नैवेद्य के रूप में केले -सेब आदि फल खिलाये गये । कुछ अनोखा होने वाला था , यह स्थान चारों ओर से जनों द्वारा घिर गया , फिर घोषणा हुई -
' अरे बैठ जाओ सब लोग ! सबको दिखना चाहिए । '
जनों की भीड़ की झिर्री से हिमानी व सहेलियां भी इस कौतुहल भरे दृश्य को देखने के लिए जनों के बीच की बची जगहों -बाहों के किनारे से बची पतली जगहों से अपने नेत्रों की दूरबीन इस स्थान पर फिट करने की असफल कोशिश करने लगीं ।

अब मैं -मैं करते मेमनों को एक-एक कर आगे लाया जा रहा था , वे अपनी पनीली आँखों को टुकुर-टुकुर इधर-उधर घुमाते और फिर मैं -मैं करते थे ।
एक युवा ने गर्व के साथ एक चाँदी जैसी चमकती तीव्र धार की खुखरी अपने दोनों हाथों में ऊपर तक सबल उठाई और खचाक !! एक पाठे की गर्दन धड़ से अलग कर दी ! वातावरण 'जै भगवती ! ' के स्वरों से गूँज उठा ।
हाय ! रक्त का एक लाल फ़व्वारा बह निकला ।

शायद इसी प्रकार अन्य पाठे व बड़ी आँखों और पीछे को सुन्दर मुड़े सींग वाला कटड़ा बलि के निमित्त वध कर देवी को अर्पित किये गये ।  वध करने वालों युवाओं के मुखमंडल पर पाशविक विजयी भाव थे । निरीह पशुओं के मारने के बाद इतनी प्रसन्नता ! ऐसा भ्रू –नेत्रों की ऐसी पाशविक गर्वित क्रिया !!
भीड़ अब इस स्थान से भोजन के लिए पंगत में बैठ चुकी थी ।  युवा दल बकरों को शायद काटने हिस्सा- बाँट करने और इस मांस को पकाने के लिए , बाँज के केड़ों-कुंदों के नीचे इनको साबुत लटकाकर 'भूटवा ‘ भूनने का उपक्रम करने लगा । कटड़े को चील -कौवों व अन्य जीवों के लिए पहाड़ी से नीचे लुढ़का दिया गया ।  बकरों का यह प्रसाद दिवसभर - रात्रिभर पकेगा और दूसरे दिन प्रसाद के तौर पर वितरित किया जाएगा ।

कुछ देर पहले जिस दृश्य ने हिमानी के हृदय को सुगन्धित और आलोड़ित कर रखा था वहाँ अब नैराश्य था । आटे का पंचमेवा वाला प्रसाद उसने किनारे कोने में जाकर मुँह से उलट दिया।  ताम्बे के गागर से गिलास में जल लेकर आक !आक !! कर जैसे पेट में गया सारा प्रसाद निकाल देना चाहती थी वह , उसे लगा रक्त की कुछ बूँदें उसके मुख में पड़ गयी हैं , वह बेचैन थी । 
ऐसी आसुरी भक्ति ! न ! उसने मनु से कह दिया वह अपने घर जाना चाहती है , माँ-पिता को जिदपूर्वक वह घर वापस ले आई ।  अदबेहोश हो गया था हिमानी का मस्तिष्क !

आह ! उसे पूर्ण विश्वास था कि देवी माँ भी अश्रु बहा रही होंगी , क्या मेमनों की आँखों और कटड़े के नेत्रों में देवी माँ को अपने मंदिर का प्रतिबिम्ब नहीं दिखा होगा !!

[ अपनी रूचि के अनुसार जन जो भी भक्षण करते हों पर कालान्तर में देवी के नाम पर दी गयीं बलि प्रथाएं अब कुमाऊँ में लगभग बंद हैं । ]

-श्रीमती प्रतिभा अधिकारी

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