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सीमित युद्ध और भारत के लक्ष्य

यह शब्दश: सत्य है कि युद्ध से मसले हल नहीं होते बल्कि नये मसले जन्म लेते हैं। भारत और पाकिस्तान दक्षिण एशिया के दो महत्वपूर्ण देश हैं और दुर्भाग्य से दोनों पड़ौसी हैं और दोनों के बीच आरंभ से ही वैमनस्य चला आ रहा है। वैमनस्य की वजह भी एक ही है ' कश्मीर ' किन्तु पाकिस्तान का रवैय्या देख कर लगता है कि 'कश्मीर' की समस्या नहीं भी होती तो वह कोई और समस्या लेकर भारत से तना तनी कर रहा होता।
युद्ध ऐसा विकल्प है जिसका जहाँ तक संभव हो, सहारा नहीं लिया जाना चाहिये। किन्तु भारत का धैर्य अब चुकने को है। पाकिस्तानी शह से आतंककारी हर उस प्रक्रिया जिससे कश्मीर विवाद शांत होता हो के विरोधी हैं, यह हुर्रियत नेता अब्दुल गनी लोन की हत्या से स्पष्ट है जो कि आतंकवाद के खिलाफ थे। यह तो अब प्रधानमंत्री भी मान चुके हैं कि कश्मीर आतंकवाद का एकमात्र हल यही रह गया है कि आतंकवाद से मुकाबले के लिये सैनिक कार्यवाही की रणनीति तैयार की जाये।
अपनी जम्मू कश्मीर की यात्रा को प्रधानमंत्री जी ने एक नये अध्याय का संकेत बताया। भारत ने पहले भी सीमा पर सेनाएं भेज पाकिस्तान को संकेत दिया था कि खतरे को समझे किन्तु मुशर्रफ ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। आतंककारियों को लगातार पाकिस्तान का समर्थन मिलता रहा। यह भी छिपा नहीं है कि आतंककारी गिरोह अब प्रतिबंधित गिरोहों के नाम बदल नये नामों से आतंक फैलाने लगे हैं और अमेरिका अच्छी तरह जानता है कि इन गिरोहों को पाकिस्तानी समर्थन हासिल है। अमेरिका स्वयं का भरोसा अब पाकिस्तान पर से उठ गया है।
सभी जानते हैं कि युद्ध का खामियाजा बहुत बड़ा होता है, देश की आर्थिक, औद्योगिक स्थिति पर बुरा असर पड़ता है। ज़ाहिर है जंग का फैसला इतना आसान नहीं मगर अब सब्र करना भी मुश्किल है। अन्तर्राष्ट्रीय दबाव दोनों देशों पर है। प्रधानमंत्री स्वयं सीमित कार्यवाही के पक्षधर हैं किन्तु किसी भी सीमित कार्यवाही के व्यापक युद्ध का रूप ले लेने की आशंका को नकारा नहीं जा सकता। जहाँ तक जन तथा धनहानि का सवाल है किसी भी कार्यवाही को सीमित नहीं कहा जा सकता। यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि वर्षों से जारी अघोषित छद्म युद्ध से भारत को असीमित हानि उठानी पड़ी है। हालांकि कारगिल युद्ध को भारत ने अपने संयम के साथ बहुत सीमित रखा यदि भारत संयम न बरतता तो उसी वक्त आर पार की लड़ाई के साथ आतंकवाद को नेस्तनाबूद किया जा सकता था।
दोनों देशों के परमाणु शक्ति सम्पन्न होने के कारण सावधानी और संयम की अधिक आवश्यकता है, इस संदर्भ में भारत की नीति स्पष्ट है कि वह पहल नहीं करेगा मगर पाकिस्तान की ओर से पहल हुई तो वह ईंट का जवाब पत्थर से देगा। पाकिस्तान विश्व में एकमात्र ऐसा देश है जिसके परमाणु हथियारों पर राजनीतिक नहीं वरन् सेना का नियंत्रण है। फिर भी वह भारत की परमाणु शक्ति को देखते हुए यह दु:स्साहस करने से पहले हज़ार बार सोचेगा। उस पर पाकिस्तान में अमरीकी सेना की उपस्थिति भी उसे संयम बरतने पर विवश करेगी।
अमेरिका ने भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते युद्ध के आसारों पर चिन्ता व्यक्त की है। ब्रिटेन की ओर से भी दोनों देशों के बीच टकराव को टालने के कदम उठाये जा रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि वे कब तक भारत से संयम बरतने की सलाह मानते रहने की उम्मीद कर सकते हैं? जबकि पाकिस्तान की आतंककारियों को बढ़ावा देने की नीति में किंचित मात्र भी असर नहीं पड़ा है।
अमेरिका का अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ अभियान कितना सफल रहा यह अमेरीका स्वयं जानता है, यहाँ तक कि अमेरीका के उपराष्ट्रपति डिक चेनी ने पुन: अमेरीका पर आतंककारी हमले की आशंका व्यक्त की है। लेकिन भारत तो वर्षों से आये दिन पाकिस्तान प्रोत्साहित हमलों का शिकार होता आ रहा है। ऐसी स्थिति में भारत से और संयम बरतने तथा प्रतीक्षा करते रहने की नीति पर कायम रहने की उम्मीद कहाँ तक व्यवहारिक है?
सीमित युद्ध की भारतीय परिभाषा इस समय यह है कि पाकिस्तान तथा उसके कब्जे वाले पाक अधिकृत कश्मीर में स्थित आतंककारी शिविरों को नेस्तनाबूद कर दिया जाए। और भारत के इस उद्देश्य में अमेरिका प्रतिरोध नहीं करेगा। यदि करे भी तो भारत इसे नहीं मानेगा। लेकिन यह तय है कि विश्वसमुदाय आर पार या आमने सामने की लम्बी लड़ाई को मान्यता नहीं देगा। इससे परमाणु युद्ध का दूरगामी खतरा बढ़ सकता है। जो सम्पूर्ण विश्व के ही हित में नहीं।
अंतर्राष्ट्रीय दबाव के चलते भारत को सीमित युद्ध की अपनी नीति पर तब तक कायम रहना होगा जब तक पाकिस्तान ही कोई दु:स्साहस न कर बैठे। यदि भारत सीमित युद्ध चाहता है तो उसे पहले ही अपने लक्ष्य निर्धारित करने होंगे कि सीमित युद्ध व कम से कम समय में वह किस तरह आतंकवाद का सफाया कर सकता है तथा क्या हासिल कर सकता है। यदि लक्ष्य निर्धारित है तो आतंवाद के खिलाफ इस लड़ाई में पूरा देश सेना के साथ है। भारतीय मानस कार्यवाही के पक्ष में है अब!

– मनीषा कुलश्रेष्ठ

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